क्या मेडिटेशन से दिमाग़ को मज़बूत बनाया जा सकता है?

मेलिसा होगेनबूम
इमेज कैप्शन, मेलिसा होगेनबूम
    • Author, अंजलि दास
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

आधुनिक जीवन की आपाधापी में हमारे सामने ऐसे कई काम आते हैं जो बिल्कुल नए होते हैं. इसके बावजूद हम उसे सबसे अच्छे तरीक़े से करने की कोशिश करते हैं.

इसकी वजह हमारा द़िमाग है. दिमाग़ के पास नई परिस्थिति के अनुसार ख़ुद को ढालने और व्यवहार करने की क्षमता होती है.

हालांकि रोज़मर्रा की घटनाओं से दिमाग़ में भी बदलाव आ सकता है और उसके काम करने के तरीक़े बदल सकते हैं. इसके कई प्रमाण मिले हैं.

मेलिसा होगेनबूम विज्ञान की एक पत्रकार हैं.

उन्होंने यह जानने के लिए एक प्रयोग किया कि क्या हमारे आस पास हो रही चीज़ों से दिमाग़ पर इतना असर पड़ता है कि उसके काम करने का तरीक़ा ही बदल जाए?

वे मानती हैं कि ज़िंदगी के कुछ पहलुओं को बदल कर दिमाग़ में मजबूती लाया जा सकता है.

इसके लिए उन्होंने सबसे पहले अपने मस्तिष्क की स्कैन कराया. उनका फंक्शनल मैग्नेटिक रिज़ोनेंस इमेजिन (एफ़एमआरआई) टेस्ट किया गया.

वे कहती हैं, "स्कैन के समय आप कुछ भी न सोचें, यह असंभव है. मुझे एक मशीन (एफ़एमआरआई) के सामने ले जाया गया जिससे बहुत तेज़ आवाज़ आ रही थी. मुझे एक काले क्रॉस पर ध्यान केंद्रित करने को कहा गया. मेरे लिए आंखे खोल पाना तक मुश्किल था. मुझे टेस्ट के नतीज़ों की चिंता भी सता रही थी."

क्या व्यवहार बदलने से दिमाग़ में भी होता है बदलाव?

ब्रेन पर मेडिटेशन के प्रभावों का अध्ययन

मेलिना इस टेस्ट के नतीजे और अगले छह हफ़्ते के प्रयोग के बाद के टेस्ट की तुलना करना चाहती थीं.

इससे वो यह जानना चाहती थीं कि उनके दिमाग़ में क्या बदलाव हुआ है.

इस टेस्ट के नतीजे जानने के लिए उन्होंने एक क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट की मदद ली.

वे कहती हैं, "मुझे यह जान कर बहुत आश्चर्य हुआ कि ध्यान जैसी सामान्य सी लगने वाली चीज़ भी दिमाग़ में बदलाव ला सकता है. लेकिन सवाल ये है कि क्या ये मेरे दिमाग़ पर काम करेगा?"

उन्होंने बताया, "अगले छह हफ़्तों के दौरान साइकॉलजिस्ट थॉर्सटन बार्नहॉफ़र ने ध्यान से जुड़ा एक रिसर्च कोर्स मुझे करने के लिए दिया. इसमें हर दिन मैं एक ऑडियो रिकॉर्डिंग सुनते हुए 30 मिनट के लिए ध्यान करती थी. इसके अलावा और भी कुछ गतिविधियां की जाती थीं."

ध्यान का दिमाग़ी मज़बूती से कनेक्शन

ध्यान क्या मस्तिष्क को साधने की क्रिया है?
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
दिनभर
Dinbhar: आवाज़ वही, अंदाज़ नया

देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.

एपिसोड

समाप्त

ध्यान साधना का चलन वैसे तो हज़ारों साल पुराना है. लेकिन अभी कुछ दशक पहले ही मनोवैज्ञानिकों और दिमाग़ के चिकित्सकों ने इस पर गहन शोध करना शुरू किया था. विभिन्न शोध में ध्यान की उपयोगिता साबित होने के बाद अब इसकी अनुशंसा की जाने लगी है.

अमेरिका के मनोवैज्ञानिक डेविड क्रेसवेल ने कई रिसर्च का हवाला देते हुए क़रीब 20 साल पहले लिखा था कि दिमाग़ी सुकून का संबंध हमारी रोज़ाना की ज़िंदगी से होता है.

जर्मनी में टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ़ म्यूनिख के रिसर्चर ब्रेट्टा हॉलज़ल और अमेरिका के मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल की रिसर्चर सारा लेज़र का कहना है कि मेडिटेशन दिमाग़ में याददाश्त वाले हिस्से को मज़बूत बनाने में मददगार होती है.

मेलिसा होगेनबूम के मनोवैज्ञानिक बार्नहॉफ़र कहते हैं, "ध्यान में आपको अपनी सांसों पर ध्यान देना होता है. वास्तव में, इस प्रक्रिया को दिमाग़ कर रहा होता है. इसे करने से दिमाग़ इधर-उधर भटकना बंद कर देता है. जो ये बताता है कि दिमाग़ काम कर रहा है. हम सांसे लेते, छोड़ते हैं. यानी हम एक समय में दो काम कर रहे होते हैं. हम ध्यान केंद्रित करने के लिए सांसों के ज़रिए अपनी मांसपेशियों को ताक़तवर बना रहे होते हैं. इस दौरान हम अपनी शारीरिक, मानसिक क्षमताएं बढ़ा रहे होते हैं."

साइकॉलजिस्ट मोनालिसा दत्ता
इमेज कैप्शन, साइकॉलजिस्ट मोनालिसा दत्ता

ध्यान अहम पर सावधानी भी ज़रूरी

नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल में साइकॉलजिस्ट मोनालिसा दत्ता कहती हैं, "कोविड महामारी के दौरान लोगों की सामाजिक ज़िंदगी न के बराबर थी. मौत का डर और नकारात्मकता इस कदर लोगों में घर कर गई थी कि इसका असर उनके मेंटल हेल्थ पर पड़ा. कोविड के बाद चिंता और तनाव के साथ साथ अवसाद जैसे मामले बढ़ते हुए दिखे हैं."

वे कहती हैं, "हमें अच्छी खुराक, समय पर सोना और उठना, सूरज की रौशनी में कुछ देर रहना और प्रकृति के साथ समय बिताना चाहिए. आज लगभग सभी लोगों के स्क्रीन टाइम बहुत ज़्यादा हैं. इससे न केवल लोगों में तनाव बढ़ रहा है बल्कि उनका स्वभाव आक्रामक भी होता जा रहा है. इसमें सुधार के लिए आपको अपने व्यक्तिगत और कामकाजी जीवन में संतुलन बनाने की ज़रूरत भी है."

साथ ही मोनालिसा दत्ता ने न केवल खान पान में सुधार और बेहतर लाइफ़ स्टाइल का पालन करने की सलाह दी बल्कि उन्होंने योग और ध्यान साधना को भी करने की सलाह दी.

वे कहती हैं, आज की भागदौड़ की ज़िंदगी में तनाव से नहीं बचा जा सकता है लेकिन इसे कम करने के लिए आप मेडिटेशन (ध्यान) जैसी चीज़ों को अपनाएं."

हालांकि साथ ही वे यह भी आगाह करती हैं कि ध्यान साधना को किसी जानकार की देखरेख में ही करना चाहिए. ख़ास कर उन्हें जो डिप्रेशन से गुज़र रहे हों क्योंकि किसी बंद कमरे या एकांत में उन्हें बेचैनी हो सकती है.

मेलिना

छह हफ़्ते बाद अपने प्रयोग में मेलिना को क्या मिला?

जब छह हफ़्ते पूरे हुए तो मेलिना यह जानने के लिए उत्सुक थीं कि इस प्रयोग का उनके दिमाग़ पर क्या प्रभाव हुआ.

एक बार फिर उन्होंने स्कैनिंग कराई और फिर अपने साइकॉलजिस्ट बार्नहॉफ़र को उसे दिखाया.

बार्नहोफ़र ने दोनों स्कैन रिपोर्टों को देखा और मेलिना को बताया कि उनके दिमाग़ में बदलाव साफ़ देखने को मिल रहा है.

उनके दिमाग़ के दाएं में स्थित अमिग्डला का आधा हिस्सा आकार में घट गया. अमिग्डला दिमाग़ में बादाम की संरचना जैसा हिस्सा है जिसे जज़्बातों या भावनाओं का केंद्र कहा जाता है. यह बदलाव बहुत मामूली सा था लेकिन साफ़ ज़ाहिर था.

मेलिना के इस प्रयोग के जो नतीजे आए वो उन वैज्ञानिकों की प्रकाशित शोध की ओर ही ले जाते हैं जिसमें यह कहा गया है कि ध्यान करने से अमिग्डला का आकार कम हो जाता है. वहीं तनाव होने से इसका आकार बढ़ता है.

साइकॉलजिस्ट बार्नहॉफ़र के साथ मेलिना
इमेज कैप्शन, साइकॉलजिस्ट बार्नहॉफ़र के साथ मेलिना

न्यूरोप्लास्टिक- दिमाग़ की मज़बूती का राज़

इंसानी दिमाग़ में सीखने, बदलाव करने और ख़ुद को विकसित करने का स्वभाव होता है. ये प्लास्टिक की तरह है जो अलग अलग चीज़ों में बदल सकता है. इसे न्यूरोप्लास्टिक कहते हैं, जिसका सीधा मतलब ये है कि जैसे जैसे किसी चीज़ को लेकर हमारे विचार बदलते जाते हैं वैसे वैसे दिमाग़ की संरचना और इसके काम करने के त़रीके बदल जाते हैं.

साथ ही योग, ध्यान और कसरत जैसी चीज़ों से हम वाकई अपने दिमाग़ की ताक़त, आकार और इसकी सघनता को बढ़ा सकते हैं.

पहले ये माना जाता था कि ये सब युवावस्था तक ही हो सकता है पर अब हम ये जान चुके हैं कि ये वो निरंतर ताक़त है जो लगातार हमारी पहचान को गढ़ने का काम करता रहता है. जब भी हम कुछ नया सीखते हैं यह झट से उसके अनुसार ख़ुद को ढाल लेता है.

मेलिसा होगेनबूम ने ख़ुद पर किए गए प्रयोग में पाया कि ध्यान से भी दिमाग़ के स्वास्थ्य को कुछ हद तक सुधारा जा सकता है.

(मूल कहानी देखने के लिए यहां क्लिक करें)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)