'फैंटम' और 'बजरंगी भाईजान' वाली कौसर

    • Author, श्वेता पांडेय
    • पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

बॉलीवुड की गीतकार कौसर मुनीर कहती हैं कि बॉलीवुड में क़ाबिलियत की वजह से काम मिलता है, न कि लिंग और धर्म की वजह से.

बॉलीवुड में महिला पटकथा लेखक हो या गीतकार दोनों की संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती है.

12 वर्षों से टीवी और फ़िल्मों के लिए पटकथा और गीत लिख रही कौसर अपने संघर्ष के अनुभवों को साझा करते हुए कहती हैं, ''काम पाने के लिए तो संघर्ष नहीं करना पड़ा लेकिन मेरी ज़िन्दगी में और भी संघर्ष रहे हैं.''

लेकिन उन संघर्षों के बारे में ज़्यादा बात नहीं करते हुए वो आगे कहती हैं, ''घर संभालना क्या कम मुश्किल है?''

पहले के मुक़ाबले महिलाओं की सोच में आए परिवर्तन की बात मानते हुए कौसर कहती हैं, ''महिलाएं आगे आई हैं, लेकिन अभी भी एक मानसिकता से बाहर आने में वक़्त लगेगा. वो काम पर कहीं भी जाएं, लेकिन भीतर घर की चिंता बनी रहती है.''

पिछले दिनों एक के बाद एक कई लेखकों ने अपने 'साहित्य अकादमी पुरस्कारों' को लौटाकर दादरी की घटना पर सरकार के रवैये के प्रति अपना विरोध जताया.

इस बात पर वो कहती हैं, ''हम लोकतंत्र में रहते हैं. ऐसे में अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है. जब तक कोई भी विरोध शांतिपूर्ण तरीके से हो रहा हो, तो वो अच्छा है."

"रही बात पुरस्कारों को लौटाने की, तो इससे किसी का अपमान नहीं हो रहा है. जिन्हें ये मिला है, वे ही लौटा रहे हैं.''

वो मुद्दों पर हो रही बहस को सही ठहराते हुए कहती हैं, "दोनों पक्षों को सुने बिना सही या ग़लत तक नहीं पंहुचा जा सकता."

टीवी शो 'जस्सी जैसी कोई नहीं' से बतौर डायलॉग राइटर अपने करियर की शुरुआत करने वाली कौसर वर्ष 2008 में आई फ़िल्म 'टशन' के गाने 'फ़लक तक' से लोगों की नज़र में आई.

अपने गीतकार बनने का श्रेय वो निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य को देतीं हैं. लेकिन उन्होंने ख़ुद को सिर्फ़ गीतकार तक सीमित नहीं रखा है.

हाल ही में उन्होंने 'फैंटम' और 'बजरंगी भाईजान' के भी कुछ सीन के संवाद लिखे हैं. इसके बारे में वो कहती हैं, ''मैं लेखन की छतरी के नीचे जितना कुछ आता है, वो सब करना चाहती हूं."

जब कौसर से पूछा गया कि क्या बॉलीवुड में उनको धर्म या लिंग की वजह से कोई भेदभाव सहना पड़ा, तो वो हंस कर कहती हैं, "इस बात का एहसास तो आपने अभी करवाया."

वो बात को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं, "फ़िल्म इंडस्ट्री में धर्म और लिंग के आधार पर नहीं बल्कि काबिलियत के आधार पर काम मिलता है.''

जब बीबीसी ने उनसे पूछा कि उनके लेखन पर किसका प्रभाव हैं, तो वो मुस्कुराते हुए बोलीं, ''ज़ाहिर है, गुलज़ार साहब का. तभी तो 'इश्कज़ादे' जैसे लफ्ज़ का ईज़ाद किया.''

कौसर मौजूदा दौर के गीतकारों में से अमिताभ भट्टाचार्य को वर्सेटाइल मानती हैं.

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