अर्दोआन के ख़िलाफ़ 10 साल पहले हुई तख़्तापलट की नाकाम कोशिश ने तुर्की को कैसे बदला

2016 के तख़्तापलट प्रयास के दौरान अर्दोआन समर्थकों ने इस्तांबुल के बोस्फोरस पुल पर एक सैन्य टैंक पर क़ब्ज़ा कर लिया था. (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, 2016 के तख़्तापलट प्रयास के दौरान अर्दोआन समर्थकों ने इस्तांबुल के बोस्फोरस पुल पर एक सैन्य टैंक पर क़ब्ज़ा कर लिया था. (फ़ाइल फ़ोटो)
    • Author, बीबीसी न्यूज़ तुर्क़ी
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सड़कों पर चलते टैंकर और गोलियों की आवाज़ें, सरकारी इमारतों के ऊपर बेहद कम ऊँचाई पर उड़ते लड़ाकू विमान, संसद पर हमला और यह सब कुछ टेलीविज़न पर लाइव प्रसारित हो रहा था.

तीन सैन्य तख़्तापलट और दो अन्य सैन्य हस्तक्षेप झेल चुके इस देश के लिए भी 15 जुलाई 2016 की रात अभूतपूर्व थी. इससे पहले कभी तुर्की की संसद पर हमला नहीं हुआ था.

इस्तांबुल के बोस्फोरस ब्रिज ने भी इतना ख़ून-ख़राबा पहले कभी नहीं देखा था. इस पुल को अब आधिकारिक रूप से '15 जुलाई शहीद पुल' कहा जाता है.

राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन की अपील पर आम नागरिक तख़्तापलट की कोशिश का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आए थे.

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अज्ञात जगह से एक मोबाइल ऐप के ज़रिए टीवी पर लाइव बातचीत करते हुए अर्दोआन ने अपने समर्थकों से उस रात सड़कों पर निकलने की अपील की थी.

देश भर की मस्जिदों ने भी अपने लाउडस्पीकरों के माध्यम से उनका संदेश लोगों तक पहुँचाया. सुबह तक तख़्तापलट की कोशिश नाक़ाम हो चुकी थी.

इस घटना में कुल 253 लोगों की मौत हुई, जिनमें 184 आम नागरिक थे.

वहीं, कथित तौर पर साज़िश में शामिल 34 लोगों की भी जान गई. तख़्तापलट की यह कोशिश केवल कुछ घंटों तक चली, लेकिन इसके प्रभाव बहुत दूरगामी रहे.

पिछले दस वर्षों में इस घटना ने तुर्की की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया. इससे देश के भीतर सत्ता का संतुलन बदला और विदेशों के साथ उसके संबंधों की दिशा भी नए सिरे से तय हुई.

राष्ट्रपति अर्दोआन का लाइव संबोधन
इमेज कैप्शन, राष्ट्रपति अर्दोआन का एक अज्ञात स्थान से मोबाइल फ़ोन के ज़रिए किया गया लाइव संबोधन, तख़्तापलट की उस रात की सबसे पहचान योग्य और प्रतीकात्मक तस्वीरों में से एक बन गया

तख़्तापलट के बाद चला व्यापक शुद्धिकरण अभियान

2016 के तख्तापलट प्रयास के दौरान हेलिकॉप्टर हमले में तुर्की की संसद को भारी नुक़सान पहुंचा था (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, 2016 के तख्तापलट प्रयास के दौरान हेलिकॉप्टर हमले में तुर्की की संसद को भारी नुक़सान पहुंचा था (फ़ाइल फ़ोटो)

सरकार ने तख़्तापलट की कोशिश के पीछे अमेरिका में रहने वाले इस्लामी धर्मगुरु फ़ेतहुल्लाह गुलेन के नेटवर्क को ज़िम्मेदार ठहराया.

हालांकि, गुलेन ने 2024 में अपनी मृत्यु तक इस घटना में किसी भी तरह की भूमिका से इन्कार किया. तख़्तापलट की कोशिश के कुछ दिनों बाद देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया.

यह 2018 तक लागू रहा और इस दौरान इसे सात बार बढ़ाया गया. इस अवधि में अधिकारियों ने आधुनिक तुर्की के इतिहास के सबसे बड़े शुद्धिकरण अभियानों में से एक चलाया.

राष्ट्रपति अर्दोआन और फ़ेतहुल्लाह गुलेन का बैनर
इमेज कैप्शन, राष्ट्रपति अर्दोआन और फ़ेतहुल्लाह गुलेन कभी क़रीबी सहयोगी थे, जो बाद में प्रतिद्वंद्वी बन गए थे. 2013 में सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे एक प्रदर्शनकारी ने इन दोनों की तस्वीर वाला बैनर थामा हुआ था. (फ़ाइल फ़ोटो)

एक समय राष्ट्रपति अर्दोआन के क़रीबी सहयोगी रहे फ़ेतहुल्लाह गुलेन के धार्मिक आंदोलन का दशकों तक तुर्की की सरकारी संस्थाओं और नौकरशाही में प्रभाव रहा था.

तख़्तापलट की कोशिश के बाद हज़ारों सैनिकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई, जिसमें वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और जनरल भी शामिल थे.

इसके अलावा जजों, सरकारी वकीलों, पुलिस अधिकारियों, शिक्षाविदों और सरकारी कर्मचारियों को गिरफ़्तार किया गया, नौकरी से निकाला गया या निलंबित कर दिया गया.

गुलेन नेटवर्क से जुड़े होने के आरोप में सैकड़ों निजी स्कूल और शैक्षणिक संस्थान बंद कर दिए गए. कई विश्वविद्यालयों को भी बंद कर दिया गया.

आलोचकों का कहना है कि यह कार्रवाई केवल तख़्तापलट के संदिग्ध साज़िशकर्ताओं और गुलेन समर्थकों तक सीमित नहीं रही. उनके अनुसार, सरकार ने असहमति रखने वाले अन्य लोगों को भी निशाना बनाया.

विपक्षी नेताओं का दावा है कि इस शुद्धिकरण अभियान के बाद समय के साथ दूसरे धार्मिक समूहों का सरकारी संस्थाओं में प्रभाव बढ़ गया. हालांकि, सरकारी अधिकारी इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं.

अर्दोआन की शक्ति का विस्तार

2018 में तख्तापलट की विफल कोशिश की दूसरी वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रपति ने इस्तांबुल में लोगों को संबोधित किया
इमेज कैप्शन, अमेरिका स्थित थिंक टैंक फ़्रीडम हाउस का कहना है कि राष्ट्रपति प्रणाली लागू होने के बाद सांसदों की नीतियां बनाने की क्षमता काफ़ी कमज़ोर हो गई है
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तख़्तापलट की कोशिश का सबसे बड़ा राजनीतिक असर यह रहा कि राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन की शक्ति और मज़बूत हो गई.

2017 में मतदाताओं ने मामूली अंतर से संवैधानिक बदलावों को मंज़ूरी दी. इसके तहत संसदीय व्यवस्था की जगह शक्तिशाली कार्यकारी राष्ट्रपति प्रणाली लागू की गई.

ये बदलाव अगले साल लागू हुए और प्रधानमंत्री का पद समाप्त कर दिया गया, राष्ट्रपति के अधिकारों का विस्तार किया गया.

इस व्यवस्था के समर्थकों का कहना है कि इससे राजनीतिक स्थिरता बढ़ी, फ़ैसले लेने की प्रक्रिया तेज़ हुई और शासन अधिक प्रभावी बना.

वहीं, आलोचकों का मानना है कि इससे राष्ट्रपति के हाथों में बहुत ज़्यादा शक्ति केंद्रित हो गई. उनका कहना है कि सत्ता का बड़ा हिस्सा एक ही व्यक्ति के आसपास सिमट गया.

अमेरिका स्थित थिंक टैंक फ़्रीडम हाउस का कहना है कि राष्ट्रपति प्रणाली लागू होने के बाद सांसदों की नीतियाँ बनाने और उन्हें प्रभावित करने की क्षमता काफ़ी कमज़ोर हो गई है.

अपने ताज़ा तुर्की संबंधी रिपोर्ट में संगठन ने कहा, "वह अक्सर उन मंत्रालयों और स्वतंत्र सरकारी संस्थाओं के कामकाज में हस्तक्षेप करते हैं, जो उनकी इच्छा के विपरीत जाते हैं."

इस्तांबुल विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफ़ेसर दोगान चेतिनकाया भी इस आकलन से सहमत हैं. उनका कहना है कि राष्ट्रपति प्रणाली में 'मनमाना और अस्पष्ट संस्थागत ढाँचा' दिखाई देता है.

'बढ़ती तानाशाही' को लेकर चिंताएं

फ़्रीडम हाउस के अनुसार, पिछले दशक में तुर्की में सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ा है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर चिंताएं गहरी हुई हैं (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, फ़्रीडम हाउस के अनुसार, पिछले दशक में तुर्की में सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ा है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर चिंताएं गहरी हुई हैं (फ़ाइल फ़ोटो)

तुर्की की सरकार को मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं के मुद्दों पर कई वर्षों से आलोचना का सामना करना पड़ा है. लेकिन तख़्तापलट की कोशिश और उसके बाद चलाए गए शुद्धिकरण अभियान के बाद ये चिंताएँ और बढ़ गईं.

गुलेन आंदोलन से संबंध होने के आरोप में हज़ारों जजों और सरकारी वकीलों को उनके पदों से हटा दिया गया. इसके बाद मानवाधिकार संगठनों और यूरोपीय संस्थाओं ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई.

इस्तांबुल विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर दोगान चेतिनकाया कहते हैं, "15 जुलाई के बाद तुर्की की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की कई संस्थाएँ कमज़ोर हो गईं और उन्होंने अपनी स्वायत्तता खो दी."

उनके अनुसार, "न्यायपालिका और संसद प्रभावशाली सत्ता केंद्रों के रूप में अपनी भूमिका निभाना बंद कर चुकी हैं."

इसके बाद से सार्वजनिक प्रदर्शनों का आयोजन करना लगातार मुश्किल होता गया है. अधिकारी अक्सर सभाओं और विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाते हैं और भारी सुरक्षा बल तैनात करते हैं.

प्रेस की स्वतंत्रता में भी गिरावट आई है. मीडिया संस्थानों पर सरकार का प्रभाव बढ़ा है और कई प्रमुख पत्रकारों के ख़िलाफ़ मुक़दमे चलाए गए हैं.

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक-2026 में तुर्की 180 देशों में 163वें स्थान पर है.

यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी विवाद का विषय बनी हुई है. हाल ही में राष्ट्रपति का अपमान करने के आरोप में एक लोकप्रिय स्टैंड-अप कॉमेडियन को गिरफ़्तार किया गया.

वह उन पत्रकारों, राजनेताओं और सार्वजनिक हस्तियों की लंबी सूची में शामिल हो गए हैं, जिनके ख़िलाफ़ जाँच चल रही है.

अमेरिका स्थित संगठन फ़्रीडम हाउस का कहना है, "पिछले एक दशक में तुर्की में तानाशाही प्रवृत्ति बढ़ी है. संवैधानिक बदलावों, राजनीतिक विरोधियों, स्वतंत्र पत्रकारों और नागरिक समाज के सदस्यों को जेल भेजने जैसे क़दमों के ज़रिये सत्ता को और अधिक केंद्रीकृत किया गया है."

मुख्य विपक्षी दल को कमज़ोर करने का आरोप

मार्च 2025 में इस्तांबुल के गिरफ़्तार मेयर के समर्थन में हुए प्रदर्शन के दौरान तुर्की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया. (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, मार्च 2025 में इस्तांबुल के गिरफ़्तार मेयर के समर्थन में हुए प्रदर्शन के दौरान तुर्की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया. (फ़ाइल फ़ोटो)

मार्च 2025 में इस्तांबुल के मेयर एक्रेम इमामोउलू को गिरफ़्तार कर लिया गया. उन्हें भविष्य के राष्ट्रपति चुनाव में अर्दोआन के सबसे मज़बूत संभावित प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता था.

उनके अलावा नगर प्रशासन के कई अन्य अधिकारियों को भी भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों में गिरफ़्तार किया गया. इमामोउलू और उनके सहयोगियों ने इन आरोपों से इनकार किया है. इस मामले की सुनवाई अभी जारी है.

मई 2026 में एक अदालत के आदेश ने इमामोउलू की पार्टी, जो मुख्य विपक्षी दल सीएचपी है, के नेतृत्व पर प्रभाव डाला. इस आदेश के बाद पार्टी प्रमुख की जगह एक पूर्व नेता को नियुक्त कर दिया गया.

विपक्ष ने इसे 'न्यायिक तख़्तापलट' बताया. हालांकि, सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों में गिरावट के आरोपों को ख़ारिज करती है.

इस्तांबुल के मेयर एक्रेम इमामओग्लू को अर्दोआन का प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना जाता है
इमेज कैप्शन, इस्तांबुल के मेयर एक्रेम इमामओग्लू को अर्दोआन का प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना जाता है

सरकार का कहना है कि तख़्तापलट की कोशिश और उसके बाद चलाए गए शुद्धिकरण अभियानों के बाद किए गए बदलावों के कारण राजनीतिक स्थिरता, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक संस्थाएँ मज़बूत हुई हैं.

सरकार के अनुसार, इन क़दमों के ज़रिए उन लोगों को व्यवस्था से हटाया गया, जिन्हें वह राज्य के लिए ख़तरा मानती है.

यिलदिरिम बेयाज़ित विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफ़ेसर नूरी सालिक कहते हैं, "मेरे नज़रिए से मौजूदा व्यवस्था उस अस्तित्वगत ख़तरे के जवाब के रूप में विकसित हुई, जिसे तख़्तापलट की कोशिश ने उजागर किया था."

उन्होंने कहा, "मैं इसे केवल तानाशाही की ओर बढ़ने के रूप में नहीं देखता. मेरे लिए यह राज्य की आत्मरक्षा की प्रवृत्ति का विस्तार है."

तुर्की में सेना की घटती भूमिका

16 जुलाई 2016 को इस्तांबुल के बोस्फोरस पुल पर आत्मसमर्पण कर चुके सैनिकों के हथियार और सामान बिखरे पड़े दिखाई दिए (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, 16 जुलाई 2016 को इस्तांबुल के बोस्फोरस पुल पर आत्मसमर्पण कर चुके सैनिकों के हथियार और सामान बिखरे पड़े दिखाई दिए (फ़ाइल फ़ोटो)

दशकों तक तुर्की की सेना स्वयं को मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क के स्थापित धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की संरक्षक मानती रही. राजनीतिक संकट के समय वह कई बार राजनीति में हस्तक्षेप भी करती रही.

2016 में तख़्तापलट की कोशिश के बाद कई संरचनात्मक सुधार किए गए. इनके ज़रिए सशस्त्र बलों को मज़बूत नागरिक नियंत्रण के तहत लाया गया.

भर्ती और कमान व्यवस्था में बदलाव किए गए. सैन्य अकादमियों और सैन्य अस्पतालों का पुनर्गठन किया गया या उन्हें बंद कर दिया गया. कई सैन्य इकाइयों को शहरों के केंद्रों से दूर स्थानांतरित किया गया.

कई विश्लेषकों का मानना है कि इन बदलावों ने तुर्की की राजनीति में सेना के हस्तक्षेप के दौर को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया है.

प्रोफ़ेसर नूरी सालिक कहते हैं, "सेना लंबे समय तक राजनीति पर निगरानी रखने और उसे प्रभावित करने वाले एक तंत्र के रूप में मौजूद रही है."

वे कहते हैं, "आधुनिक तुर्की के इतिहास में 15 जुलाई वह पहला मौक़ा था, जब लोगों ने सेना के हस्तक्षेप का सक्रिय रूप से विरोध किया. इस लिहाज़ से यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था."

उनका मानना है कि अब सेना तुर्की की राजनीति को प्रभावित करने की अपनी क्षमता "पूरी तरह खो चुकी है."

वे कहते हैं, "यह सबसे बड़ा बदलाव है."

तुर्की की विदेश नीति पर भी असर

जनवरी 2018 में तुर्की ने उत्तरी सीरिया में वाईपीजी ठिकानों के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान चलाया
इमेज कैप्शन, जनवरी 2018 में तुर्की ने उत्तरी सीरिया में वाईपीजी ठिकानों के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान चलाया

तख़्तापलट की कोशिश के बाद तुर्की की विदेश नीति में भी महत्वपूर्ण बदलाव आए.

इसके बाद के महीनों और वर्षों में अंकारा ने उत्तरी सीरिया में तीन बड़े सैन्य अभियान चलाए. इनका निशाना इस्लामिक स्टेट (आईएस) और पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट्स (वाईपीजी) थे.

तुर्की का मानना है कि वाईपीजी का संबंध कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) से है. तुर्की, अमेरिका और यूरोपीय संघ पीकेके को आतंकवादी संगठन मानते हैं.

हाल के वर्षों में पीकेके के साथ शांति प्रक्रिया को फिर से शुरू करने की कोशिशें भी हुई हैं. हालांकि, इस दिशा में ठोस प्रगति अभी स्पष्ट नहीं है.

प्रोफ़ेसर नूरी सालिक का कहना है कि तख़्तापलट की कोशिश के बाद तुर्की की नीतियों में सुरक्षा को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाने लगी.

वे कहते हैं, "राज्य की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई."

तुर्की ने विदेश नीति को भी अधिक विविध बनाया. नाटो का प्रमुख सदस्य बने रहने के बावजूद उसने रूस के साथ अपने संबंध मज़बूत किए.

नेटो शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए अंकारा पहुंचने पर राष्ट्रपति ट्रंप का भव्य औपचारिक स्वागत किया गया, पहले दोनों देशों के बीच रिश्ते ख़राब हो गए थे (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, नेटो शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए अंकारा पहुंचने पर राष्ट्रपति ट्रंप का भव्य औपचारिक स्वागत किया गया, पहले दोनों देशों के बीच रिश्ते ख़राब हो गए थे (फ़ाइल फ़ोटो)

रूस से एस-400 वायु रक्षा प्रणाली ख़रीदने के फ़ैसले से तुर्की और वॉशिंगटन के बीच बड़ा विवाद पैदा हो गया. इसके बाद अमेरिका ने तुर्की पर प्रतिबंध लगाए और उसे एफ़-35 लड़ाकू विमान कार्यक्रम से बाहर कर दिया.

हालांकि, पिछले सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वह इन प्रतिबंधों को हटाएंगे. उन्होंने एफ़-35 विमानों की बिक्री के मुद्दे पर फिर से विचार करने की इच्छा भी जताई.

लेकिन ऐसे किसी भी क़दम को अमेरिकी कांग्रेस में काफ़ी विरोध का सामना करना पड़ सकता है.

उधर, यूरोपीय संघ में शामिल होने की तुर्की की लंबे समय से जारी कोशिशों में बहुत कम प्रगति हुई है. यूरोपीय संघ की सदस्यता को लेकर चल रही बातचीत 2018 से लगभग ठप है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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