पश्चिम बंगाल में बीजेपी को लोगों ने क्यों पसंद किया, ये हैं चार कारण

सोमवार को कोलकाता में सेंट्रल एवेन्यू स्थित पार्टी कार्यालय के बाहर, बंगाल विधानसभा चुनाव की मतगणना के दिन भारतीय जनता पार्टी के समर्थक जश्न मनाते हुए
इमेज कैप्शन, सोमवार को बंगाल विधानसभा चुनाव की मतगणना के बीच कोलकाता में पार्टी कार्यालय के बाहर भारतीय जनता पार्टी के समर्थक जश्न मनाते हुए
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को कवर करते हुए मैंने लोगों की आम शिकायतें सुनी थीं कि तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेता और उनके कार्यकर्ताओं की मनमानी बहुत बढ़ गई है.

लोग खुलकर बताते थे पार्टी कार्यकर्ताओं की सहमति के बिना कोई नया काम करना मुश्किल है.

इसके बावजूद टीएमसी के पक्ष में तर्क देने वाले कहते थे कि पश्चिम बंगाल में ग्रामीण, मुसलमान और महिलाएं ममता के साथ हैं.

ऐसे में सत्ता विरोधी लहर होते हुए भी ममता, यह चुनाव जीत जाएंगी. लेकिन अब तक आए चुनावी रुझान बताते हैं कि लोगों ने बदलाव का मन बना लिया था.

दरअसल, बदलाव की ज़मीन 2021 के विधानसभा चुनाव में ही बीजेपी ने तैयार कर दी थी. बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनाव में बंगाल में मुख्य विपक्षी पार्टी की हैसियत हासिल कर ली थी. तीन से 77 सीट तक पहुँच गई थी. ऐसे में बीजेपी बंगाल के लिए कोई बाहरी पार्टी नहीं थी.

मिसाल के तौर पर 2021 के विधानसभा चुनाव में माटीगारा-नक्सलबाड़ी विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी के आनंदमय बर्मन ने तृणमूल कांग्रेस के राजन सुंदास को 70 हज़ार से ज़्यादा मतों से हरा दिया था. यह अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीट है. इस बार भी आनंदमय बर्मन इसी अंतर से टीएमसी को हराते दिख रहे हैं.

ये वही नक्सलबाड़ी इलाक़ा है, जहाँ से 1967 में अतिवादी वामपंथी नेताओं ने हथियारबंद आंदोलन का आग़ाज़ किया और कई राज्यों के मज़दूरों, भूमिहीनों, दलितों, आदिवासियों और शोषितों को आकर्षित किया. नक्सलबाड़ी में बीजेपी की जीत को पश्चिम बंगाल में बदलाव की आहट के रूप में देखा गया था और पाँच साल बाद यह बदलाव हो भी गया.

बीजेपी की जीत की मुख्य वजह आख़िर क्या रही?

पश्चिम बंगाल
इमेज कैप्शन, पीएम मोदी ने पश्चिम बंगाल में कई रैलियां की थीं

1. सत्ता विरोधी लहर या हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण

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दमदम उत्तर विधानसभा क्षेत्र में एक महिला वोटर ने टीएमसी को लेकर मुझसे कहा था, "पुलिस ममता के वफ़ादारों की सुनती है. हमें शिकायत ममता के वफ़ादारों की करनी होती है. गुंडई इतनी बढ़ गई है कि इनकी सहमति के बिना कोई काम संभव नहीं है. हमें बदलाव चाहिए और ये बदलाव तो अभी बीजेपी ही कर सकती है. कांग्रेस और सीपीएम इस हालत में होतीं तो मैं उन पर ज़रूर विचार करती."

टीएमसी के लोकसभा सांसद सौगत रॉय ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''15 साल के शासन में सत्ता विरोधी लहर बहुत आम बात है लेकिन बड़ा कारण यह भी है कि हिन्दू मतदाता बीजेपी की तरफ़ लामबंद हुए हैं और इसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ा.''

यूनिवर्सिटी ऑफ़ कलकत्ता में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर हिमाद्रि चटर्जी कहते हैं कि बंगाल में बीजेपी की जीत का श्रेय जो हिन्दू मतों के ध्रुवीकरण को दे रहे हैं, वे बंगाल की राजनीति को ठीक से नहीं समझते हैं.

प्रोफ़ेसर चटर्जी कहते हैं, ''बीजेपी की जीत को हिन्दू मतों के ध्रुवीकरण में नहीं बल्कि टीएमसी विरोधी मतों के एकजुट में होने देखना चाहिए. कांग्रेस टीएमसी विरोधी वोटों को अपने पीछे लामबंद कर सकती थी लेकिन राजनीतिक रूप से निष्क्रिय रही. बीजेपी को जीत कोई अचानक नहीं मिली है. बीजेपी 2014 के बाद से ही अपना वोट शेयर बढ़ा रही है. 2016 से लेकर 2026 के विधानसभा चुनाव को देखें तो बीजेपी का वोट शेयर भी बढ़ा और सीटें भी बढ़ीं. यहाँ तक कि पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को भले कम सीटें मिलीं लेकिन वोट शेयर कम नहीं हुआ.''

प्रोफ़ेसर चटर्जी कहते हैं, ''पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार को लेकर लोगों की नाराज़गी थी. लोगों को ममता को टक्कर देती पार्टी बीजेपी दिखी. लोगों को ममता को हराना था, इसलिए बीजेपी को वोट किया. जो धार्मिक ध्रुवीकरण की बात कर रहे हैं, उनके लिए कुछ तथ्य मैं देना चाहता हूँ. बंगाल में 1950 के बाद से कोई दंगा नहीं हुआ.''

''ज़ाहिर है कि इसमें यहाँ की पार्टियों की भी भूमिका रही है. बंगाल पार्टिशन स्टेट है, इसके बावजूद यहाँ हिन्दू बनाम मुस्लिम की राजनीति नहीं रही है. बीजेपी को बंगाल के लोग नहीं जानते हैं, ऐसा भी नहीं है. ऐसे में हम ये कह दें कि बंगाल में बीजेपी को वोट करने वाले सांप्रदायिक हो गए तो यह हास्यास्पद होगा.''

वरिष्ठ पत्रकार प्रसून आचार्य कहते हैं, ''जिस तरह के नतीजे आए, उसका अंदाज़ा हमें नहीं था. ममता के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर ज़रूर थी लेकिन यह जीत केवल सत्ता विरोधी लहर की नहीं है. लोग ममता के स्थानीय नेताओं और समर्थकों से बहुत परेशान थे लेकिन बीजेपी को इस बार हिन्दू मतों की लामबंदी का भी फ़ायदा मिला है. मुझे लगता है कि आने वाले समय में बंगाल में विपक्ष की स्थिति बहुत कमज़ोर होगी और टीएमसी टूट सकती है. टीएमसी के जितने काउंसलर और स्थानीय नेता हैं, वे फ़ायदे के लिए बीजेपी का दामन थामेंगे. कई विधायक और नेता जाँच एजेंसियों के डर से बीजेपी में जाएंगे.''

पश्चिम बंगाल
इमेज कैप्शन, ममता बनर्जी पिछले 15 सालों से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं

2. एसआईआर की भूमिका

थिंक टैंक सबर इंस्टिट्यूट ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) के डेटा का गहन विश्लेषण किया है.

सबर इंस्टिट्यूट के निदेशक साबिर अहमद कहते हैं कि इस चुनावी नतीजे को देखें तो एसआईआर का असर भी साफ़ दिखता है.

अहमद कहते हैं, ''इस चुनाव में क़रीब 31 लाख लोगों ने वोट नहीं किया. जीत-हार का अंतर कई सीटों पर ज़्यादा नहीं रहेगा. ऐसे में एसआईआर की भी बीजेपी की जीत में अहम भूमिका रही है.''

अहमद कहते हैं, ''इस बार के बंगाल चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण भी हुआ है. शहरी इलाक़ों में तो ध्रुवीकरण साफ़ दिख रहा है. लोगों के मन में डर बैठाया गया कि अल्पसंख्यक बहुसंख्यक हो जाएंगे.''

3. कमज़ोर वाम मोर्चा और कांग्रेस

पश्चिम बंगाल
इमेज कैप्शन, शुभेंदु अधिकारी बीजेपी के प्रमुख चेहरा रहे हैं

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में साफ़ दिख रहा था कि मौजूदगी दो ही पार्टियों की है- टीएमसी और बीजेपी.

कांग्रेस और सीपीआई (एम) ज़मीन पर नज़र नहीं आ रही थीं.

लोगों के बीच एक आम राय थी कि टीएमसी को कांग्रेस और सीपीआई (एम) नहीं हरा सकती हैं. ऐसे में टीएमसी विरोधी मत बीजेपी के साथ गए.

कांग्रेस की हालत यह है कि पश्चिम बंगाल पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुभांकर सरकार श्रीरामपुर विधानसभा क्षेत्र से चौथे नंबर पर चल रहे हैं. यहाँ तक कि कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने पश्चिम बंगाल में एक भी रैली नहीं की थी.

नक्सलबाड़ी आंदोलन के जनक चारू मजूमदार के बेटे और सीपीआई(एमएल) के पोलित ब्यूरो मेंबर अभिजीत मजूमदार कहते हैं कि उनके लिए यह नतीजा हैरान करने वाला नहीं है लेकिन बीजेपी को ऐसी जीत मिलेगी, इसका अंदाज़ा नहीं था.

अभिजीत मजूमदार कहते हैं, ''इसमें कोई शक नहीं है कि ममता बनर्जी सरकार के ख़िलाफ़ आम लोगों में नाराज़गी थी और इस नाराज़गी को वामपंथी पार्टियां अपनी तरफ़ लामबंद करने में नाकाम रहीं.''

इस बार कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ रही थीं. ऐसे में टीएमसी विरोधी मत बिखरने की बजाय बीजेपी के साथ लामबंद हुआ.

मैंने श्रीरामपुर विधानसभा क्षेत्र में राहुल गांधी की रैली के दौरान ख़ुद भी महसूस किया था कि राहुल जब ममता पर हमला करते थे तो भीड़ ताली बजाकर स्वागत करती थी और जब प्रधानमंत्री मोदी को आड़े हाथों लेते थे तो भीड़ की प्रतिक्रिया बहुत ठंडी होती थी. यानी सत्ता विरोधी लहर स्पष्ट रूप से दिख रही थी.

पश्चिम बंगाल
इमेज कैप्शन, बीजेपी ने पिछले चुनाव में पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी पार्टी की हैसियत हासिल कर ली थी

4. मुस्लिम वोट का विभाजन?

चुनावी नतीजों के विश्लेषक पार्था दास ने एक्स पर लिखा है, ''टीएमसी ने सत्ता इसलिए नहीं गंवाई क्योंकि बीजेपी के पक्ष में हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण हुआ. बल्कि इसकी वजह यह है कि मुस्लिम वोट बुरी तरह बँट गए हैं. मिसाल के तौर पर तेहट्टा विधानसभा क्षेत्र के पहले राउंड के नतीजे देखें. बीजेपी को केवल तीन प्रतिशत वोट मिल रहे हैं जबकि लेफ्ट को 34% वोट मिल रहे हैं. यह लगभग 90% मुस्लिम बहुल क्षेत्र है. इसलिए आख़िरकार बीजेपी यह सीट जीत जाएगी.''

अभिजीत मजूमदार भी कहते हैं, ''हिन्दुओं का ध्रुवीकरण हुआ है लेकिन मुस्लिम वोट बँट गए हैं. मुस्लिम वोट बँटने की मुख्य वजह यह है कि तृणमूल कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों का इस्तेमाल किया. ममता पिछले दो चुनावों से बीजेपी का डर दिखाकर मुसलमानों का वोट ले रही थीं. लेकिन इस बार मुसलमानों ने स्वतंत्र रूप से वोट किया है. आईएसएफ़ और हुमायूं कबीर की पार्टी को सीट मिलना, बताता है कि मुस्लिम वोट बँटे हैं.''

लेकिन जादवपुर यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर अब्दुल मतीन नहीं मानते हैं कि मुस्लिम वोटों में विभाजन हुआ है.

प्रोफ़ेसर मतीन कहते हैं, ''यह तो मुसलमानों को ही विलेन बनाने वाली बात है. मुसलमानों ने आईएसएफ़ को मज़बूत कैंडिडेट वोट किया, कुछ सीटों पर हुमायूं कबीर की पार्टी को किया. ओवैसी की पार्टी को हज़ार वोट भी नहीं मिले हैं. ऐसे में हम ये नहीं कह सकते हैं कि मुसलमानों का वोट बँट गया.''

प्रोफ़ेसर मतीन कहते हैं, ''ममता ने पश्चिम बंगाल में हिन्दुत्व की राजनीति को हराने के लिए हिन्दुत्व की ही लाइन ली थी. ममता ने वक्फ़ बिल के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन नहीं होने दिया था. ममता को मुसलमान बीजेपी के डर से आजीवन वोट नहीं कर सकते हैं. अगर 70 फ़ीसदी हिन्दू वोट एक पार्टी को जाएगा तो फिर बाक़ी बचता क्या है? इसके बावजूद मैं ये नहीं कह सकता कि हिन्दू वोट जो बीजेपी के साथ गया वो सांप्रदायिक था. हो सकता है कि इसका बड़ा हिस्सा हो लेकिन बाक़ी ममता के कुशासन के ख़िलाफ़ भी था.''

2016 में बीजेपी को केवल तीन सीटों पर जीत मिली थी और 2021 में 77 सीटों पर जीत मिली. 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर लगभग 10 फ़ीसदी था.

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 40 प्रतिशत का आँकड़ा पार कर गया. बीजेपी को 2021 के विधानसभा चुनाव में में 38.1 प्रतिशत वोट मिले थे. इस बार बीजेपी का वोट शेयर 45 प्रतिशत के पार जाता दिख रहा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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