दिनेश त्रिवेदी: टीएमसी नेता से लेकर बांग्लादेश में भारत का उच्चायुक्त बनने तक का सफ़र

दिनेश त्रिवेदी
इमेज कैप्शन, दिनेश त्रिवेदी बांग्लादेश में भारत के नए उच्चायुक्त नियुक्त हुए हैं
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बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनेश त्रिवेदी बांग्लादेश के नए भारतीय उच्चायुक्त नियुक्त किए गए हैं. भारत के विदेश मंत्रालय ने इसकी पुष्टि की है.

बयान में कहा गया है कि दिनेश त्रिवेदी जल्द ही इस पद को संभालेंगे.

दिनेश त्रिवेदी आईएफ़एस अफ़सर प्रणय वर्मा की जगह लेंगे जो ब्रसल्ज़ में यूरोपीय संघ के अगले भारतीय राजदूत होंगे.

बीजेपी नेता की इस नियुक्ति को बेहद दुर्लभ माना जा रहा है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में राजनेताओं की डिप्लोमैटिक पदों पर नियुक्तियां न के बराबर हुई हैं.

इससे पहले पूर्व सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह सुहाग साल 2019 से 2022 तक सेशल्स में भारत के उच्चायुक्त के पद पर थे.

साल 2021 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे.

कौन हैं दिनेश त्रिवेदी?

गुजराती माता-पिता की संतान दिनेश त्रिवेदी ने हिमाचल प्रदेश के एक बोर्डिंग स्कूल से पढ़ाई की और उसके बाद कोलकाता के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज से कॉमर्स में स्नातक किया.

उन्होंने टेक्सस विश्वविद्यालय से एमबीए की डिग्री हासिल की है और उनके पास कमर्शियल पायलट का भी लाइसेंस है.

दिनेश त्रिवेदी ने राजनीति में क़दम साल 1980 में रखा था और कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए थे.

लेकिन 1990 में वो जनता दल में चले गए और जब साल 1998 में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस पार्टी बनाई तो दिनेश त्रिवेदी टीएमसी में शामिल हो गए.

साल 2001 से 2006 के बीच दिनेश त्रिवेदी ने ममता बनर्जी का ज़बर्दस्त विश्वास हासिल किया. साल 2001 में ममता ने उन्हें राज्यसभा में भेजा.

पश्चिम बंगाल में पार्टी के मात्र 60 विधायकों के बावजूद त्रिवेदी राज्यसभा के लिए अपनी जीत सुनिश्चित करने में कामयाब रहे थे. इस कारनामे को दिनेश त्रिवेदी की राजनीतिक सोच का लोहा माना गया था.

दिनेश त्रिवेदी
इमेज कैप्शन, दिनेश त्रिवेदी ममता बनर्जी के विश्वस्त लोगों में शुमार थे

ममता बनर्जी के वफ़ादार

साल 2006 में जब ममता बनर्जी सिंगूर भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ 26 दिन लंबी भूख हड़ताल पर बैठी थीं, तब त्रिवेदी दिल्ली में उनके समर्थन में माहौल बना रहे थे.

हालांकि ममता बनर्जी का उन पर भरोसा और मज़बूत तब हुआ जब साल 2009 में त्रिवेदी ने सीपीएम के कद्दावर नेता तड़ित तोपदार को पार्टी और सीटू के गढ़ कहे जाने वाली बैरकपुर संसदीय सीट पर मात दी थी.

राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी अक्सर ज़ोरदार चर्चा होती थी कि पश्चिम बंगाल के बाहर के दिनेश त्रिवेदी को ममता बनर्जी इतना तवज्जो क्यों देती हैं. इसके अलावा बड़े कॉर्पोरेट घरानों से उनकी नज़दीकी भी राजनीतिक गलियारों में अक्सर चर्चा का विषय रही हैं.

दिनेश त्रिवेदी ने ममता बनर्जी के प्रति अपनी वफ़ादारी दिखाई तो समय-समय पर ममता बनर्जी ने उन्हें इसका इनाम भी दिया.

साल 2011 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल करने के बाद जब ममता बनर्जी ने राज्य की राजनीति की ओर रुख़ किया तो रेल मंत्रालय की महत्वपूर्ण विरासत त्रिवेदी को सौंपकर आईं.

दिनेश त्रिवेदी
इमेज कैप्शन, साल 2012 में रेल मंत्री रहते हुए दिनेश त्रिवेदी ने ट्रेनों का किराया बढ़ाया था

ममता बनर्जी से टकराव

हालांकि दोनों के बीच रिश्तों में तब तनाव उभर आया जब दिनेश त्रिवेदी ने साल 2012 में रेल मंत्री रहते हुए ट्रेनों का किराया बढ़ाया.

उनके इस फ़ैसले से पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी इतनी नाराज़ हुई थीं कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से दिनेश त्रिवेदी को उनके पद से हटाने के लिए कहा था.

लेकिन दिनेश त्रिवेदी ने तब यही रुख़ अपनाया हुआ था कि उन्हें न तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने और न ही ममत बनर्जी ने इस्तीफ़ा देने को कहा है. उन्होंने कहा था कि वो जानना चाहते हैं कि इस्तीफ़ा देने की वजह क्या है.

हालांकि कुछ दिनों तक चली राजनीतिक रस्साकशी के बाद दिनेश त्रिवेदी ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. इसके बाद से दिनेश त्रिवेदी टीएमसी में हाशिए पर ही रहे.

दिनेश त्रिवेदी और तत्कालीन बीजेपी सांसद जेपी नड्डा
इमेज कैप्शन, दिनेश त्रिवेदी ने साल 2021 में बीजेपी का दामन थाम लिया था
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साल 2019 में वो अपनी बैरकपुर सीट पर वो चुनाव हार गए. इसके बाद टीएमसी ने उन्हें राज्यसभा भेजा लेकिन वो साल 2021 में टीएमसी को छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए.

टीएमसी छोड़ने के सवाल पर तब उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा था कि "ज़्यादातर पार्टियां परिवार प्रधान हो गई हैं लेकिन लेफ़्ट और बीजेपी में ऐसा नहीं है. हमने टीएमसी को नहीं छोड़ा है बल्कि टीएमसी ने अपने आदर्शों को छोड़ा है."

"विपक्ष का मतलब ये नहीं है कि आप बेवजह ही विरोध करते रहें. ममता जी और हमने बहुत संघर्ष किया है और हमारे पास लोगों को दिल्ली भेजने के लिए टिकट के लाले पड़ते थे. तब सत्ता नहीं थी लेकिन जनता साथ थी. जनता सीपीएम की हिंसा और भ्रष्टाचार से ऊब गई थी और डरी हुई थी. उन्हें ऐसा नेतृत्व चाहिए था जिनके पास हिम्मत हो."

"आज शायद पैसे हो गए होंगे लेकिन जनता साथ नहीं है. बीजेपी एक परिवार के लिए काम नहीं करती है जबकि टीएमसी एक परिवार विशेष के लिए काम करती है."

हालांकि बीजेपी में शामिल होने के बाद दिनेश त्रिवेदी आमतौर पर ख़बरों से ग़ायब थे.

पांच साल पहले जब वो बीजेपी में शामिल हुए थे उस वक़्त पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हो रहे थे. अभी जब उन्हें केंद्र सरकार ने नई ज़िम्मेदारी दी है, तो इस वक़्त भी पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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