महात्मा बनने का नुस्ख़ा बताता नाटक

    • Author, चिरंतना भट्ट
    • पदनाम, मुंबई से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

'मोहनदास करमचंद गांधी' से 'महात्मा गांधी' बनने की एक ख़ास रेसिपी है, जिसे ढ़ेर सारी अहिंसा के साथ पर्याप्त मात्रा में सहनशीलता और कई अन्य मसाले मिलाकर बनाया जाता है.

मुंबई के पृथ्वी थिएटर में 10 जून को आइडियाज़ अनलिमिटेड का नाटक 'मोहन का मसाला' महात्मा गांधी के उन पहलुओं पर प्रकाश डालेगा, जिनके बारे में कम लोग ही जानते हैं.

महात्मा गांधी अहिंसावादी थे और अन्याय के विरोध में अपनी आवाज़ भी उठाते थे. लेकिन ये दोनों गुण या मसाले उनमें शुरू से नहीं थे.

इस नाटक के मुताबिक़, अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का मसाला उन्हें कस्तूरबा गांधी से मिला.

दरअसल, मोहनदास गांधी की शादी बचपन में ही कर दी गई थी. शादी के बाद वो अपनी पत्नी यानि कस्तूरबा को नियंत्रण में रखना चाहते थे.

लेकिन कस्तूरबा आज़ाद ख़याल लड़की थीं. मोहन के हर सवाल का जवाब कस्तूरबा नहीं देती थीं. यहां तक कि मोहन के ग़लत होने पर उनका डटकर मुक़ाबला भी करती थीं.

यहीं से बापू को अन्याय या ग़लत का दृढ़ता से मुक़ाबला करने का मसाला मिला.

वहीं अहिंसा का गुण उनमें शुरू से नहीं था. इसका भी एक दिलचस्प क़िस्सा है. बात उन दिनों की है, जब मोहनदास बैरिस्टर की पढ़ाई करने विदेश गए हुए थे.

यही एक दिन तांगे में बैठने की जगह को लेकर एक अंग्रेज़ ने उनसे हाथापाई की. इस दौरान बेचारा मोहन हाथ तो न उठा सका, लेकिन चुप रहकर विरोध ज़रूर प्रदर्शित किया.

इस घटना से युवा मोहन को मूक विरोध करने या अहिंसा का मसाला मिला.

वहीं 'उपवास' के मसाले का भी बड़ा रोचक वाक़्या है. विदेश में पढ़ाई के दौरान ही मोहन बीमार हो गए. ऐसे में डॉक्टर ने उन्हें गोमांस का सूप पीने की सलाह दी.

बीमारी और कड़ाके की ठंड के बावजूद मोहन ने सिर्फ़ दलिया ही खाया और तब उन्हें पता चला कि वह भूख पर क़ाबू रख सकते हैं. वहां से उन्हें 'उपवास' का मसाला मिला.

इस नाटक में मोहन के पहली बार लिफ़्ट में बैठने का अनुभव भी बताया गया है. मोहन जब पहली बार लिफ़्ट में बैठे, तो उन्हें लगा यह कोई कमरा है, जहां लोग बारी-बारी सोएंगे.

ऐसे ही कई और दिलचस्प क़िस्सों की परतें खोलता यह नाटक गुजराती के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेज़ी में भी मंचित किया जाएगा.

मंच पर महात्मा गांधी के चरित्र को अभिनेता प्रतीक गांधी निभाएंगे. प्रतीक कहते हैं, ''यह एक मोनोलॉग है, जिसमें मंच पर एक ही अभिनेता होता है.''

वो कहते हैं कि सेट के नाम पर एक कुर्सी है और पृष्ठभूमि में चित्रकार अतुल डोडिआ के बनाए बैकड्रॉप हैं. डेढ़ घंटे का यह नाटक बिना इंटरवल के होगा.

प्रतीक आगे कहते हैं, ''यह किरदार निभाना मेरे लिए बहुत बड़ा एक्साइटमेंट था. बापू के बारे में स्कूल के समय से पढ़ते आए हैं, लेकिन इस नाटक से मैंने उनके उन दिनों के बारे में जाना जिनके बारे में बहुत कम बातें हुई हैं.''

नाटक के निर्देशक मनोज शाह बताते हैं, ''मैं मिनिमलिस्टिक थिएटर में यक़ीन करता हूं और गांधी इसके लिए आदर्श पात्र हैं. मेरे नाटक में दर्शक उस गांधी को देखेंगे, जिसे घर पर मोहनिया कह कर बुलाया जाता था.''

इस नाटक को लिखने वाले 21 साल के ईशान दोशी मानते हैं कि उनकी पीढ़ी के लिए महात्मा के संदेश पहुंचाने का यह सबसे अच्छा तरीक़ा है.

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