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नज़रिया: 'मुंबई पुलिस ने पाकिस्तान से दाऊद को पकड़ लिया होता'
1993 मुंबई सीरियल बम धमाकों में गुरुवार को पांच लोगों को सज़ा सुनाई गई.
इस मामले में टाडा अदालत ने ताहिर मर्चेंट, फ़िरोज़ अब्दुल राशिद ख़ान को फ़ांसी, रियाज़ सिद्दीक़ी को 10 साल जबकि अबू सलेम और करीमुल्लाह शेख़ को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है.
इस मामले में गठित पहली जांच टीम के प्रमुख मुंबई पुलिस के रिटायर्ड डीसीपी वाई सी पवार ने बीसीसी को बताया कि दाऊद को पकड़ने की पूरी तैयारी हो चुकी थी.
वाई सी पवार के शब्द
दाऊद इब्राहिम को छोड़ कर बाक़ी सभी आरोपियों को 1993 मुंबई सीरियल धमाकों में सज़ा हो गई क्योंकि वो इस ब्लास्ट से काफ़ी पहले पाकिस्तान भाग गया था.
भारत ने पाकिस्तान को सारे सबूत सौंप दिए थे, यहां तक कि उसके वो तीन पते भी जिन पर दाऊद के रहने का अंदेशा था.
भारत इंटरपोल के साथ भी तालमेल बिठाए था जिसने दाऊद के ख़िलाफ़ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी किए थे. लेकिन पाकिस्तान ने जवाब नहीं दिया.
वास्तव में पाकिस्तान की ख़ुफिया एजेंसी आईएसआई ने दाऊद को संरक्षण प्रदान कर रही थी.
अंडरकवर ऑपरेशन
इस बीच, मैंने दाऊद को पाकिस्तान से पकड़ने की योजना पेश की. यह ख़तरनाक और जोख़िम भरा मिशन था. मैं चार साथी अधिकारियों के साथ मिशन पर जाने वाले थे.
हम या तो दाऊद को पकड़ लाते या ख़ुद मारे जाते. कम से कम दुनिया को पाकिस्तान में उसकी मौजूदगी के बारे में हमारे दावे की पुष्टि तो हो जाती. हमारी ज़िंदगी दांव पर हो सकती थी लेकिन हम परेशान नहीं हुए थे. लेकिन इसे उच्च स्तर पर ख़ारिज कर दिया गया.
इसके पीछे दो वजहें थीं. पहली, चार भारतीय पुलिस अधिकारियों को अंडर कवर भेजने के लिए फ़र्जी पासपोर्ट चाहिए थे. केंद्र सरकार इसे कभी नहीं स्वीकार करती. इसके अलावा, अगर हमें पकड़ा जाता तो भारत सरकार को शर्मिंदगी भी उठानी पड़ती.
मुंबई पुलिस की योजना
दूसरा ये कि मुंबई पुलिस के हमारे उच्च अधिकारी हमारा बलिदान नहीं लेना चाहते थे. इसलिए उन्होंने हमारी योजना को अस्वीकार कर दिया.
इस मामले के शुरुआती दौर में जांच अधिकारी मैं था. यह तय किया गया था कि पुलिस, आईबी, रॉ किसी भी गिरफ़्तार व्यक्ति को, वो चाहे जो कोई भी हो हमारी टीम को सौंपेगी. इसके पीछे कारण था कि अलग अलग लोगों के बयानों को इकट्ठा कर आगे की कार्रवाई के लिए सूचना एकत्र किया जा सके.
लेकिन, जब अभिनेता संजय दत्त मॉरिशस से मुंबई लौट कर आए और गिरफ़्तार किए गए तो अपराध शाखा ने उन्हें हमें नहीं सौंपा. इस पर मेरी अपने वरिष्ठ अधिकारियों से बहस हुई और मैं इस जांच से हट गया.
दाऊद आज भी आज़ाद
आज, जब सज़ा का ऐलान हुआ तो अभियुक्त नंबर-1 दाऊद आज भी खुला घूम रहा है. मुझे डर है कि वो अभियुक्त नंबर-1 रहते हुए ही न मर जाए. दाऊद को पाकिस्तान से ज़िंदा लाना तब तक संभव नहीं है जब तक भारत उस पर हमला नहीं करता या फिर नए सिरे से किसी ऑपरेशन को अंज़ाम नहीं दिया जाता.
पाकिस्तान ख़ुद दाऊद को कभी नहीं सौंपेगा. कारण स्पष्ट है- वो पाकिस्तान को बेनकाब कर देगा. बल्कि, अगर वो बेकार हो चुका है या उससे कोई ख़तरा है तो पाकिस्तान उसे मार सकता है. सबसे बड़ी समस्या थी कि साजिश दुबई में रची गई थी.
टाइगर मेमन का लिंक
भारत में उसका कुछ अता-पता नहीं था. जांच की शुरुआत कहां से करें इसको लेकर असमंजस की स्थिति थी. सुराग के नाम पर एक ओमनी गाड़ी मिली थी. जिसमें उसकी आरसी की फ़ोटो कॉपी थी. लेकिन उसका गाड़ी से अपराध का कोई तालमेल है भी या नहीं इसकी जानकारी नहीं थी.
उसमें जो एके-47 मिले थे उसके आधार पर इसका लिंक उससे जुड़ता था. उस लिंक के आधार पर ही हम पहले टाइगर मेमन के घर पर पहुंचे. वहां हमें छठी मंजिल पर हमें आरडीएक्स का सूखा हुआ पाउडर मिला. एक चाबी मिली. जो एक नए स्कूटर की चाबी थी.
जांच आगे कैसे बढ़ी
बिल्डिंग के बाहर आने पर हमें लाहौर का ठप्पा लगा एक बक्सा मिला. इसके आधार पर हमें टाइगर मेमन का लिंक पता चला. लेकिन वो भाग चुका था. हमें एक महिला ने सुराग दिया, उसने दाऊद से बात भी की थी जिसे मैंने सुना था.
इसके बाद आगे का रास्ता आसान होता गया. उस महिला का धन्यवाद. मुंबई पुलिस का सौभाग्य था. हमें अपराध से जुड़ा जो भी मिला उसे पकड़ कर रख लिया. इस मामले से मैं 40 दिन जुड़ा था आगे की जांच क्राइम ब्रांच ने की. 40 दिनों के दौरान लगभग 45 लोग पकड़े गए थे. फिर क्राइम ब्रांच ने कार्रवाई आगे बढ़ाई.
पुलिस की जीत
यह न्याय की जीत है. मुंबई पुलिस की मेहनत रंग लाई जिसकी जांच के दौरान बहुत आलोचना हुई थी.
मुंबई पुलिस पर आरोप लगा था कि कई लोगों पर झूठा केस किया गया है. कोर्ट का फ़ैसले में सज़ा मिलने के बाद जो मुंबई पुलिस ने किया था उस पर मुहर लग गई. मुझे खुशी है कि पुलिस ने जो मेहनत की उसका नतीजा आया है.
(बीबीसी संवाददाता प्रसन्ना जोशी और वात्सल्य राय से बातचीत के आधार पर)
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