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खेती करें, या बैंकों के बाहर लाइन में लगें?
लखनऊ ज़िले के मोहनलालगंज के रहने वाले किसान दिनेश त्रिवेदी आलू की बुवाई का काम छोड़कर पिछले तीन दिन से बैंकों के आगे क़तार में लग रहे हैं ताकि उन्हें पांच-पांच सौ की छह नोटों के बदले नए नोट मिल जाएं.
कुछ यही हाल झांसी ज़िले के मऊरानीपुर के रहने वाले विद्या सागर का है जिनके घर में शादी है और उसके पहले ही उन्होंने ख़र्च के लिए कुछ ज़रूरी पैसों का इंतज़ाम कर रखा था. ये सारे पैसे पांच-पांच सौ की नोटों में थे जिन्हें जमा कराने के लिए वो बैंक का चक्कर लगा रहे हैं.
पांच सौ और एक हज़ार के नोट अचानक बंद होने से यूं तो हर इंसान हैरान- परेशान दिख रहा है लेकिन गांवों में किसानों को इसकी मार शायद ज़्यादा झेलनी पड़ रही है. ये समय फ़सलों की बुवाई का है और दूसरी ओर शादियों का भी.
दोनों ही कामों में पैसे की ज़रूरत है, लेकिन किसानों ने जो पैसे जोड़-गांठकर रखे भी थे वो अब चलन से बाहर हो गए हैं. यही नहीं, उनके सामने एक समस्या ये भी है कि खेती के काम को छोड़कर वो दिन भर बैंकों और एटीएम के बाहर लाइन में भी नहीं लग सकते क्योंकि खेती के काम में एक-एक दिन बड़ा क़ीमती होता है.
उत्तर प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में धान की इस बार अच्छी फ़सल हुई है, लेकिन किसान उसकी ख़ुशी नहीं मना पा रहा है.
इलाहाबाद के किसान दिलीप मौर्या कहते हैं कि इस बार मौसम मेहरबान रहा तो धान की बंपर फ़सल हुई है, लेकिन सरकार को शायद किसानों की ये ख़ुशी नहीं देखी गई.
वो कहते हैं, "मंडियों में यदि धान लेकर जा रहे हैं तो नगद पैसे नहीं मिल रहे हैं या फिर धान ख़रीदा ही नहीं जा रहा है. जिन लोगों ने धान बेच दिया था उनके नोट अब रद्दी बन चुके हैं."
उत्तर प्रदेश की अगर बात की जाए तो कई ज़िलों में किसान नोट के अभाव में बीज और खाद नहीं खरीद पा रहे हैं. बुवाई का वक़्त होते हुए भी किसान खाली हाथ बैठे हैं और नए नोट का इंतज़ार कर रहे हैं.
कुछ किसानों का कहना है कि खाद तो उन्हें सोसायटी के ज़रिए उधार भी मिल जा रही है लेकिन बीज ख़रीदने और घर के दूसरे ख़र्च के लिए पैसे कहां से लाएं.
ग़ाज़ियाबाद के सुंदरपुर गांव में खाद और खली की दुकान चलाने वाले सुधीर कहते हैं कि उधार देने की भी एक सीमा है. उनका कहना है, "हम तो अपने गांव वालों को उधार दे दे रहे हैं लेकिन हमें भी तो बाज़ार से सामान लाना पड़ता है, उसके लिए हम कहां से पैसा लाएं."
कई और दुकानदारों का भी कहना है कि उनके पास खुले पैसे बचे नहीं हैं, जो थे वो ख़त्म हो गए. इसी वजह से वो किसानों की चाहकर भी मदद नहीं कर पा रहे हैं.
बुलंदशहर के रहने वाले दीपक सिरोही कहते हैं, "मोदी जी ने ये काम तो अच्छा किया है लेकिन इसे एक महीने बाद लागू करना चाहिए था. ये समय किसानों के लिए सबसे अहम है. अब किसान खेती करे या फिर बैंकों के बाहर लाइन में लगे?"
इस समय गेहूं, सरसों, मटर और आलू की मुख्य रूप से बुआई होती है. किसानों के मुताबिक़ अगर खाद डालने में दस दिन की भी देरी हो जाएगी तो सरसों की फ़सल में कीड़े लग जाएंगे.
गांवों में बैंकों की संख्या वैसे भी कम है. आमतौर पर क़स्बों या फिर शहरों में ही बैंक हैं और वहां भी सीमित मात्रा में ही नगदी आ रही है. क़तार में खड़े होने के बावजूद कोई गारंटी नहीं है कि कैश मिल ही जाएगा.
किसान नेता शिवनारायण सिंह परिहार कहते हैं कि काला धन वापस आएगा या नहीं, हमें नहीं पता, लेकिन किसानों की रबी की फ़सल सौ फ़ीसद चौपट हो जाएगी.
वो कहते हैं, "बुंदेलखंड में तो पिछला सीज़न सूखे की चपेट में चला गया. बारिश ठीक होने से इस बार कुछ उम्मीद जगी थी, लेकिन अब बैंकों की लाइनें इस पर पानी फेर दे रही हैं."
हालांकि बैंक अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी लगातार संयम बरतने और धैर्य रखने की अपील कर रहे हैं, लेकिन बैंकों के बाहर झड़पें भी हो रही हैं और लोगों के मुताबिक़ बैंक के कर्मचारी मनमानी भी कर रहे हैं.
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