नज़रिया: वो डर जिसकी वजह से सरकारें करती हैं कर्ज़ माफ़

उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार की ओर से 36,359 करोड़ रुपये के किसानों के कर्ज़ माफ़ करने की घोषणा की गई है.

अभी कुछ दिन पहले ही विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत से जीतने के बाद बीजेपी की सरकार ने राज्य में सत्ता संभाली है.

बीजेपी का इस कर्ज़ माफी की घोषणा पर कहना है कि वो अपने घोषणापत्र में किए वादों को पूरा कर रही है.

लेकिन यह भारत के सबसे ग़रीब राज्यों में से एक उत्तर प्रदेश की वित्तीय हालत को और खस्ता कर देगा.

इससे भी ख़राब यह है कि इसकी पूरी संभावना है कि लोकप्रिय होने की यह होड़ कहीं दूसरे राज्यों में ना पहुंच जाए.

महाराष्ट्र में इसकी आशंका सबसे ज्यादा है. वहां भी बीजेपी की सरकार है और वहां के मुख्यमंत्री अपने सरकार में सहयोगी पार्टी शिवसेना के दबाव में हैं जो किसानों की कर्ज़ माफी को लेकर लगातार दबाव बना रही है.

सबसे पहले किसानों की कर्ज़ माफी की शुरुआत मनमोहन सिंह की केंद्र सरकार ने 2008 में की थी. इस बार इसकी शुरुआत राज्य सरकारों ने की है.

2014 में नवगठित राज्य तेलंगाना ने 16,000 करोड़ रुपये के किसानों के कर्ज़ माफ किए थे.

इसके बाद फिर आंध्र प्रदेश की बारी आई. आंध्र प्रदेश ने 40,000 करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ़ किए.

हाल ही में तमिलनाडु सरकार ने किसानों के 6000 करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ किए हैं.

अब तो लोकप्रिय कदम उठाने की इस होड़ में कोर्ट भी शरीक हो गई है. मद्रास हाई कोर्ट ने हाल में राज्य सरकार को तीन लाख और किसानों को कर्ज़ माफी वाली किसानों की सूची में डालने को कहा है.

इससे राज्य सरकार पर 2000 करोड़ रुपये का बोझ और पड़ेगा.

केंद्र सरकार की बजाय किसानों के कर्ज़ माफी में राज्य सरकारों के आगे बढ़ने के तीन वजहें हैं.

एक वजह तो राजनीति से जुड़ी हुई है. दूसरी वजह गांवों की बदहाली से जुड़ी हुई है तो तीसरी वजह भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के सबसे पिछड़े होने से जुड़ी हुई है.

इसके लिए राज्य सरकारों की नीतियां और दखलअंदाजी कुछ हद तक जिम्मेवार है.

इन तीन वजहों के साथ-साथ एक चौथी वजह भी इसमें जोड़ी जा सकती है. चौदहवें वित्त आयोग के बाद राज्य सरकारों के आय के साधनों में इज़ाफा हुआ है. जिसकी वजह से राज्य सरकारों की वित्तीय हालत पहले की तुलना में बेहतर हुई है.

किसानों की कर्ज़ माफी की राजनीति असुरक्षा की भावना से जुड़ी हुई है.

चूंकि मोदी सरकार पूर्ण बहुमत के साथ केंद्र में है इसलिए वो इस मुद्दे पर कमजोर और मात खाई हुई कांग्रेस के दबाव को झेलने में सक्षम है. (हालांकि 2019 के आम चुनाव से पहले इसकी संभावनाओं को पूरी तरह से ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता है.)

चूंकि कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सरकारें हैं.

इसलिए राज्य सरकारें केंद्र में बीजेपी की सरकार होने और क्षेत्रीय स्तर पर उसके बढ़ते प्रभाव की वजह से असुरक्षित महसूस कर रही है.

इस असुरक्षा की भावना के साथ उनका आत्मविश्वास डिगा हुआ कि वो बिना मुफ्त की रेवड़िया बांटे चुनाव जीत पाएंगे.

अब महाराष्ट्र का ही उदाहरण ले लीजिए. बीजेपी की सहयोगी पार्टी शिवसेना को कोई शायद ही किसानों की पार्टी माने.

लेकिन वो भी लगातार किसानों की कर्ज़ माफी के लिए दबाव डाल रही है. वो अपना जनाधार देहाती क्षेत्रों में बढ़ाने को लेकर लगातार प्रयासरत है.

वहीं उसकी चिंता की यह भी वजह है कि राज्य में बीजेपी का प्रभाव भी बढ़ता जा रहा है.

लेकिन वाकई में जो एक बड़ा मुद्दा है वो है खेती के जमीन के अभाव का.

दो-तिहाई भारतीय किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम ज़मीन है जिसका मतलब यह है कि उनके पैदावार का ज्यादातर हिस्सा ख़ुद ही पर खप जाता है और बाज़ार में वो उसे बेच नहीं पाते हैं.

इसकी वजह से वो पैदावर की गुणवत्ता सुधारने के ऊपर भी ज्यादा निवेश नहीं कर पाते हैं और जब बैंक से कर्ज लेकर वे निवेश करते भी हैं तो फसल सूखे और ओले की भेंट चढ़ जाती है.

2014 और 2015 में लगातार दो साल सूखा पड़ा और 2016 में मानसून की स्थिति अच्छी रहने के बावजूद कुछ राज्यों में ओले पड़ने के कारण फसल बर्बाद हुई. इन राज्यों में उत्तर प्रदेश का भी नाम है.

भारतीय नेताओं का सबसे बड़ा ढोंग यह है कि उनका कलेजा किसानों के लिए फटता रहता है, लेकिन वो कृषि को लेकर एक संवेदनशील नीति बनाने की जहमत नहीं उठाते हैं ताकि किसानों की समस्या का सही समाधान निकल पाए.

भारत की कृषि नीति दोयम दर्जे की है इसमें बाज़ार की भूमिका बहुत सीमित है.

खेती से होने वाला फ़ायदा सरकार के द्वारा तय किए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर निर्भर करता है.

कृषि उत्पादों का निर्यात सरकार की मर्जी पर निर्भर है. जब घरेलू बाज़ार में आपूर्ति नहीं होने की वजह से क़ीमत ऊंची होती है तो निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है.

और निर्यात पर से प्रतिबंध तभी हटाया जाता है जब क़ीमत नीचे गिर जाती है.

खेती की यह हालत तब है जब लगभग खेती में लगने वाली हर चीज़ मसलन बीज, खाद, पानी, बिजली और पंपसेट के लिए डिजल सब कुछ सब्सिडी पर या अक्सर मुफ्त में मुहैया कराया जा रहा है.

सरकारें कर्ज़ भी देती हैं और यह कर्ज़ दूसरे कर्जों से सस्ते ब्याज दर पर दिए जाते हैं.

अब अगर किसान नेताओं से यह कहे कि मेरी दुर्दशा के लिए आप ही जिम्मेवार है इसलिए आप ही इस गड्ढे से निकालो जिसे खोदने में आपने मेरी मदद की है तो कोई अचरज की बात है?

भारतीय किसानों की हालत में सुधार लाने का एकमात्र रास्ता बाज़ार से होकर जाता है. बाज़ार को अपना काम निर्बाध तरीके से करने दे और बुरी परिस्थिति से निकालने के लिए प्रभावकारी बीमा नीति का सहारा लिया जाए.

कर्ज़ माफ़ी किसानों की दुर्दशा को ठीक करने का समाधान नहीं है.

कर्ज़ देने से बेहतर है कि किसानों को आर्थिक मदद दी जाए या फिर न्यूनतम आय सब्सिडी दी जाए ताकि बैंकिंग सिस्टम के चक्की में किसान ना पिसे.

अब ज्यादातर किसान यह मानने लगे हैं कि कम से कम पांच साल में एक बार तो राज्य या केंद्र सरकार कर्ज माफी दे ही देगी.

जरूरत है भारत के खेतों को व्यापार के नजरिए से देखने की और उसी के अनुरूप नीतियों को बनाने की.

इसका एक मतलब यह भी है कि छोटे-छोटे खेतों को मिलाकर एक बड़ा खेत तैयार किया जाए जहां बड़े पैमाने पर निवेश हो और उत्पादन को बढ़ाया जा सकें.

इससे बैंक भी कर्ज देने में आनाकानी नहीं करेंगे. कॉरपोरेट और कंट्रैक्ट खेती अपनाने से उत्पाद में कई गुना बढ़ोतरी हो सकती है.

खेत मजदूरों को भी बड़े पैमाने पर कृषि उद्योग में काम मिल पाएगा.

लेकिन शायद ही कोई भारतीय राजनेता है जो यह कहे कि खेती-किसानी में बाज़ार की बड़ी भूमिका है और उसे रेखांकित करने की जरूरत है.

अगर वे ऐसा करते हैं तो उन्हें डर है कि इससे उनकी जरूरत कर्ज़ माफ़ी जैसे फैसलों में किसानों को नहीं रह जाएगी.

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