आरक्षण में उप-वर्गीकरण का फ़ैसला कैसे लागू होगा, क्या दिक़्क़तें आ सकती हैं?

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    • Author, उमंग पोद्दार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अगस्त को अपने फ़ैसले में कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में उप-वर्गीकरण या सब-क्लासिफिकेशन किया जा सकता है.

कोर्ट के फ़ैसले का समर्थन के साथ बहुत विरोध भी हुआ है.

फ़ैसले के समर्थकों का कहना है कि इससे पिछड़ी जातियों और जनजातियों को फ़ायदा होगा.

इस फ़ैसले के समर्थकों में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन, आंध्र प्रदेश के एन चंद्रबाबू नायडू, बिहार के नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी के कई नेता शामिल हैं.

वहीं, बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती और आज़ाद समाज पार्टी के सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने फ़ैसले का विरोध किया है.

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आलोचकों का कहना है कि ये आरक्षण के मूल सिद्धांतों के ख़िलाफ़ जाता है और इससे दलित और आदिवासी में राजनीतिक फूट पैदा होगी.

एक अहम मुद्दा अब ये भी है कि इस वर्गीकरण को लागू कैसे किया जाएगा?

कोर्ट ने कहा है कि ये आंकड़ों के आधार पर होगा पर इस पर ज़्यादा विवरण नहीं दिया.

पहले आरक्षण के कई मुद्दों पर कोर्ट ने आरक्षण की कुछ नीतियां खारिज की हैं. जैसे ओबीसी रिजर्वेशन में उप-वर्गीकरण, स्थानीय निकाय चुनाव में औबीसी रिजर्वेशन और सरकारी नौकरी में पदोन्नति में आरक्षण.

क्या ऐसा उप-वर्गीकरण के साथ भी होगा?

आरक्षण
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कोर्ट ने क्या कहा?

अभी अनुसूचित जाति को 15% आरक्षण मिलता है और अनुसूचित जनजाति को 7.5%. इनकी सूची राष्ट्रपति बनाते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के छह जजों ने कहा है कि इस लिस्ट में राज्य सरकार सिर्फ़ उप-वर्गीकरण कर सकती है, और कुछ सीटों को एक अनुसूचित जाति या जनजाति के लिए अंकित कर सकती है.

कोर्ट का ये मानना था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति एक समान नहीं हैं. उनका कहना था कि कुछ जातियां बाक़ी से ज़्यादा पिछड़ी हुई हैं.

चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कुछ रिसर्च का उदाहरण दिया.

समाजशास्त्री ए.एम.शाह ने अपनी एक किताब में लिखा था कि कुछ अनुसूचित जातियां जैसे गरोड़ा, दलितों में पुजारी की तरह माने जाते हैं, जिनका अस्तित्व कुछ अनुसूचित जातियों से ऊपर देखा जाता है.

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चंद्रचूड़ ने लिखा कि गुजरात के एक अध्ययन में ये पाया गया कि कुछ अनुसूचित जातियां आपस में छुआछूत करती हैं, और एक दूसरे के हाथ से बना खाना या पानी नहीं लेते. कुछ जनजातियों को दलितों के मंदिर में आने नहीं दिया जाता था.

उन्होंने लिखा कि आंध्र प्रदेश की माला जाति, जो बुनाई का काम करती है, और मढ़िगा जाति, जो चमड़े का काम करती है, उन दोनों में बहुत असमानता है.

मढ़िगा जाति को माला जाति के मुक़ाबले नीचे स्तर का माना जाता है. इससे उनके पढ़ाई, नौकरी और राजनीतिक गतिविधियों पर भी फ़र्क़ पड़ता है.

जस्टिस बीआर गवई ने जस्टिस उषा मेहरा कमेटी की रिपोर्ट को तलब करते हुए कहा कि आंध्र प्रदेश में 60 अनुसूचित जातियों में से केवल 4-5 को ही आरक्षण का लाभ मिल रहा था.

इन सबका हवाला देते हुए, कोर्ट ने उप-वर्गीकरण की अनुमति दी.

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पर ये उप-वर्गीकरण होगा कैसे?

वर्गीकरण को लागू करना पेचीदा हो सकता है.

कोर्ट ने ये कहा है कि अब तक जैसे कोर्ट आंकड़ों की मांग करता आ रहा है, वैसे ही आगे करता रहेगा.

यह भी कहा कि इस पर कोर्ट रिव्यू कर सकता है.

कोर्ट ने पहले कहा कि आरक्षण सिर्फ़ जनसंख्या के आधार पर नहीं हो सकता है. यह सिद्धांत भी लागू होगा.

डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि पहले किसी जाति या जनजाति का सामाजिक पिछड़ापन देखा जाएगा, जिससे उनके शैक्षिक और आर्थिक स्थिति पर भी फ़र्क़ पड़ता है.

ये बाक़ी जातियों और जनजातियों की तुलना में होगा.

दूसरी चीज़ ये देखी जाएगी कि पिछड़ेपन के कारण उनकी सरकार के सेवाओं में अपर्याप्त हिस्सेदारी है क्या?

इन दोनों चीज़ों के लिए सरकार, चाहे वो राज्य या केंद्र हो, उन्हें आंकड़ा देना होगा.

कोर्ट ने कहा कि आरक्षण में उप-वर्गीकरण राजनीतिक फ़ायदे के लिए नहीं होना चाहिए.

हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इसका इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जाएगा.

अरविंद कुमार, जो पॉलिटिकल साइंटिस्ट हैं और यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, इस फ़ैसले का विरोध करते हैं.

वो कहते हैं, “सरकारें अपने समर्थकों और विरोधियों के हिसाब से जाति को चुन सकती हैं. इससे द्वेष बढ़ सकता है, जैसा हमने मणिपुर में देखा.”

दर्शन वाल्मीकि रावण, वाल्मिकी समुदाय के एक धार्मिक नेता हैं, उन्होंने फ़ैसले का स्वागत किया.

वाल्मिकी समुदाय का पंजाब में उप-वर्गीकरण किया गया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती मिली थी. लेकिन उनका कहना था, “आगे और संघर्ष करना पड़ सकता है. इस फ़ैसले को लागू करवाने के लिए भी और लड़ाई लड़नी पड़ सकती है.”

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आंकड़ों में बाधाएं

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इसे लागू करने में एक बड़ी बाधा होगी आंकड़ों को इकट्ठा करना. अरविंद कुमार कहते हैं, “उप-वर्गीकरण को लाना आसान नहीं होगा. कोर्ट, विश्वसनीय आंकड़ों के आधार पर कई सवाल खड़ा कर सकता है.”

पहले ऐसा कई बार हुआ है कि कोर्ट ने पर्याप्त आंकड़ा न होने का हवाला देते हुए सरकार द्वारा पारित आरक्षण को नकारा है.

वंचित बहुजन आघाड़ी के अध्यक्ष प्रकाश अंबेडकर ने कोर्ट के फ़ैसले की आलोचना करते हुए कहा, “कोर्ट ने ये नहीं बताया है कि किस आधार पर पिछड़ापन तय किया जाएगा.”

कोर्ट के एक जज, जस्टिस पंकज मिथल ने भी अपने फ़ैसले में ये बात कही कि आरक्षण नीति को लागू करने में एक बड़ी बाधा ये होती है कि उन्हें कोर्ट में चुनौती मिलती है.

इससे नौकरी की भर्ती में और कॉलेज में दाख़िले में बहुत देरी होती है.

आंकड़ों को इकट्ठा करने में भी वक़्त लग सकता है. जैसे, ओबीसी आरक्षण में वर्गीकरण के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने 2017 में जस्टिस रोहिणी कमेटी का गठन किया था, जिनकी रिपोर्ट 2023 में पूरी हुई.

पर ये रिपोर्ट अब ठंडे बक्से में है, और इसकी कॉपी केवल सरकार के पास है.

अरविंद कुमार ने कहा, “कोर्ट आंकड़ों को स्वीकार करे, ये जजों की अपनी राय होती है. कई बार कोर्ट ने डेटा को अविश्वनीय करार दिया है.”

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पहले कोर्ट ने कैसे आंकड़ों की मांग की है?

तमिलनाडु सरकार ने जो 10.5% आरक्षण वन्नियाकुला क्षत्रिय समुदाय को दिया था, 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया था.

राज्य में 20% आरक्षण अति पिछड़े वर्ग के लिए था, जिसमें से 10.5% वन्नियाकुला क्षत्रिय के लिए 2021 में आरक्षित किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार के पास सही आंकड़ा नहीं है.

कोर्ट ने कहा कि सरकार ने पुराने डेटा का इस्तेमाल किया था और आबादी के आधार पर आरक्षण दिया था.

उन्होंने कहा की वन्नियाकुला क्षत्रिय के लोग मंत्री, जज रह चुके हैं. इसलिए, सरकार उनके पिछड़ेपन को साबित नहीं कर पायी है.

2021 में मराठा रिजर्वेशन को ख़ारिज करते हुए कोर्ट ने कहा था कि अगर सरकार को 50% की आरक्षण सीमा को पार करना है, तो आंकड़ा दिखाना होगा.

हालांकि, सरकार ने एक कमेटी बनायी थी, पर कोर्ट ने उस कमेटी का आंकड़ा देख कर कहा कि इससे 50% सीमा भंग नहीं हो सकती.

इसके पहले आंकड़ों के संग्रह पर सरकारी नौकरी में पदोन्नति को लेकर बहुत सवाल उठे हैं.

2006 में सुप्रीम कोर्ट ने आंकड़ों को इकट्ठा करने के लिए कुछ शर्ते लागू की थीं. लेकिन, कई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इस आरक्षण को ग़ैर-क़ानूनी करार दिया. फिर इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में स्पष्ट किया कि आंकड़ों को कैसे इकट्ठा करना कोगा.

स्थानीय निकाय चुनाव में भी डेटा कलेक्शन के कारण अन्य पिछड़े वर्ग का आरक्षण कई राज्यों में लागू नहीं हो पा रहा है.

जाति जनगणना

कई विशेषज्ञों ने कहा है कि कोर्ट के डेटा की मांग को पूरा करने के लिए जाति जनगणना की ज़रूरत है, जैसा बिहार में किया गया है.

सामाजिक वैज्ञानिक योगेन्द्र यादव ने अपने एक लेख में कहा- “डेटा आधारित नीति पूरे देश में जाति जनगणना की मांग को दृढ़ करता है.”

हालांकि, जब बिहार में जाति आधारित गणना के बाद 65% आरक्षण अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग को दिया, तब पटना हाई कोर्ट ने उसे ख़ारिज कर दिया.

कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इन समुदायों की जनसंख्या के आधार अपर राज्य ने आरक्षण पारित कर दिया. कोर्ट के मुताबिक़ इनकी सरकारी नौकरियों में पर्याप्त हिस्सेदारी थी.

तो आने वाले दिनों में जब राज्य उप-वर्गीकरण करेंगे और उसे कोर्ट में चुनौती मिलेगी, तो इसपर और स्पष्टता आएगी कि इस उप-वर्गीकरण को कैसे लागू किया जाए

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