पाकिस्तान कैसे बना अमेरिका‑ईरान शांति वार्ता का मंच: पर्दे के पीछे की बड़े दांव वाली कूटनीति

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- Author, उमर नांगियाना और सारा हसन
- पदनाम, बीबीसी उर्दू
- ........से, इस्लामाबाद
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
पाकिस्तान फ़िलहाल अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ़्ते के सीज़फ़ायर पर बनी सहमति में मदद करने की अपनी सफलता का जश्न मना रहा है.
साथ ही पाकिस्तान के नेता शांति वार्ता की मेज़बानी की तैयारी कर रहे हैं.
शनिवार से शुरू होने वाली इस बातचीत से पहले, पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में दो दिन की छुट्टी घोषित कर दी गई है.
यह बातचीत असल में होगी या नहीं, इसकी अभी पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन शहर ने फिर भी खुद को पूरी तरह इसके लिए तैयार कर लिया है. सड़कों पर सन्नाटा है, क्योंकि करीब 10 हजार पुलिस अधिकारियों और सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है.
लेकिन दुनिया के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है.
दुनिया भर के देश लड़ाई खत्म होते ही होर्मुज़ स्ट्रेट के फिर से खुलने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं. युद्ध से पहले इस रास्ते से दुनिया के लगभग 20 फीसदी तेल की सप्लाई होती थी.
पाकिस्तान का भी काफ़ी कुछ दांव पर लगा हुआ है.
सोशल मीडिया में गर्व और उत्साह

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अगर बातचीत सफल नहीं होती है और पाकिस्तान को पड़ोसी देश ईरान के साथ जंग में घसीटा जाता है तो फिर उसे 'बुरे सपने जैसे हालात' का सामना करना पड़ सकता है. ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि पाकिस्तान ने पिछले साल सऊदी अरब के साथ एक द्विपक्षीय रक्षा समझौता किया था.
सिंगापुर की नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशियाई मामलों के विशेषज्ञ अब्दुल बासित कहते हैं कि पाकिस्तान ने "यह साफ कर दिया है कि वह सऊदी अरब को दिए गए अपने वादे को निभाएगा."
बासित बताते हैं कि इसका नतीजा यह हो सकता है, "पाकिस्तान की तीन सीमाओं पर माहौल गरमा जाए."
वह यहां पाकिस्तान के अपने दूसरे पड़ोसियों अफ़ग़ानिस्तान और भारत के साथ चल रहे तनाव का ज़िक्र कर रहे हैं. वह कहते हैं, "पाकिस्तान अपने चार में से दो प्रांतों में चल रहे विद्रोहों से लड़ रहा है. पाकिस्तान यह सब झेल नहीं सकता."
बावजूद इसके पाकिस्तानी सोशल मीडिया पर गर्व और उत्साह छाया हुआ है. अलग-अलग तरह के मीम्स वायरल हो रहे हैं.
बासित कहते हैं, "यह इस मायने में एक जीत है कि दुनिया का कोई भी दूसरा देश युद्धविराम करवाने में कामयाब नहीं हो पाया. और हम एक संभावित बड़ी तबाही के कगार पर खड़े थे. पाकिस्तान ने उस तबाही को टाल दिया."
यह सफलता उस देश के लिए बेहद ज़रूरी थी, जिसने सालों तक राजनीतिक उथल-पुथल, महज़ दो साल पहले कर्ज़ चुकाने में नाकाम होने की कगार पर खड़ी कमज़ोर अर्थव्यवस्था, और भारत के साथ जबरदस्त दुश्मनी का सामना किया है.
तो आख़िर पाकिस्तान ने यह कमाल कैसे कर दिखाया?
ट्रंप के पसंदीदा

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पाकिस्तान बेहतर स्थिति में है, क्योंकि अमेरिका, ईरान और खाड़ी देश उस पर भरोसा करते हैं.
सत्ताधारी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग के सांसद मुशाहिद हुसैन सैयद के मुताबिक, "सुलह की इस प्रक्रिया की अगुवाई पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर कर रहे हैं."
आसिम मुनीर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपना "पसंदीदा फील्ड मार्शल" कहते हैं.
मुनीर को शायद पाकिस्तान का सबसे ताकतवर इंसान माना जा सकता है. क्योंकि पाकिस्तान एक ऐसा देश है जहां सेना ने लंबे समय से राजनीति में अहम भूमिका निभाई है.
अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत मलीहा लोधी बताती हैं, "ट्रंप का दूसरा कार्यकाल शुरू होने के तुरंत बाद, मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ तालमेल बिठाना शुरू कर दिया था और उन्हें 'दो शुरुआती जीत' दिलाई थीं."
सीआईए की खुफिया जानकारी पर काम करते हुए, फील्ड मार्शल ने 2021 के काबुल हवाई अड्डे पर हुए बम धमाके के कथित मास्टरमाइंड को तब अमेरिकियों के हवाले कर दिया, जब वे अफ़ग़निस्तान से निकल रहे थे.
इस आत्मघाती हमले में कम से कम 170 अफ़ग़ान और 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे.
लोधी कहती हैं, "ट्रंप इतने शुक्रगुजार थे कि उन्होंने कांग्रेस में अपने पहले भाषण में इसका ज़िक्र किया."

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लोधी कहती हैं कि दूसरी जीत यह थी, "जिस तरह पाकिस्तान ने उन्हें यह बताया कि भारत के साथ एक बड़े युद्ध को रोकने में उन्होंने (डोनाल्ड ट्रंप) अहम भूमिका निभाई थी."
पाकिस्तान उन गिने-चुने देशों में से एक है, जिन्होंने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया है. इसकी डोनाल्ड ट्रंप को लंबे समय से चाहत थी.
वह कहती हैं, "याद रखिए कि ट्रंप को उस टैरिफ युद्ध से असल में कोई खास खुशी नहीं मिल रही थी, जिसे वे दुनिया के लगभग हर देश पर थोप रहे थे. इसलिए उन्हें सचमुच उस चीज़ की ज़रूरत थी, जो उन्हें पाकिस्तान से मिली."
पाकिस्तान ने अपने अहम खनिजों तक अमेरिका को पहुंच देने का भी वादा किया है. इसे अमेरिका अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हित के तौर पर देखता है.
पाकिस्तान के फ्रंटियर वर्क्स ऑर्गनाइज़ेशन देश में अहम खनिजों का खनन करने वाली मुख्य संस्था है और सेना के अधीन काम करती है.
सितंबर 2025 में इसने एक अमेरिकी कंपनी के साथ पांच सौ मिलियन डॉलर के निवेश का समझौता किया. ये प्रधानमंत्री आवास पर हुआ, जिसमें मुनीर भी मौजूद थे.
इसके बाद जनवरी में, पाकिस्तान ने वर्ल्ड लिबर्टी फ़ाइनेंशियल्स की एक सहयोगी कंपनी के साथ एक समझौता किया.
वर्ल्ड लिबर्टी फ़ाइनेंशियल्स एक क्रिप्टोकरेंसी वेंचर है जिसकी सह-स्थापना ट्रंप और उनके परिवार ने की थी. इस समझौते के तहत, कंपनी अपने स्टेबलकॉइन को देश के डिजिटल-पेमेंट सिस्टम में शामिल कर सकती है. इससे ट्रंप के करीबी लोगों के साथ पाकिस्तान के रिश्ते भी मज़बूत हुए हैं.
'सैद्धांतिक रुख़'

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हालांकि इन सब के बावजूद पाकिस्तान ने ईरान पर हुए अमेरिका-इसराइल हमलों की आधिकारिक तौर पर निंदा की. लेकिन जब ईरान ने पाकिस्तान के सैन्य सहयोगी सऊदी अरब के तेल क्षेत्रों पर बमबारी की, तो पाकिस्तान ने भी ईरान के ख़िलाफ़ एक कड़ा बयान जारी किया.
सात अप्रैल को, पाकिस्तान ने यूएन सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव पर वोट नहीं दिया, जिसमें देशों से होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने के प्रयासों में तालमेल बिठाने की अपील की गई थी.
सैयद इसे "एकतरफा" कहते हैं, क्योंकि इस प्रस्ताव में इस बात का ज़िक्र नहीं था कि अमेरिका-इसराइल ने पहले हमला किया था.
सैयद कहते हैं कि पाकिस्तान के इस "सिद्धांतवादी रुख़" और "संतुलित दृष्टिकोण" ने ईरान और अन्य खाड़ी देशों का भरोसा बढ़ाने में मदद की है.
पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव एजाज़ चौधरी कहते हैं कि इन्हीं देशों के साथ बातचीत में प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने अहम भूमिका निभाई है.
बीते पांच हफ़्तों में, शरीफ़ और उनके डिप्टी, विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने अमेरिका, रूस, चीन, मिस्र, जीसीसी देशों जैसे सऊदी अरब, कतर और यूरोपीय देशों में बड़े नेताओं और अधिकारियों से बात की.
जिस दिन सीज़फ़ायर का एलान हुआ, उस दिन शरीफ़ ने कहा कि उनकी ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के साथ "बहुत अच्छी और अहम बातचीत" हुई, जिन्होंने "आने वाली बातचीत में ईरान के शामिल होने की बात दोहराई और पाकिस्तान की कोशिशों की तारीफ़ की."
ऐसा लगता है कि शरीफ़ इस मौके पर ईरान के साथ पाकिस्तान के पुराने रिश्तों का फ़ायदा उठा पाए हैं. ईरान में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत आसिफ़ दुर्रानी कहते हैं कि दोनों देशों की 920 किलोमीटर लंबी सीमा आपस में जुड़ी है और इसी वजह से वे दशकों से एक-दूसरे का सहयोग कर रहे हैं.
उनकी कुछ और चिंताएं भी एक जैसी हैं: 'चरमपंथी' और 'अस्थिर' अफ़ग़ानिस्तान.
दुर्रानी कहते हैं, "पिछले पांच दशकों से, हम दोनों ही अपने देशों में शरणार्थियों के रूप में अस्थिरता का सामना कर रहे हैं."

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इसके अलावा, आपसी विश्वास और जुड़ाव बढ़ाने में धर्म की भूमिका को भी कम करके नहीं आंका जा सकता.
पाकिस्तान एक सुन्नी-बहुल देश है. लेकिन पाकिस्तान में दुनिया की सबसे बड़ी शिया आबादी में से एक रहती है. हर साल, हज़ारों पाकिस्तानी तीर्थयात्रा के लिए ईरान जाते हैं, जो कि दुनिया का सबसे बड़ा शिया देश है.
लेकिन अभी यह साफ़ नहीं है कि पाकिस्तान की कोशिशों से वे शांति वार्ताएं हो पाएँगी या नहीं, जिनका वादा किया गया था. संघर्ष-विराम पर दबाव बढ़ता जा रहा है. यह अभी भी एक सवाल बना हुआ है कि क्या दोनों पक्ष सचमुच बातचीत के लिए आएंगे.
चौधरी कहते हैं, "अगला चरण, एक व्यापक समझौते तक पहुँचना, मुश्किल है. लेकिन पाकिस्तान को इस प्रक्रिया में मदद करना जारी रखना चाहिए."
लोधी कहती हैं, "इसराइल लेबनान पर ज़बरदस्त हमला करके पहले से ही संघर्ष-विराम को कमज़ोर करने की कोशिश कर रहा है."
बुधवार को इसराइल के हमलों में लेबनान में 300 से ज़्यादा लोग मारे गए. इसराइल का कहना है कि ईरान के साथ हुआ संघर्ष-विराम समझौता लेबनान पर लागू नहीं होता.
वह कहती हैं, "पाकिस्तान में अधिकारियों के बीच यह चिंता निश्चित रूप से मौजूद है. और इस मामले में, इसराइल को रोकने की ज़िम्मेदारी और दायित्व ट्रंप पर ही है."
दुर्रानी का कहना है कि पाकिस्तान शांति को बढ़ावा देने के लिए पहले ही "अपनी भूमिका निभा चुका है."
"एक ब्रोकर, मध्यस्थ या सूत्रधार के तौर पर. आपका काम घोड़े को पानी तक ले जाना होता है. आप उसे ज़बरदस्ती पानी नहीं पिला सकते. यह संबंधित पक्षों पर निर्भर करता है कि वे पाकिस्तान को दिए गए इस मौके का फ़ायदा उठाएं."
अतिरिक्त रिपोर्टिंग स्टीफ़न हॉक्स और ग्रेसी सोए
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.




































