पीठ के बल लेटकर बच्चे को जन्म देना ख़तरनाक, फिर भी ऐसा क्यों किया जाता है

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- Author, लूसी शेरिफ़
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
क्या आप जानते हैं कि पीठ के बल लेटकर बच्चे को जन्म देना महिलाओं के लिए ख़तरनाक माना जाता है, फिर भी वह ऐसा करती हैं- क्यों? इसकी वजह एक फ़्रांसीसी व्यक्ति है, जिसे यह तरीक़ा ज़्यादा सुविधाजनक लगा था- लेकिन औरतों के लिए नहीं, बल्कि मर्दों के लिए.
हज़ारों सालों तक, दुनिया भर में महिलाएं सीधे आसन या सीधे बैठकर (upright position) में बच्चे को जन्म देती रही हैं, चाहे वह क्लियोपेट्रा की तरह घुटनों के बल बैठकर हो, डिलीवरी स्टूल या कुर्सियों का सहारा लेकर हो या फिर उकड़ूं बैठकर.
दरअसल, उकड़ूं बैठने से श्रोणि का व्यास कम से कम 2.5 सेंटीमीटर (1 इंच) तक बढ़ सकता है, और गुरुत्वाकर्षण की मदद मिलने से प्रसव कहीं ज़्यादा आसान हो जाता है.
तो फिर आज इतनी सारी महिलाएं पीठ के बल लेटकर बच्चे को जन्म क्यों देती हैं?
जेनेट बालास्कस ब्रिटेन के एक्टिव बर्थ सेंटर की संस्थापक और मांओं को अपने प्रसव के अनुभव पर नियंत्रण कैसे रखना चाहिए, इसके बारे में कई किताबों की लेखिका हैं. वह कहती हैं, "प्रसव की शारीरिक प्रक्रिया को लेकर पेशेवरों और गर्भवती महिलाओं, दोनों में ही व्यापक अज्ञानता है."
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बालास्कस ने 1982 में एक्टिव बर्थ मेनिफेस्टो प्रकाशित किया था, जो आगे चलकर उनके संगठन का मूल सिद्धांत बन गया.
उस घोषणापत्र में लिखा है, "दुनिया भर में और हज़ारों वर्षों से महिलाएं स्वाभाविक रूप से प्रसव की प्रक्रिया से गुज़रती रही हैं और किसी न किसी सीधे या झुके हुए आसन में बच्चे को जन्म देती रही हैं. जाति या संस्कृति चाहे जो भी हो… यही सीधे खड़े रहने वाले आसन (upright position) सबसे ज़्यादा प्रचलित रहे हैं."
बालास्कस कहती हैं कि औद्योगिक-युग के बाद ज़्यादातर देशों में आज महिलाओं को अस्पतालों में लेटने की मुद्रा तक सीमित कर दिया जाता है. वह कहती हैं, "यह तरीक़ा पूरी तरह अतार्किक है- यह प्रसव को बेवजह जटिल और महंगा बना देता है, एक प्राकृतिक प्रक्रिया को चिकित्सकीय कार्यक्रम में बदल देता है और प्रसव से गुज़र रही महिला को एक निष्क्रिय मरीज़ बना देता है."
वह आगे कहती हैं, "इतने निर्णायक समय पर कोई दूसरी प्रजाति इतना नुक़सानदेह आसन नहीं अपनाती."
दूसरे विशेषज्ञ भी इससे सहमत हैं. ऑस्ट्रेलिया की वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी में मिडवाइफ़री की प्रोफ़ेसर हैना डालेन ने 2013 में 'द कन्वर्सेशन' के लिए लिखे एक लेख में कहा था कि लेटकर बच्चे को जन्म देना 'तुलनात्मक रूप से एक आधुनिक परिघटना' है.
गर्भावस्था को 'बीमारी' मानना

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महिलाओं के पीठ के बल लेटकर बच्चे को जन्म देने का चलन पिछले 300 से 400 सालों में ही ज़्यादा फैला है. इसके लिए महिलाएं एक फ़्रांसीसी आदमी फ़्रांस्वा मॉरिसो का धन्यवाद दे सकती हैं.
मॉरिसो का दावा था कि लेटकर प्रसव करना गर्भवती महिला के लिए ज़्यादा आरामदेह होगा और उसकी देखरेख करने वाले पुरुष डॉक्टर के लिए भी ज़्यादा सुविधाजनक रहेगा (उस समय दाइयों को हटाकर पुरुष सर्जनों को प्रसव प्रक्रिया में शामिल करने की मुहिम चल ही रही थी).
मॉरिसो गर्भावस्था को एक बीमारी की तरह देखता था. 1668 में प्रकाशित अपनी किताब 'द डिज़ीज़िस ऑफ़ वीमेन विद चाइल्ड एंड चाइल्ड-बेड' में उसने सलाह दी थी, "सबसे अच्छा और सबसे सुरक्षित तरीका यही है कि औरतें अपने ही बिस्तर पर प्रसव करें, ताकि बाद में वहां ले जाने से होने वाली असुविधा और परेशानी से बचा जा सके."
हालांकि कुछ विद्वानों का मानना है कि प्रसव की मुद्रा में यह बदलाव असल में उसी दौर के एक और फ़्रांसीसी आदमी, राजा लुई चौदहवें, की वजह से आया हो सकता है.
अमेरिका के मैरीलैंड स्थित मैकडैनियल कॉलेज में समाजशास्त्र की प्रोफ़ेसर लॉरेन डंडेस ने 1987 में प्रसव की मुद्राओं के विकास पर लिखे अपने शोधपत्र में लिखा, "कहा जाता है कि लुई चौदहवें को महिलाओं को बच्चा जन्म देते हुए देखना पसंद था. लेकिन जब महिलाएं बर्थिंग स्टूल पर बैठकर प्रसव करती थीं, तो दृश्य साफ़ दिखाई नहीं देता था, जिससे वह झुंझला जाता था. इसी वजह से उसने नई, लेटी हुई मुद्रा को बढ़ावा दिया."
वह आगे कहती हैं, "राजा की नीति का प्रभाव कितना था, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन शाही परिवार के व्यवहार का आम जनता पर कुछ न कुछ असर तो पड़ता ही है. लुई चौदहवें की कथित मांग का समय प्रसव की मुद्रा में आए बदलाव से मेल खाता है और संभव है कि यह भी एक योगदान देने वाला कारण रहा हो."
महिलाओं को पीठ के बल लिटाकर प्रसव करवाने की परंपरा चाहे जैसी भी बनी हो, यह चलन कायम रहा और इसका ख़ामियाज़ा महिलाओं के प्रसव अनुभव को भुगतना पड़ा.
बालास्कस कहती हैं, "प्रसव एक संस्थागत प्रक्रिया बन गया है, और घर पर प्रसव जैसे विकल्प लगातार कम होते जा रहे हैं, जो शारीरिक या 'प्राकृतिक' तरीके से बच्चा पैदा करना चाहने वाली कई महिलाओं के लिए ज़्यादा अनुकूल होते हैं."
विज्ञान कहता है?

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हज़ारों सालों तक महिलाओं द्वारा सीधे आसन में प्रसव करने की सबसे बड़ी वजह बिल्कुल सीधी है: गुरुत्वाकर्षण. बच्चे को जन्म नाल के रास्ते नीचे की ओर आना होता है, और इस प्रक्रिया में गुरुत्वाकर्षण सहायक होता है.
यह भी साबित हुआ है कि अगर महिलाओं को अपने हाल पर छोड़ दिया जाए, तो वे प्रसव के दौरान स्वाभाविक रूप से आगे की ओर झुकती हैं, पीछे की ओर नहीं. वे उकड़ूं बैठने, हाथ घुटनों के बल झुकने, या किसी नीची चीज़ का सहारा लेकर आगे झुकने जैसी मुद्राएं अपनाती हैं.
2013 में 5,200 से ज़्यादा महिलाओं को शामिल करने वाले 25 अध्ययनों का एक विश्लेषण किया गया था. इस समीक्षा में पाया गया कि जो महिलाएं लेटकर प्रसव करने के बजाय सीधे या चलती फिरती अवस्था में बच्चे को जन्म देती हैं, उनके लिए कई अहम नतीजे बेहतर होते हैं.
इनमें "सीज़ेरियन डिलीवरी का जोखिम कम होना, दर्द कम करने के लिए एपिड्यूरल का कम इस्तेमाल, और शिशु के नियोनेटल यूनिट में भर्ती होने की संभावना का कम होना" शामिल है.
हालांकि, इस समीक्षा में यह भी कहा गया कि उच्च जोखिम वाली महिलाओं पर और शोध की ज़रूरत है- क्योंकि कुछ अध्ययनों में सीधे आसन में प्रसव के दौरान खून ज़्यादा बहने की बात भी सामने आई है.
यह भी पाया गया है कि सीधे बैठकर या खड़े होकर प्रसव करने से प्रसव की अवधि कम हो जाती है.
2013 में डालेन ने लिखा था, "सीधे आसन में प्रसव पीड़ा झेलना और सीधे आसन में ही बच्चे को जन्म देना, मां और बच्चे, दोनों के लिए फ़ायदेमंद होते हैं."
उन्होंने इसके कई लाभ गिनाए, जिनमें ज़्यादा प्रभावी संकुचन, मां को कम दर्द, फ़ॉर्सेप्स या वैक्यूम की ज़रूरत कम पड़ना, चीरा (एपिसियोटॉमी) कम लगना, और गर्भ में शिशु तक बेहतर ऑक्सीजन पहुंचना शामिल है, क्योंकि इस स्थिति में गर्भाशय मां की धमनियों पर दबाव नहीं डालता.
2011 में डालेन और उनके साथियों ने प्रसव पीड़ा से गुज़र रही महिलाओं पर एक अध्ययन किया, ताकि यह समझा जा सके कि बच्चे के जन्म की जगह का इस बात पर क्या असर पड़ता है कि महिलाएं प्रसव के दौरान कौन सी मुद्रा अपनाती हैं.
उन्होंने दो तरह की व्यवस्थाओं को देखा- बर्थ सेंटर, जहां गेंदें, बर्थिंग स्टूल और बीन बैग जैसे सहायक उपकरण उपलब्ध थे, और डिलीवरी वार्ड, जहां सिर्फ़ मेडिकल अस्पताल का बिस्तर ही विकल्प था.

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उन्होंने पाया कि बर्थ सेंटर में मौजूद महिलाएं, डिलीवरी वार्ड की तुलना में, प्रसव के पहले और दूसरे चरण के दौरान कहीं ज़्यादा सीधे आसन अपनाती थीं. बर्थ सेंटर में 82 प्रतिशत महिलाओं ने ऐसा किया, जबकि डिलीवरी वार्ड में यह आंकड़ा सिर्फ़ 25 प्रतिशत था.
बालास्कस के अनुसार, अब पश्चिमी देशों में 'एक्टिव बर्थ' की अवधारणा को लेकर जागरूकता बढ़ रही है. यह ऐसा तरीका है जिसमें माना जाता है कि प्रसव के दौरान मां को आज़ादी से और स्वाभाविक रूप से हिलने डुलने दिया जाए और वह सीधे आसन अपना सके, न कि पीठ के बल लेटकर मशीनों और मॉनिटरों से बंधी रहे. हालांकि, वह कहती हैं कि सीज़ेरियन की दरें अब भी 'चिंताजनक रूप से' बढ़ती जा रही हैं
वह कहती हैं, "ब्रिटेन में एक्टिव बर्थ ने मैटरनिटी सेवाओं में बदलाव को प्रभावित किया है, जैसे दाई के नेतृत्व वाले बर्थ सेंटर का विकल्प." ये आम तौर पर अस्पतालों के भीतर ही होते हैं और ख़ास तौर पर इस तरह बनाए जाते हैं कि महिलाओं को हिलने डुलने की स्वतंत्रता मिले और बर्थ पूल तक पहुंच हो. पचास साल पहले ऐसा कुछ मौजूद ही नहीं था."
ब्रिटेन के नेशनल इंस्टिट्यूट फ़ॉर हेल्थ एंड केयर एक्सीलेंस (एनआईसीई) की गाइडलाइंस भी सलाह देती हैं कि प्रसव के दूसरे चरण में महिलाओं को "पीठ के बल या आधे लेटे हुए रहने से हतोत्साहित किया जाना चाहिए और उन्हें वह कोई भी दूसरी मुद्रा अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिसमें वे सबसे ज़्यादा सहज महसूस करें."
आख़िरकार, जानकारी ही ताक़त है और जब महिलाओं को अपने प्रसव के विकल्पों की ज़्यादा जानकारी होती है, तो वे अपने लिए जो सही लगता है, उसे चुनने में उतनी ही ज़्यादा सहज होती हैं.
कनाडा की मैकमास्टर यूनिवर्सिटी में मिडवाइफ़री शिक्षा कार्यक्रम चलाने वाली आइलीन हटन दाई से अकादमिक बनी हैं और प्रसव पर कई शोधपत्रों की लेखिका हैं.
वह कहती हैं, "प्रसव के विकल्पों को लेकर सार्वजनिक शिक्षा हमेशा उपयोगी रहेगी. लोकप्रिय साहित्य, टेलीविज़न और फ़िल्मों में प्रसव को जिस तरह दिखाया जाता है, उस पर एक नज़र डालने से ही साफ़ हो जाता है कि यह प्रक्रिया कितनी ग़लत ढंग से पेश की जाती है. इसके मुकाबले संतुलित जानकारी देना मददगार ही रहेगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































