कॉकरोच जनता पार्टी का मीम से शुरू होकर सड़क पर पहुंचना क्या संकेत देता है?

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- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके शनिवार सुबह अमेरिका से भारत पहुंच रहे हैं और सीजेपी की जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की योजना है.
एक व्यंगात्मक सोशल मीडिया कैंपेन 'कॉकरोच जनता पार्टी' यानी सीजेपी, शनिवार को वर्चुअल दुनिया से वास्तविक दुनिया यानी कि सड़क पर उतर रही है.
अपनी योजना के बारे में सीजेपी ने एक्स हैंडल 'कॉकरोच इज़ बैक' पर एक पोस्ट पर जानकारी दी है.
इसमें कहा गया है, "6 जून, सुबह 9 बजे- मिलते हैं कल, साथी कॉकरोचों. हम धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा लेकर रहेंगे. अब समय आ गया है कि इस छोटे से मज़ाक को एक आंदोलन में बदल दिया जाए."
हालांकि अभी स्पष्ट नहीं है कि दिल्ली पुलिस से प्रदर्शन की इजाज़त मिलेगी या आगे क्या होगा.
लेकिन एक तंज़ और उसके बाद मीम के साथ शुरू हुए इस सोशल मीडिया कैंपेन को कितनी गंभीरता से किए जाने की ज़रूरत है?
राजनीतिक विश्लेषकों का लगता है कि शनिवार को दिल्ली में जुटने वाले लोगों की संख्या बहुत कुछ तय करेगी, लेकिन इतना तो तय है कि सीजेपी को ख़ारिज नहीं किया जा सकता.
'तिरंगा, किताबें और फूल लेकर आएं'

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कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके छह जून की सुबह भारत पहुंचेंगे. सीजेपी के एक्स हैंडल 'कॉकरोच इज़ बैक' से एक वीडियो पोस्ट किया गया, जिसमें उनके कार्यक्रम की जानकारी दी गई.
इस वीडियो में सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका नज़र आ रहे हैं.
वीडियो में सौरव दास ने कहा, "अभिजीत दीपके सुबह 8 बजे दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचेंगे. वहां से वो अन्य कार्यकर्ताओं के साथ पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन जाएंगे. आप सबसे अनुरोध है कि आप वहां पहुंचिए."
उन्होंने बताया कि वहां पुलिस से सहयोग और आंदोलन की अनुमति मांगी जाएगी. सौरव दास ने कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थकों से अपील की कि वो शांति बनाए रखें और लोकतांत्रिक तरीक़े से ही विरोध करें.
आशुतोष रांका ने समर्थकों से अपील की कि वो अपने साथ तिरंगा झंडा, किताबें और फूल लेकर आएं, साथ ही अपने परिवार को भी साथ लाएं.
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की है कि 'धर्मेंद्र प्रधान को बर्खास्त करें लोकतंत्र में हमारा विश्वास कायम करें.'
इससे पहले सौरव दास ने कहा था कि प्रदर्शन में सभी राजनीतिक दलों के लोगों का स्वागत है.
क्या कहते हैं विश्लेषक

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सीजेपी ने एक्स पर एक ट्वीट में यह भी कहा था कि "याद रखिए कि क्या करना है और क्या नहीं करना है. सबकी नज़रें हम पर हैं."
और शायद सबकी नज़रें शनिवार को सीजेपी और उसकी अपील पर पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन और जंतर-मंतर में जुटने वाले लोगों पर भी होगी.
सोशल मीडिया पर सीजेपी पर अविश्वास जताने वाले लोगों की भी कमी नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि सीजेपी को गंभीरता से लिए जाने की कितनी ज़रूरत है?
जाने-माने राजनितिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने 30 मई को अपने एक्स पर लिखा, "कॉकरोच जनता पार्टी' कोई पार्टी नहीं है. यह जनता से अलग कुछ नहीं है. यह कोई आंदोलन नहीं, बस एक पल है और इसलिए यह मायने रखती है."
"यह उस ऊर्जा की एक दुर्लभ झलक दिखाती है जो तानाशाही हमलों से गणतंत्र को वापस हासिल कर सकती है. यह कोई लहर नहीं, बल्कि एक अंदरूनी धारा है. इसे नज़रअंदाज़ करना ग़लती होगी."
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक पर्यवेक्षक स्मिता शर्मा कहती हैं कि देखने की सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि कितने लोग सड़क पर आते हैं.
वह कहती हैं, "सोशल मीडिया पर तो सीजेपी के साथ बहुत बड़ी संख्या में लोग जुड़े हुए हैं, इंस्टाग्राम पर ही क़रीब दो करोड़ फ़ॉलोअर्स हैं. उतने की उम्मीद करना तो ग़लत होगा. लेकिन अगर कुछ हज़ार लोग भी अगर जंतर-मंतर पहुंचे तो इस आंदोलन को गंभीरता से देखने की ज़रूरत होगी."

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वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई को भी लगता है कि संख्या से बहुत कुछ तय होगा.
वह कहते हैं, "सोशल मीडिया और उसके ज़मीनी असर का आकलन हम ठीक से नहीं कर पाते हैं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के आंदोलन के समय यूपीए के अहमद पटेल, प्रणव मुखर्जी जैसे बड़े अनुभवी राजनेता जनता के उस मनोभाव को समझ नहीं पाए."
"वह कहते थे कि यह युवाओं का आक्रोश एक बादल जैसा है, जो गुज़र जाएगा लेकिन वह बादल गुज़रा नहीं, जमकर बरसा और उनको बहुत नुक़सान पहुंचाया."
किदवई कहते हैं, "बतौर राजनैतिक संवाददाता मैंने 70 के दशक से अब तक बहुत सारी जनसभाएं देखी हैं. एक समय था जब जनसभा में लाख-दो लाख लोग आ जाते थे."
"जयप्रकाश नारायण, इंदिरा गांधी, चरण सिंह, चंद्रशेखऱ जैसे नेताओं की बड़ी-बड़ी सभाएं होती थीं. लेकिन 90 के दशक के बाद भीड़ कम होती गई. अब 50 हज़ार लोग भी पहुंच जाते हैं तो बहुत माना जाता है."
"इसलिए शनिवार का दिन महत्वपूर्ण होगा. अगर 20-25 हज़ार से ज़्यादा लोग जमा होंगे तो मैं उसे बहुत महत्व दूंगा. उसमें युवा कितने हैं, कौन सी पीढ़ी के लोग शामिल हो रहे हैं; यह भी देखने वाली बात होगी."
"फ़ेसबुक, इंस्टा, एक्स से हटकर दिल्ली की गर्मी में अगर 25 हज़ार लोग पहुंच जाते हैं तो वह बहुत उल्लेखनीय होगा और यह सोचने पर मजबूर करेगा कि इनमें कोई दम है."
'विरोध बताता है कि गंभीरता से लिया जा रहा है'

रशीद किदवई कहते हैं, "सीजेपी को लेकर बहुत सारी कॉन्सपिरेसी थ्योरी भी गढ़ी जा रही हैं कि इसके पीछे अमेरिका है, इसके पीछे आम आदमी पार्टी है, इसके पीछे बीजेपी है."
"लेकिन मुझे लगता है कि यह एक तरह का आईना है, जो राजनीति में बदलाव की चाह को दिखा रहा है. और यह विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती है कि वह इसका नेतृत्व नहीं कर पा रहा है."
स्मिता शर्मा कहती हैं, "बहुत से लोग तो सीजेपी के साथ जुड़ ही रहे हैं, इन्हें ख़ारिज करने की कोशिशें भी बड़े स्तर पर की जा रही हैं."
"इससे लगता है कि भले ही यह मुद्दा एक कटाक्ष के बाद बना हो और मीम के साथ शुरू हुआ हो लेकिन इसका असर हो रहा है. अगर ऐसा नहीं होता तो लोग इनके पीछे नहीं पड़ते, जैसे पड़े हुए हैं."
वो कहती हैं, "अब लोग कह रहे हैं कि आप आम आदमी पार्टी के साथ थे, इसलिए यह आम आदमी पार्टी का प्रोटेस्ट है... यह मज़ेदार बात है. भारत में तो यह सवाल उठना ही नहीं चाहिए. यहां तो एक नेता नाश्ते में एक पार्टी के साथ होता है, लंच में दूसरी पार्टी के साथ और डिनर में तीसरी पार्टी के साथ."
"जो लोग इनके प्रति अविश्वास फैलाने के लिए इस तरह के सवाल उठा रहे हैं उन्हें यह भी देखना होगा कि चार-पांच साल में ख़्याल बदलते भी हैं. हमारे आप चार-पांच साल पुराने सोशल मीडिया पोस्ट देखेंगे तो वह आज से अलग हो सकते हैं."
वह यह भी कहती हैं कि आज की तारीख में सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स उपलब्ध हैं तो लोगों को आंदोलित करने के लिए उनका इस्तेमाल हो रहा है.
उनका कहना है, "अन्ना हज़ारे के नेतृत्व वाले इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन ने तब उपलब्ध तकनीक का इस्तेमाल किया था. उस वक़्त तकनीक के तौर पर टीवी का इस्तेमाल हुआ था."
"रामलीला मैदान में बड़े-बड़े कैमरे, ज़िमी जिब (कैमरा क्रेन) लगे थे, पत्रकार थे तो मध्यवर्ग के बहुत सारे लोग इसलिए भी पहुंचे थे क्योंकि इस सबसे उनमें उत्सुकता पैदा हो गई थी."
'लोग लोकतंत्र से मायूस नहीं हैं'

शनिवार की सुबह दिल्ली में होने वाला सीजेपी का प्रदर्शन या प्रदर्शन की कोशिश को कितनी गंभीरता से लिया जाना चाहिए?
इस सवाल के जवाब में रशीद किदवई कहते हैं, "यह भारत की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है. अब देखना यह है कि सरकार क्या करती है."
उनके अनुसार, "एक तो यह हो सकता है कि वह दमनकारी रवैया अपनाए, अभिजीत दीपके बाहर से आते हैं तो उन्हें और अन्य लोगों को गिरफ़्तार कर लिया जाए. लेकिन अगर सरकार इनकी जनसभा हो जाने दे तो पता चल पाएगा कि ये सरकार के ख़िलाफ़ हैं या विपक्ष के ख़िलाफ़ जाता है या सिर्फ़ शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े तक सीमित रहता है."
"सिविल सोसायटी के आंदोलन बहुत जगह सफल नहीं होते हैं. उनसे शोर तो बहुत होता है, हड़कंप तो बहुत मचता है लेकिन वास्तविक बदलाव हमेशा नहीं होता. शनिवार का यह आंदोलन बताएगा कि सोशल मीडिया का यह आंदोलन जनाक्रोश है या नहीं और यह भी कि यह किस तरफ़ जा रहा है."
लेकिन स्मिता शर्मा कहती हैं, "पिछले कुछ सालों में दक्षिण एशिया में जितने भी विरोध के आंदोलन हुए हैं उनकी शुरुआत ही सोशल मीडिया से हुई है. वह श्रीलंका का अरागलया आंदोलन हो, बांग्लादेश के युवाओं का आंदोलन हो या नेपाल का जेन ज़ी प्रोटेस्ट."
"यह कामयाबी मानी जा सकती है कि सीजेपी को एक सुनियोजित रूप दिया जा रहा है. मैंने सीजेपी के तीनों प्रवक्ताओं से जो बात की है और मुझे वह शिक्षित और स्पष्ट विचारों वाले लोग लगे."
ऐसे में कॉकरोच जनता पार्टी का मीम से शुरू होकर सड़क पर पहुंचना क्या संकेत देता है?
रशीद किदवई कहते हैं, "लोकतंत्र के लिए यह बहुत शुभ संकेत है कि अपनी भावनाओं को लोग अलग-अलग तरीके से व्यक्त करते हैं. लोग लोकतंत्र से मायूस नहीं हैं, वह एक नया तजुर्बा करना चाहते हैं. जैसे कि तमिलनाडु में विजय आ गए."
"एक बड़े राज्य में दोनों प्रमुख द्रविड़ पार्टियों और सारी राष्ट्रीय पार्टियों का सूपड़ा एक बिल्कुल नए राजनीतिक दल ने साफ़ कर दिया. अब विजय उम्मीदों पर कितने खरे उतर पाते हैं यह अलग बात है. लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि एक नया विकल्प सामने आया."
योगेंद्र यादव ने भी कुछ दिन पहले बीबीसी हिन्दी के साथ बातचीत में कहा था, "इतनी बड़ी तादाद में अगर भारत के युवा खुद को कॉकरोच से आइडेंटिफ़ाई कर रहे हैं. क्या ये सिर्फ आक्रोश का रिफ़्लेक्शन है या जो भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था है, उसमें बहुत गहरी निराशा को दिखा रहा है?"
इसका खुद जवाब देते हुए उन्होंने कहा, "हां इसमें निराशा है, लेकिन इस गुस्से के साथ जुड़ी हुई एक आशा है, एक आकांक्षा है. कहीं यह है कि कोई तो कुछ अच्छा करो, इनके बस का नहीं."
"इसे केवल इसके नेगेटिव एक्सप्रेशन में न देखिए. उस कॉकरोच के पीछे छुपी हुई आकांक्षा को, उम्मीद देखिए कि कोई तो आकर हाथ पकड़े."
मीम से जन्मी 'पार्टी'

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कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक और संयोजक अभिजीत दीपके ने बीबीसी न्यूज़ मराठी ने बातचीत में बताया था कि सीजेपी को उन्होंने क्यों शुरू किया था.
उन्होंने बताया था, "मैं ट्विटर (अब एक्स) पर सीजेई (भारत के मुख्य न्यायाधीश) का बयान देख रहा था जहां पर वो सिस्टम की आलोचना करने और राय देने के लिए देश के युवाओं की तुलना कॉकरोच और परजीवियों से कर रहे थे."
"मैंने इसे बेहद हास्यास्पद समझा क्योंकि सीजेआई को देश के संविधान का संरक्षक माना जाता है. वह संविधान जो हर किसी को अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है."
"एक ऐसा शख़्स जो अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा करने के लिए है, वो कैसे युवाओं की तुलना कॉकरोच और परजीवियों से कर सकता है."
दीपके ने कहा, "इसने मुझे ग़ुस्से और निराशा से भर दिया और ट्विटर पर मैंने इस पर अपनी राय दी. मैंने पूछा कि सब कॉकरोच एक साथ आ जाएं तो क्या होगा. मुझे जेन ज़ी और 25 साल तक के युवाओं के कमाल के जवाब मिले और उन्होंने कहा कि हमें साथ आना चाहिए और एक प्लेटफ़ॉर्म बनाना चाहिए."
"इसने मुझे आइडिया दिया कि हमें ऑनलाइन एक पैरोडी पार्टी बनानी चाहिए, जिसका नाम 'कॉकरोच जनता पार्टी' हो. अगर आप हमें कॉकरोच कह रहे हैं तो ठीक है, हम कॉकरोच जनता पार्टी बनाते हैं."
"इस पार्टी में शामिल होने के लिए मैंने पात्रता तय कीं, जैसे- आपको आलसी होना होगा जैसा सीजेआई ने कहा, आपको बेरोज़गार होना होगा और आप लगातार ऑनलाइन रहने वाले हों, जैसा सीजेआई ने कहा था."
यह व्यंगात्मक कैंपेन कैसे लोकप्रिय हुआ, इस बारे में दीपके ने कहा, "इसके बाद हमें लगने लगा कि ये बड़ा होने वाला है और सिर्फ़ मज़ाक नहीं रह गया है, क्योंकि लोग निराश हो चुके थे और हमने एक वेबसाइट बनाई, पार्टी का घोषणापत्र बनाया."
उन्होंने कहा, "इंस्टाग्राम पर हमारे दो मिलियन फ़ॉलोअर्स (अब 22.1 मिलियन यानी 2 करोड़ 21 लाख से अधिक) हो चुके हैं और दो लाख से ज़्यादा लोगों ने ख़ुद को कॉकरोच जनता पार्टी के सदस्य के तौर पर रजिस्टर किया है. भारतीय राजनीति में ये काफ़ी समय के बाद अभूतपूर्व है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


























