ईरान में गिरे एफ़-15 लड़ाकू विमान के पायलट को बचाने के लिए अमेरिका का ऑपरेशन जारी - रिपोर्ट

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- Author, बर्न्ड डेबुसमैन जूनियर
- पदनाम, व्हाइट हाउस से
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कई शुरुआती मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ ईरान के ऊपर मार गिराए गए अमेरिकी एफ़-15 लड़ाकू विमान के पायलट को बचा लिया गया है. अगर इसकी पुष्टि होती है, तो यह दशकों से चल रही अमेरिकी कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू मिशनों की लंबी परंपरा की एक और कड़ी होगी.
बीबीसी के अमेरिकी साझेदार सीबीएस के मुताबिक़, दूसरे क्रू मेंबर की तलाश के लिए ईरान के अंदर गहराई से खोज अभियान अभी भी जारी है.
कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू (सीएसएआर) मिशन को सबसे जटिल और समय के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील सैन्य अभियानों में माना जाता है, जिनकी तैयारी अमेरिका और उसके सहयोगी देश करते हैं.
अमेरिका में वायुसेना की विशेष यूनिट्स को सीएसएआर मिशनों के लिए ख़ासतौर पर प्रशिक्षित किया जाता है और उन्हें अक्सर पहले से ही उन इलाक़ों के पास तैनात कर दिया जाता है जहां संघर्ष के दौरान विमान गिरने की आशंका होती है.
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कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू क्या होता है?
सीधे शब्दों में कहें तो सीएसएआर मिशन ऐसे सैन्य ऑपरेशन होते हैं जिनका मक़सद ज़रूरत में फंसे सैनिकों को ढूंढना, उनकी मदद करना और उन्हें सुरक्षित निकालना होता है, जैसे कि गिराए गए पायलट या अलग-थलग पड़े सैनिक.
प्राकृतिक आपदा या मानवीय राहत के दौरान होने वाले सामान्य सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन से अलग सीएसएआर मिशन दुश्मन या संघर्ष वाले इलाकों में किए जाते हैं.
कुछ मामलों में ये मिशन दुश्मन के इलाके के काफ़ी अंदर तक जाकर किए जाते हैं. जैसा कि शुक्रवार को ईरान को लेकर बताया गया ऑपरेशन है.
ये मिशन समय के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील होते हैं, क्योंकि जिस इलाक़े में बचाव टीम अपने सैनिकों को ढूंढ रही होती है, उसी जगह दुश्मन की सेना भी उन्हें पकड़ने की कोशिश कर रही होती है.
आज के समय में सीएसएआर मिशन अक्सर हेलिकॉप्टर के ज़रिए किए जाते हैं. इनके साथ ईंधन भरने वाले विमान और दूसरे सैन्य विमान भी होते हैं, जो ज़रूरत पड़ने पर हमला कर सकते हैं या इलाक़े की निगरानी करते हैं.
खास बात यह है कि शुक्रवार को ईरान से सामने आए कुछ सत्यापित वीडियो में अमेरिकी सैन्य हेलिकॉप्टर और कम से कम एक ईंधन भरने वाला विमान ख़ुज़ेस्तान प्रांत के ऊपर काम करते हुए दिखाई दिया है.

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सीएसएआर मिशनों का इतिहास
हवाई हमलों और युद्ध के दौरान होने वाले बचाव मिशनों का इतिहास काफ़ी पुराना है. इसकी शुरुआत प्रथम विश्व युद्ध के समय से मानी जाती है, जब पायलट फ़्रांस में अचानक लैंडिंग करके अपने गिरे हुए साथियों को बचाते थे.
अमेरिकी सेना की पैरा-रेस्क्यू यूनिट्स की जड़ें 1943 के एक मिशन तक जाती हैं, जब दो सैन्य सर्जन पैराशूट से उस समय के बर्मा (अब म्यांमार) में उतरे थे ताकि घायल सैनिकों की मदद कर सकें.
स्मिथसोनियन एयर एंड स्पेस मैगज़ीन के मुताबिक़, दुनिया का पहला हेलिकॉप्टर रेस्क्यू एक साल बाद हुआ था, जब एक अमेरिकी लेफ्टिनेंट ने जापानी सेना की लाइन के पीछे से चार सैनिकों को बचाया. यह घटना युद्ध में हेलिकॉप्टर के पहले इस्तेमाल का भी उदाहरण थी.
युद्ध के बाद अमेरिका में पहली बार औपचारिक सर्च एंड रेस्क्यू यूनिट्स बनाई गईं. लेकिन आधुनिक सीएसएआर मिशनों की असली शुरुआत वियतनाम युद्ध के दौरान हुई.
"बैट 21" नामक मिशन में उत्तरी वियतनाम की सीमा के पीछे गिराए गए एक पायलट को बचाने की कोशिश के दौरान कई विमान गंवाए गए और कई अमेरिकी सैनिक मारे गए.
इस युद्ध के दौरान सीएसएआर मिशनों का दायरा और जटिलता दोनों काफी बढ़े. इस अनुभव के आधार पर सेना ने अपनी रणनीतियों और प्रक्रियाओं को बेहतर बनाया, जो आज तक बचाव अभियानों की नींव बने हुए हैं.

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अमेरिकी वायुसेना की पैरा-रेस्क्यू टीमें
हालांकि अमेरिकी सेना की हर शाखा के पास सीमित सीएसएआर क्षमता होती है, लेकिन सैनिकों को ढूंढने और बचाने की मुख्य ज़िम्मेदारी अमेरिकी वायुसेना की होती है.
यह काम मुख्य रूप से पैरा-रेस्क्यूमैन करते हैं, जो सेना की स्पेशल ऑपरेशन यूनिट्स का हिस्सा होते हैं.
पैरा-रेस्क्यू का आधिकारिक नारा है: "हम ये सब करते हैं ताकि दूसरे जीवित रह सकें". इनके काम को इस वादे का हिस्सा माना जाता है कि किसी भी अमेरिकी सैनिक को पीछे नहीं छोड़ा जाएगा.
ये जवान लड़ाई और मेडिकल दोनों कामों में माहिर होते हैं. इनके अमेरिकी सेना के सबसे कठिन ट्रेनिंग सिस्टम में से एक से गुज़रना पड़ता है.
चयन और ट्रेनिंग की पूरी प्रक्रिया लगभग दो साल चलती है. इसमें पैराशूट ट्रेनिंग, डाइविंग, पानी के अंदर काम करने की ट्रेनिंग, सर्वाइवल ट्रेनिंग, दुश्मन से बचाव और निकलने की ट्रेनिंग, और सिविलियन पैरामेडिक कोर्स शामिल होता है.
इसके अलावा इन्हें युद्ध के मैदान में मेडिकल मदद, जटिल बचाव ऑपरेशन और हथियारों की भी ख़ास ट्रेनिंग दी जाती है.
मिलिट्री न्यूज़ वेबसाइट सोफ़रेब के मुताबिक़, आमतौर पर क़रीब 80 फ़ीसदी उम्मीदवार इस ट्रेनिंग को पूरा नहीं कर पाते, और कई बार यह संख्या इससे भी ज़्यादा होती है.
ज़मीन पर इन टीमों का नेतृत्व कॉम्बैट रेस्क्यू ऑफ़िसर्स करते हैं, जो पूरी तरह प्रशिक्षित होते हैं और बचाव मिशनों की योजना बनाने, तालमेल बैठाने और उन्हें अंजाम देने की ज़िम्मेदारी संभालते हैं.
हाल के अमेरिकी बचाव मिशन
पैरा-रेस्क्यू टीमों को इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान के युद्धों के दौरान बड़े पैमाने पर तैनात किया गया था. उन्होंने हज़ारों मिशन चलाकर अमेरिकी और सहयोगी देशों के उन सैनिकों को बचाया, जो घायल हो गए थे या जिन्हें वहां से निकालने की ज़रूरत थी.
उदाहरण के तौर पर साल 2005 में वायुसेना की पैरा-रेस्क्यू टीमों को एक अमेरिकी नेवी सील को बचाने के लिए भेजा गया था, जो अफ़ग़ानिस्तान के एक गांव में शरण लिए हुए था.
उसकी टीम पर घात लगाकर हमला हुआ था, जिसमें उसके बाकी तीन साथी मारे गए थे. इस घटना पर बाद में 'लोन सर्वाइवर' नाम की फ़िल्म भी बनी.
हाल के दशकों में गिराए गए अमेरिकी पायलटों को बचाने के मिशन काफ़ी कम हुए हैं.
1999 में सर्बिया के ऊपर मार गिराए गए एफ़-117 स्टेल्थ फ़ाइटर के पायलट को पैरा-रेस्क्यू टीमों ने ढूंढकर सुरक्षित बाहर निकाला था.
इसी तरह 1995 में बोस्निया में एक चर्चित घटना में अमेरिकी पायलट स्कॉट ऑ ग्रेडी को बचाया गया था.
उनका विमान गिरा दिया गया था और उन्होंने छह दिनों तक दुश्मन से बचते हुए खुद को छिपाए रखा.
बाद में वायुसेना और मरीन कोर के संयुक्त सीएसएआर मिशन में उन्हें सुरक्षित निकाल लिया गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































