भारत में क्या टेस्ला या एप्पल जैसी अमेरिकी कंपनियों के शेयर सीधे ख़रीद सकते हैं?

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शेयर बाज़ारों में निवेश में दिलचस्पी रखने वाले अक्सर ये सवाल पूछते हैं. इसका सवाल सीधे हां या ना में हो सकता है, लेकिन इसके लिए हमें कुछ बुनियादी और कानूनी बातों को समझना ज़रूरी है.
तो भारत से विदेश में निवेश करने का कानूनी ढांचा क्या है?
भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई भारतीयों को वैश्विक स्तर पर निवेश करने की अनुमति देता है. भारतीयों द्वारा विदेश में निवेश को विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फ़ेमा) और उदारीकृत प्रेषण योजना (एलआरएस) के तहत नियंत्रित किया जाता है.
एलआरएस के तहत कोई भी भारतीय निवासी हर वित्तीय वर्ष में 2,50,000 डॉलर तक की राशि विदेश भेज सकता है, जिसमें विदेशी शेयरों में निवेश भी शामिल है. हालाँकि ये राशि आरबीआई के नियम-कानूनों के तहत ही भेजी जानी चाहिए.
विदेश के लिए निवेश के नियम
आरबीआई ने विदेश में निवेश के लिए नियम बनाए हैं और इन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा है:
ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ओडीआई): यह आमतौर पर गैर-सूचीबद्ध विदेशी कंपनियों में इक्विटी खरीदने को कहा जाता है. इसमें वे मामले भी शामिल हैं जहां कोई निवेशक किसी लिस्टेड विदेशी कंपनी में 10% से अधिक हिस्सेदारी रखता हो.
ओवरसीज पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट: इसमें वे इक्विटी निवेश शामिल होते हैं जो ओडीआई की श्रेणी में नहीं आते. उदाहरण के तौर पर सूचीबद्ध विदेशी कंपनियों में 10% से कम हिस्सेदारी खरीदना या विनियमित अंतरराष्ट्रीय फंड्स में निवेश करना.
अमेरिकी कंपनियों के शेयर ख़रीद सकते हैं?
तो क्या आप सीधे टेस्ला या एप्पल जैसी अमेरिकी कंपनियों के शेयर खरीद सकते हैं?
ओवरसीज पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट नियमों के तहत आप विदेशी ट्रेडिंग अकाउंट खोलकर टेस्ला, एप्पल या माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों के शेयरों में सीधे निवेश कर सकते हैं, लेकिन कुछ शर्तों के साथ:
किसी विदेशी कंपनी में आपकी हिस्सेदारी सामान्यतः 10% से कम होनी चाहिए (रिटेल निवेशक आमतौर पर इससे काफी कम हिस्सेदारी रखते हैं). दूसरा निवेशक कंपनी पर नियंत्रण नहीं रख सकते. साथ ही निवेश के लिए एलआरएस के तहत वैध बैंकिंग चैनलों का इस्तेमाल करना ज़रूरी है.
भारत से विदेशी शेयरों में निवेश करने के अलग-अलग तरीके हैं.
विदेशी शेयरों में निवेश के लिए कोई एकमात्र रास्ता नहीं है. आप अपनी सुविधा, निवेश राशि और अनुभव के आधार पर विकल्प चुन सकते हैं.
अंतरराष्ट्रीय ब्रोकर के ज़रिये निवेश
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यह आज के समय में सबसे लोकप्रिय तरीका है. इसके लिए आप ये कदम उठा सकते हैं:
ऐसी प्लेटफॉर्म पर अकाउंट खोलें जो अमेरिकी शेयरों में निवेश की सुविधा देता हो, एलआरएस के तहत विदेश में पैसा ट्रांसफर करें और रुपये को डॉलर में बदलें. कई भारतीय फिनटेक प्लेटफॉर्म विदेशी ब्रोकरों के साथ साझेदारी करके वैश्विक निवेश को आसान बनाते हैं. ये अकाउंट खोलने, फंड ट्रांसफर और अनुपालन की प्रक्रिया को आसान बनाते हैं. उन शुरुआती निवेशकों के लिए यह उपयोगी है जो जटिल प्रक्रियाओं से बचना चाहते हैं.
भारतीय विदेशी कंपनियों के इंप्लाई स्टॉक्स ऑप्शन प्लान यानी ईसॉप्स में निवेश कर सकते हैं, यदि वे उस कंपनी की भारतीय शाखा या ऐसी भारतीय इकाई में काम करते हों जिसमें विदेशी कंपनी की हिस्सेदारी हो.
ईसॉप्स को अलग तरीके से देखा जाता है. इन्हें आरबीआई के प्रतिबंधित सेक्टर्स में भी अनुमति मिल सकती है और ये 10% सीमा से बंधे नहीं होते.
विदेश में निवेश करने से पहले टैक्स प्रभाव को समझना भी ज़रूरी है. इक्विटी से होने वाला लाभ कैपिटल गेन टैक्स के तहत आता है, जबकि डिविडेंड और ब्याज 'अन्य स्रोतों से आय' के तहत टैक्स योग्य होते हैं. सभी विदेशी संपत्तियों की जानकारी आयकर रिटर्न में देना जरूरी है,नियमों का पालन नहीं होने पर जुर्माना लग सकता है.
सवाल उठता है कि क्या आपको वैश्विक शेयरों में निवेश करना चाहिए?
वैश्विक शेयरों में निवेश करने का फैसला आपके वित्तीय लक्ष्यों पर निर्भर करता है. हालांकि किसी भी निवेश निर्णय से पहले वित्तीय विशेषज्ञ की सलाह लेना हमेशा बेहतर माना जाता है. निवेश से जुड़े जोखिमों को अच्छी तरह समझना जरूरी है ताकि आप अपने निवेश में विविधता लाते हुए बेहतर लाभ हासिल कर सकें.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

































