इसराइल-हमास युद्ध के बीच इन दो इस्लामिक देशों की नाराज़गी का क्या होगा असर?

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन और मलेशिया के पीएम अनवर इब्राहिम
इमेज कैप्शन, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन और मलेशिया के पीएम अनवर इब्राहिम
    • Author, प्रियंका झा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

इसराइल और हमास के बीच संघर्ष को एक महीना पूरा होने के बाद तुर्की और मलेशिया ने फ़लस्तीन के चरमपंथी संगठन हमास के समर्थन में जो कदम उठाए हैं, उसकी चर्चा हो रही है.

तुर्की ने इसराइली सेना का समर्थन करने के आरोप में अपनी संसद के रेस्तरां में कोका-कोला और नेस्ले के उत्पादों पर पाबंदी लगा दी है.

वहीं, मुस्लिम देश मलेशिया के प्रधानमंत्री ने दो टूक कहा है कि उनका देश अमेरिका की ओर से फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास के विदेशी समर्थकों पर लगाए एकतरफ़ा प्रतिबंधों को मान्यता नहीं देगा.

सात अक्टूबर को संघर्ष शुरू होने के बाद तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन की ओर से सख्त प्रतिक्रिया न दिखने पर चर्चा तेज़ थी. तुर्की के रवैये को 'तटस्ठ' कहा जा रहा था क्योंकि उसने इस जंग के लिए न तो इसराइल पर उंगली उठाई और न ही हमास पर.

लेकिन, पिछले सप्ताह ही तुर्की ने इस रुख़ से हटकर ग़ज़ा पट्टी में आम लोगों पर इसराइली बमबारी और बदतर होते मानवीय हालात का हवाला देते हुए इसराइल से अपने राजदूत को वापस बुलाया था.

तुर्की की प्रतिक्रिया इसलिए भी मायने रखती है क्योंकि वो 31 सदस्यीय सैन्य गठबंधन नेटो का सदस्य है. इसी नाते वह अमेरिका के सहयोगी देशों में से भी एक है. फिलहाल अमेरिका संघर्ष में खुलकर इसराइल के साथ खड़ा है.

माना जा रहा है कि अर्दोआन हालिया रुख़ से उनकी सरकार और नेटो सदस्य देशों के बीच तनाव बढ़ सकता है. तुर्की से पश्चिमी देशों का तनाव पहले से ही बढ़ा हुआ है.

मलेशिया और अमेरिका के बीच अच्छे कारोबारी रिश्ते हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि दोनों के संबंधों में तनाव का असर इनके कारोबार पर पड़ सकता है.

मलेशिया ने हमास के बचाव में क्या कहा?

फ़लस्तीन के समर्थन में मलेशिया में रैली
इमेज कैप्शन, फ़लस्तीन के समर्थन में मलेशिया में रैली
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
दिनभर
Dinbhar: आवाज़ वही, अंदाज़ नया

देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.

एपिसोड

समाप्त

फ़लस्तीनी संगठनों को मिलने वाली वित्तीय सहायता में कटौती करने के मकसद से अमेरिका की प्रतिनिधि सभा में 'द हमास इंटरनेशनल फ़ाइनेंसिंग प्रिवेंशन एक्ट' को पिछले सप्ताह पारित किया गया. अब अमेरिकी सीनेट में इस प्रस्ताव पर वोटिंग होनी है.

इस प्रस्ताव के संदर्भ में ही मलेशिया के एक विपक्षी सांसद ने संसद में सवाल किया था. इसके जवाब में प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने फ़लस्तीनियों के आत्मरक्षा के अधिकार को दोहराया और कहा कि उनका देश अमेरिकी दबाव के बावजूद हमास के साथ अपने रिश्तों को बरकरार रखेगा.

उन्होंने कहा कि हमास को मिल रही बाहरी मदद पर रोक लगाने के अमेरिकी प्रयास एकतरफ़ा हैं और मलेशिया इसे मान्यता नहीं देगा.

मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने कहा कि उनकी सरकार इस बिल पर हो रही गतिविधियों पर नज़र रखे हुए है. उन्होंने कहा कि इस बिल का मलेशिया पर तभी असर होगा जब ये साबित हो जाए कि उसने हमास या फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद को किसी भी तरह की मदद दी है.

संसद में दिए एक लिखित जवाब में पीएम अनवर इब्राहिम ने कहा, "मलेशिया के ख़िलाफ़ किसी भी प्रतिबंध का असर मलेशिया से लेकर अमेरिकी सरकार और कंपनियों के आंकलन पर भी पड़ेगा. साथ ही इससे मलेशिया में अमेरिकी कंपनियों के निवेश के मौके भी प्रभावित होंगे."

ये पहली बार नहीं है जब मलेशिया ने इसराइल पर सख्त रवैया अपनाया हो. पिछले महीने ही मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में हज़ारों की संख्या में लोगों ने फ़लस्तीनी लोगों के प्रति एकजुटता दिखाने के लिए रैली की थी.

इससे पहले भी पीएम अनवर ने कहा था कि वो हमास की निंदा करने के लिए पश्चिमी दबाव में नहीं आएंगे.

उन्होंने कहा था कि पश्चिम और यूरोपिय देश बार-बार मलेशिया से हमास की निंदा करने के लिए कह रहे हैं. हालांकि, इस दावे के समर्थन में उन्होंने कोई और जानकारी नहीं दी.

इसराइल-हमास संघर्ष

संसद में पीएम अनवर ने बताया, "मैंने कहा कि नीतिगत तौर पर हमारा हमास से पुराना रिश्ता है और ये जारी रहेगा. हम उनके (पश्चिम) दबाव बनाने वाले रवैये से सहमत नहीं हैं. हमास भी चुनाव के ज़रिए ग़ज़ा में जीता है और ग़ज़ा के लोगों ने उन्हें सत्ता सौंपी है."

दरअसल, मुस्लिम बहुल मलेशिया लंबे समय से फ़लस्तीन के मुद्दे का मुखर समर्थक रहा है और वह इसराइल और फ़लस्तीन के विवाद को सुलझाने के लिए दो राष्ट्र समाधान की वकालत करता है.

मलेशिया और इसराइल के बीच कूटनीतिक संबंध नहीं हैं.

एशिया में ऐसे छह ही देश हैं जो इसराइल को देश के रूप में मान्यता नहीं देते. बाकी पांच में इंडोनेशिया, ब्रुनेई, बांग्लादेश, मालदीव और पाकिस्तान हैं.

हमास के शीर्ष नेता अतीत में कई बार मलेशिया का दौरा कर चुके हैं और वहां के नेताओं से मुलाकात करते रहे हैं.

मलेशिया के इसराइल से संबंध नहीं है लेकिन अमेरिका और उसके कूटनीतिक रिश्ते साल 1957 से चल रहे हैं. हालांकि, मलेशिया ने अमेरिका के साथ अपने संबंधों को कभी बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं किया.

लेकिन अमेरिका मलेशिया का तीसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. ब्लूमबर्ग के डेटा के हवाले से टाइम डॉट कॉम की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले साल दोनों देशों के बीच 77 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था.

इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफ़ेयर के फ़ेलो और मध्य-पूर्व मामलों के जानकार फज़्ज़ुर रहमान सिद्दीक़ी अमेरिका और हमास पर मलेशिया के रुख को दोतरफ़ा दबाव से जोड़ते हैं.

वह कहते हैं, "जैसे-जैसे ये युद्ध लंबा खिंचता जा रहा है, हर देश पर दो तरह के दबाव बनते जा रहे हैं. पहला तो ग्लोबल कम्युनिटी, या मुस्लिम देश आपकी ओर देख रहे हैं कि आप इस युद्ध पर कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं. दूसरा दबाव घरेलू स्तर पर है. मलेशिया ने जो रुख अपनाया है, वो इसी का हिस्सा है. किसी भी देश ने अभी तक हमास पर अपना रुख नहीं बदला है. फिर वो इसके समर्थन में हो या विरोध में. बल्कि सबका रुख और मज़बूत हुआ है."

यानी जो लोग हमास विरोधी थे वो ख़ामोश हैं, जो लोग हमास समर्थक थे वो और मुखर हुए हैं और जो पहले से ही मुखर थे उनका लहज़ा अब और कड़ा हुआ है.

सिद्दीक़ी कहते हैं कि मलेशिया के पीएम ने जो बयान दिया वो ये मजबूरी दिखाता है कि अगर अमेरिका नहीं समझ रहा कि इसराइल क्या कर रहा है तो हम ये क्यों समझे कि हमास क्या कर रहा है.

उनका कहना है कि ये चीज़ें लंबे समय तक चलेंगी. इस पर जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं वो एक क्षणिक हैं. दुनिया में भी ये दबाव है कि इसराइल-हमास संघर्ष के बीच मुस्लिम देश क्या कर रहे हैं. इसी को देखते हुए मलेशिया ने स्टैंड लिया है. मलेशिया का बयान आम लोगों की नाराज़गी और गुस्से को कम करने में कितना मदद करेगा, ये आने वाले समय में पता चलेगा."

सिद्दीकी का मानना है कि मलेशिया और इंडोनेशिया अमेरिका की नज़र में जो छवि है वो अरब देशों की तुलना में थोड़ी नरम और उदार मुस्लिम देश की है. ऐसे में मलेशिया के रुख का अमेरिका से संबंधों पर कोई असर होगा, ऐसा लगता नहीं है.

तुर्की की संसद में बैन कोका कोला और नेस्ले

रेचेप तैयप अर्दोआन
इमेज कैप्शन, तुर्की में आयोजित की गई थी फ़लस्तीन के समर्थन में रैली

तुर्की की संसद ने मंगलवार को अपने रेस्तरां से ग़ज़ा में जारी संघर्ष के बीच इसराइल को कथित तौर पर समर्थन देने के लिए कोका-कोला और नेस्ले के उत्पादों को हटाने का निर्णय लिया.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार इन दोनों कंपनियों ने ताज़ा घटनाक्रम पर अभी तक प्रतिक्रिया नहीं दी है.

तुर्की की ग्रैंड नेशनल असेंबली ने कंपनियों की पहचान बताए बिना कहा, "इसराइल को समर्थन देने वाली कंपनियों के उत्पाद संसद परिसर के रेस्तरां, कैफ़ेटेरिया और टी हाउसों में नहीं बेचे जाएंगे."

रॉयटर्स के अनुसार तुर्की के संसद के स्पीकर नुमान कर्तुलमस ने ये फ़ैसला लिया है.

एक सूत्र के हवाले से रॉयटर्स ने कहा, "मेन्यू से सिर्फ़ कोका-कोला के पेय पदार्थों औऱ नेस्ले की इंस्टेंट कॉफ़ी को हटाया गया है." सूत्र ने ये भी कहा कि 'इसराइल को समर्थन देने की वजह से इन कंपनियों के ख़िलाफ़ आम जनता के विरोध को देखते हुए ये फ़ैसला लिया गया है.'

हालांकि, संसद के बयान और सूत्र दोनों के ज़रिए ही ये स्पष्ट नहीं हो पा रहा कि कोका कोला और नेस्ले ने इसराइल के युद्ध प्रयासों को किस तरह समर्थन दिया.

सात अक्टूबर को हमास के हमले और उसके बाद गज़ा में इसराइली हमले के बाद अर्दोआन का बयान बहुत सधा हुआ रहा. लेकिन महले के करीब 20 दिन गुज़रने के बाद अचानक से अर्दोआन ने अपना तेवर बदल लिया.

तुर्की के राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में पश्चिम के देशों को भी घेरा. अर्दोआन ने पश्चिम के देशों को इसराइल का साथ देने के लिए आड़े हाथों लिया.

अर्दोआन ने कहा, ''हमास कोई आतंकवादी संगठन नहीं है. हमास आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा है. यह मुजाहिदीन है जो अपनी ज़मीन और आवाम की जंग लड़ रहा है.''

तुर्की और इसराइल के संबंध मुश्किलों से भरे रहे हैं. लेकिन तुर्की दुनिया का पहला मुस्लिम बहुत देश था, जिसने इसराइल को मान्यता दी थी.

  • अगस्त 2005: इसराइल के पीछे हटने के बाद ग़ज़ा फ़लस्तीनी अथॉरिटी के पास गया
  • जनवरी 2006: हमास ने फ़लस्तीनी चुनाव में बहुमत हासिल किया
  • दिसंबर 2008: इसराइल ने ग़ज़ा में 22 दिनों तक सैन्य कार्रवाई की
  • नवंबर 2012: आठ दिनों तक इसराइल और फ़लस्तीन के बीच चली बमबारी
  • जुलाई-अगस्त 2014: सात सप्ताह तक चली जंग में 2100 फ़लस्तीनियों, 73 इसराइलियों की मौत
  • अगस्त 2018: इसराइली सीमा के पास महीनों तक चले प्रदर्शन में 170 फ़लस्तीनियों की मौत
  • मई 2021: अल-अक्सा में इसराइली सिक्योरिटी फोर्स से झड़प में सैकड़ों फ़लस्तीनी घायल
  • अगस्त 2022: इसराइली हमले के निशाने में इस्लामिक जिहाद कमांडर के मारे जाने के बाद तीन दिन तक हिंसा चली
  • अक्टूबर 2023: हमास ने सबसे इसराइल पर सबसे बड़ा हमाल किया, 32 दिनों में 10,300 फ़लस्तीनियों की मौत

अर्दोआन पिछले दो दशक से तुर्की की सत्ता में हैं और फ़लस्तीनियों को लेकर इसराइल को आड़े हाथों लेते रहते हैं.

लेकिन हाल ही में अर्दोआन ने इसराइल से संबंध गहरा करने की कोशिश की थी और वह इसराइल का दौरा भी करने वाले थे.

लेकिन इसराइल और हमास के बीच ताज़ा विवाद से इन कोशिशों को धक्का पहुंचा है. नेस्ले और कोका कोला के उत्पादों पर पाबंदी को इसकी झलक कहा जा सकता है.

इसी सप्ताह इसराइल के समर्थन में खड़े अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने तुर्की में अपने समकक्ष हकन फिदान से अंकारा पहुंचकर ढाई घंटे लंबी बातचीत की.

इस बीच ऐसी ख़बरें भी आईं कि ब्लिंकन को अंकारा में गर्मजोशी भरा स्वागत नहीं मिला. अर्दोआन ने भी ब्लिंकन से मुलाकात नहीं की.

लेकिन फज़ुर्ररहमान इन प्रतिक्रियाओं को क्षणिक मानते हैं. उनका कहना है कि सरकारें जानती हैं कि एक दिन ये युद्ध ख़त्म होगा. हां, लेकिन किसी देश के साथ रिश्ते दीर्घकालिक समय के लिए होते हैं. ऐसे रिश्तों में एक-दो साल के लिए तनातनी हो सकती है.

इसका उदाहरण देते हुए वह कहते हैं कि 2018 में ग़ज़ा में फ़लस्तीनी प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ इसराइल की हिंसक कार्रवाइयों के विरोध में तुर्की ने अपने राजदूत को तेल अवीव से वापस बुला लिया था. चार साल तक गतिरोध के बाद तुर्की और इसराइल ने राजनयिक संबंध बहाल किए.

लेकिन इस दौरान तुर्की ने इस दौरान ऐसा भी नहीं हुआ कि फ़लस्तीन के मुद्दे पर तुर्की ने बहुत कुछ किया हो. जितनी भी चीज़े हो रही हैं वो डिप्लोमैटिक पोस्चरिंग है. इसका सीधे कोई असर नहीं पड़ेगा. तुर्की की प्रतिक्रियाओं का मकसद है कि इसराइल विरोधी भावनाओं को कैसे जगह दी जाए.

सिद्दीकी कहते हैं, "ब्लिंकन को स्वागत न देना, हमास के लिए आवाज़ उठाना ये सारी चीज़ें अपने अंदरूनी मामलों को ध्यान में रखते हुए हो रही हैं. मुझे नहीं लगता कि अमेरिका और तुर्की पर इसका दीर्घकालिक असर होगा. ताज़ा संघर्ष में ही इसराइल ने अपने राजनयिक को वापस बुलाया लेकिन तुर्की ने इसकी पहल नहीं की. ये सब एक सायकोलॉजिकल वॉर की तरह भी है कि कौन पहले क्या कर रहा है."

उनका कहना है कि फिलहाल हर देश ये चाह रहा है कि वो किसी भी तरह से अपने आपको कमज़ोर नहीं दिखाना चाहते. लेकिन ये समझना कि दो देशों के रिश्ते इससे हमेशा के लिए खराब हो जाएंगे, तो ऐसा नहीं होगा.

"साल 2008 से लेकर 2023 तक ग़ज़ा में ये छठा युद्ध है लेकिन इससे किसी भी दो देश के रिश्ते खराब नहीं हुए. बल्कि रिश्ते तो अच्छे हुए हैं. इसी बीच अब्राहम समझौता हुआ. इसी बीच तुर्की और इसराइल के रिश्ते बहाल हुए. इसी बीच इसराइल के राष्ट्रपति तुर्की भी गए. नेतन्याहू भी तुर्की जाने वाले थे."

साल 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने इसराइल के साथ ऐतिहासिक समझौता किया था जिसे 'अब्राहम समझौता' कहा जाता है. इस समझौते के तहत यूएई और बहरीन ने इसराइल के साथ अपने रिश्तों को सामान्य किया था और राजनयिक रिश्तों को बहाल कर लिया था.

सिद्दीक़ी कहते हैं, "अमेरिका और तुर्की का कारोबार, सैन्य रिश्ता है. रणनीतिक संबंध है दोनों के बीच. नेटो में अमेरिका के बाद दूसरा सबसे ताकतवर देश ही तुर्की है.

फिलहाल तुर्की की प्राथमिकता इसराइल को लेकर जितनी भी शिकायतें हैं उन्हें जगह देना है. ये उसके घरेलू राजनीति के लिहाज़ से ज़रूरी है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)