सऊदी अरब ने लाखों ऊंटों को पासपोर्ट जारी करने का फ़ैसला क्यों किया?

सऊदी अरब देश के लाखों ऊंटों को पासपोर्ट जारी कर रहा है (सांकेतिक तस्वीर)
इमेज कैप्शन, सऊदी अरब देश के लाखों ऊंटों को पासपोर्ट जारी कर रहा है (सांकेतिक तस्वीर)
    • Author, सैयद अब्दुल्लाह निज़ामी
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

सऊदी अरब ने एलान किया है कि वह देश के लाखों ऊंटों को पासपोर्ट जारी कर रहा है.

अधिकारियों का कहना है कि इस क़दम से देश के इन क़ीमती जानवरों को बेहतर तरीक़े से पालने में मदद मिलेगी.

सऊदी अधिकारियों के अनुसार इस क़दम से ऊंट पालन के फ़ायदे बढ़ेंगे. साथ ही जानवरों की पहचान और उनके मालिकों के बारे में एक भरोसेमंद डेटाबेस तैयार होगा.

पर्यावरण, जल और कृषि मंत्रालय की तरफ से सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए एक वीडियो में इससे जुड़े दस्तावेज़ भी दिखाए गए हैं. इसमें एक हरा पासपोर्ट दिखाया गया है जिस पर देश का 'कोट ऑफ़ आर्म्स' (राजचिह्न) और ऊंट की सुनहरी मुहर है.

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साल 2024 में सरकार ने अंदाज़ा लगाया था कि सऊदी अरब में लगभग 22 लाख ऊंट हैं.

ये ऊंट हर साल देश की अर्थव्यवस्था में दो अरब रियाल से अधिक का योगदान देते हैं.

राजधानी रियाद से लगभग 150 किलोमीटर पूर्व में स्थित रामाह में वार्षिक उत्सव में पहुंचे ऊंट सवार (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, राजधानी रियाद से लगभग 150 किलोमीटर पूर्व में स्थित रामाह में वार्षिक उत्सव में पहुंचे ऊंट सवार (फ़ाइल फ़ोटो)

'अरब न्यूज़' के अनुसार दुनिया भर में लगभग 3.5 करोड़ ऊंट हैं, जिनमें से एक करोड़ सत्तर लाख अरब देशों में हैं. इस मामले में अरब देशों में सोमालिया पहले नंबर पर है. उसके बाद सूडान, मॉरिटानिया, सऊदी अरब और यमन हैं.

ऊंट सऊदी अरब के राष्ट्रीय प्रतीक का हिस्सा है. देश में ऊंटों की सौंदर्य प्रतियोगिताएं और शो भी आयोजित किए जाते हैं, जहां बेहतरीन ऊंटों को इनामों से नवाज़ा जाता है.

राष्ट्रीय दिवसों, विशेष और ऐतिहासिक अवसरों पर सऊदी अरब की प्रदर्शनी ऊंटों के बिना अधूरी मानी जाती है. सऊदी अरब और अरब खाड़ी देशों में ऊंटों की भूमिका का एक लंबा इतिहास रहा है.

ऊंटों का इतिहास

1930 में मक्का की ओर जा रहा एक काफिला
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अगर हम संक्षिप्त इतिहास पर नज़र डालें तो हमें बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों की ऐसी तस्वीरें मिलती हैं जिनमें दिखाया गया है कि ऊंट इस्लाम धर्म के पवित्र शहरों मक्का और मदीना के सफ़र के लिए अकेला ज़रिया था.

अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया, दक्षिण एशिया और यहां तक कि सुदूर पूर्व से धार्मिक यात्रा पर निकले लोगों के क़ाफ़िले ऊंटों पर लंबे सफ़र के बाद सऊदी अरब पहुंचते थे. खाड़ी के बंजर रेगिस्तानों में आने-जाने के लिए ऊंटों के इस्तेमाल की परंपरा सदियों पुरानी है.

एक शोध से पता चला है कि सऊदी अरब में पत्थरों पर उकेरी गई ऊंटों की मूर्तियां दुनिया में जानवरों की सबसे पुरानी तस्वीरें हो सकती हैं.

जब साल 2018 में पहली बार उन जगहों में खुदाई की गई तो शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि पत्थरों पर उकेरी गईं ये तस्वीरें लगभग दो हज़ार साल पहले बनाई गई होंगी.

ऐसा अनुमान इसलिए लगाया कि पत्थरों पर उकेरी गईं यह तस्वीरें जॉर्डन के मशहूर प्राचीन शहर पेट्रा में पाए गए पुरावशेषों से मिलती जुलती थीं. हालांकि बाद के शोध में ऊंटों की इन तस्वीरों की उम्र सात हज़ार से आठ हज़ार साल बताई गई.

पत्थरों पर की गई नक़्क़ाशी की सही उम्र तय करना शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी चुनौती रही है क्योंकि गुफा चित्रों के विपरीत इन नमूनों में अक्सर कोई जैविक सामग्री नहीं होती है. इस क्षेत्र में इस स्तर का 'रॉक आर्ट' मिलना भी दुर्लभ है.

सितंबर 2021 में अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने अपने नतीजे 'जर्नल ऑफ़ आर्कियोलॉजिकल साइंस' में प्रकाशित किए.

उन्होंने मूर्तियों की नई तारीख़ तय करने के लिए क्षेत्र में पाए गए क्षरण के पैटर्न, निशानों और जानवरों की हड्डियों का विश्लेषण किया.

ऐसे स्मारक पाषाण युग से भी पुराने बताए जाते हैं जो पाँच हज़ार साल तक प्राचीन हो सकते हैं. यह मिस्र के गीज़ा पिरामिडों से भी पुराने हो सकते हैं जो साढ़े चार हज़ार साल प्राचीन हैं.

ऐसे स्मारक ऊंटों को पालतू जानवर के तौर पर रखने से पहले ही बनाए गए थे जो इस क्षेत्र के आर्थिक विकास की एक अहम पहचान थे.

जब यह मूर्तियां बनाई गई थीं उस वक़्त का सऊदी अरब आज से बिल्कुल अलग था. आज के रेगिस्तानों के बजाय वहां झीलों के साथ बहुत हरियाली और घास वाले क्षेत्र थे.

अभी तक यह साफ़ नहीं है कि ऊंटों की ये मूर्तियां क्यों बनाई गई थीं, लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि यह ख़ानाबदोश क़बीलों के मिलने की जगह रही होगी.

'ऊंटों के बिना रेगिस्तान में ज़िंदा रहना नामुमकिन था'

20वीं शताब्दी के मध्य में, सऊदी अरब और एक अमेरिकी कंपनी के संयुक्त उद्यम में तेल के कुएं के पास ऊंटों का एक झुंड (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, 20वीं शताब्दी के मध्य में, सऊदी अरब और एक अमेरिकी कंपनी के संयुक्त उद्यम में तेल के कुएं के पास ऊंटों का एक झुंड (फ़ाइल फ़ोटो)

सऊदी इतिहासकार और रियाद अख़बार के स्तंभकार बदर बिन सऊद का कहना है कि ऊंट सदियों से अरब प्रायद्वीप में जीवन का अटूट अंग रहे हैं.

उनका कहना है, "ऊंटों के बिना इस झुलसते रेगिस्तान में ज़िंदा रहना नामुमकिन था."

इसी ख़ूबी की वजह से अरब दुनिया की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और जीवन के दूसरे पहलुओं में ऊंट शामिल रहे हैं.

जैसा कि बदर बिन सऊद कहते हैं, "इस्लाम से पहले के दौर में तरफ़ा इब्न अल-अब्द जैसे कवियों ने अपनी कविताओं में ऊंट का ज़िक्र किया था."

डॉक्टर बदर बिन सऊद के अनुसार, "ऊंटों ने इंसानी ज़िंदगी में ऐसा रोल निभाया है कि उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. यही वजह है कि इस्लाम के पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद के पास भी एक ऊंट था जिसका नाम 'क़स्वा' था."

हालांकि सवारी या सामान ढोने के लिए ऊंटों की ज़रूरत कम हो गई है लेकिन अरब नेताओं और उनके बीच प्रेम और ऐतिहासिक संबंध बरक़रार है.

आधुनिक सऊदी अरब के संस्थापक शाह अब्दुल अज़ीज़ के पास ऊंटों का एक रेवड़ था जिसे 'अल-रमात' कहा जाता था और एक ख़ास ऊंट भी था जिसे 'अल-दुवैला' कहा जाता था.

शाह सलमान भी ऊंटों के बड़े शौक़ीन

साल 2018 में किंग अब्दुल अज़ीज़ के ऊंट शो में 30,000 ऊंट लाए गए थे (फ़ाइल फ़ोटो)
इमेज कैप्शन, साल 2018 में किंग अब्दुल अज़ीज़ के ऊंट शो में 30,000 ऊंट लाए गए थे (फ़ाइल फ़ोटो)

बदर बिन सऊद कहते हैं, "बादशाह ने एक बार शहज़ादा सऊद बिन मोहम्मद से कहा था कि वह उन्हें अपने ख़ूबसूरत ऊंटों में से एक 'मुनक़िया' दावत के लिए भेजें. सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के पास 'अल-शरफ़' नाम का एक ख़ूबसूरत और अच्छी नस्ल का ऊंट भी है."

ऊंटों को 'रेगिस्तान का जहाज़' कहा जाता है क्योंकि हर ऊंट चार सौ किलोग्राम तक का भार उठा सकता है.

गाड़ियों और आधुनिक साधनों के न होने के दौर में मक्का में क़ुरैश के सरदारों के क़ाफ़िले इन्हीं ऊंटों पर सीरिया और यमन की यात्रा करते थे.

'उक़लात' कहे जाने वाले व्यापारी चार सौ साल पहले भारत, तुर्की, मोरक्को और नाइजीरिया तक ऊंटों का व्यापार करते थे. कुछ दशक पहले तक ऊंटों का इस्तेमाल तेल निकालने और साफ़ करने में भी किया जाता था.

रंग के आधार पर ऊंटों को कई श्रेणियों में बांटा गया है. ऊंट भूरे से लेकर लाल रंग के होते हैं. ऊंट विशेषज्ञों का कहना है कि ओमान और सूडान के ऊंट अपनी दौड़ने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं जबकि सऊदी अरब के तटीय क्षेत्रों की ऊंटनियां दूध के लिए मशहूर हैं.

वैसे तो दौलतमंद सऊदी अरब अब दुनिया के तकनीकी और आधुनिक युग के साथ चलने के लिए भारी पूंजी निवेश कर रहा है लेकिन इसके साथ-साथ उसकी कोशिश है कि ऊंटों के ऐतिहासिक मूल्य और सांस्कृतिक रंग को इसका हिस्सा बनाया जाए.

फ़िलहाल 'सवानी' नाम की कंपनी ऊंट के दूध और पाउडर उद्योग में निवेश कर रही है और अपने प्रोडक्ट्स का पहले ही 25 देशों में निर्यात कर चुकी है. यह ऊंटनी के दूध से आइसक्रीम भी बनाती है.

ब्रांड 'अबील' ऊंट के ऊन और खाल से कपड़े, हाथ से बने बैग और जूते बनाता है. ऊंट की खाल को मगरमच्छ की खाल के बाद सबसे मज़बूत और टिकाऊ खाल माना जाता है.

सऊदी अरब के 'विज़न 2030' के तहत तेल उद्योग के बाद ऊंट पर आधारित उद्योग देश की आमदनी का एक अहम ज़रिया बन जाएगा.

आमदनी के अलावा ऊंट के साथ इतिहास, धार्मिक परंपराओं और रीति-रिवाजों का अहसास भी जुड़ा है जो सऊदी नागरिकों के लिए मुनाफ़े के साथ-साथ गौरव की बात है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.