'मेरी मां तवायफ़ थीं, और मैं इससे शर्मिंदा नहीं हूं'

1990 के दशक में कोलकाता में ली गई रेखाबाई की तस्वीर
इमेज कैप्शन, 1990 के दशक में कोलकाता में ली गई रेखाबाई की तस्वीर
    • Author, शैरिलन मोलन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, मुंबई
  • प्रकाशित

"मैं अंधेरे में नाचती थी. मैं कमरे में मोमबत्ती जलाकर नाचती थी और परफ़ॉर्म करती थी. अंधेरे में मेरा नसीब चमकने वाला था."

साल 1962 की बात है. चीन और भारत के बीच सीमा विवाद के चलते जंग छिड़ चुकी थी और देश में नेशनल इमरजेंसी लगा दी गई थी.

लगातार बजते साइरन और कई दिनों के ब्लैकआउट लोगों के जीवन का हिस्सा बन गए थे. डर उनके मन में बैठ गया था. भविष्य अंधकारमय लग रहा था.

लेकिन रेखाबाई ने कभी अपने डर को अपनी किस्मत पर हावी नहीं होने दिया. दूसरी तवायफ़ों की तरह उन्होंने अपनी दुकान बंद नहीं की, वो तैयार होकर, रात में खूबसूरत साड़ी पहनकर अपने कोठे पर आने वाले मर्दों के लिए नाचती थीं.

अपने जीवन से उन्होंने सीखा कि तकलीफ़ों को पार कर मौकों के दरवाज़ें खुलते हैं, वो नहीं तो कम से कम आप जीवन जीना सीख जाते हैं.

रेखाबाई की उतार चढ़ाव से भरी ज़िदगी अब एक किताब की शक्ल ले चुकी है- द लास्ट कोर्टिसन - राइटिंग माइ मदर्स मेमोयर. इसे लिखा है रेखाबाई के बेटे मनीष गायकवाड़ ने.

गायकवाड़ कहते हैं, "मेरी मां हमेशा अपनी कहानी लोगों तक पहुंचाना चाहती थीं."

उनका कहना है, "उन्हें ये कहानी बताने में किसी तरह की शर्म और झिझक महसूस नहीं हुई, क्योंकि वो किशोरावस्था तक कोठे में रहे थे और उनकी मां के जीवन में कुछ छिपाने लायक नहीं है."

वो कहते हैं, "कोठे में पला बढ़ा एक बच्चा जो उसे देखना चाहिए, उससे बहुत ज़्यादा देखता है. मेरी मां को ये पता था और उन्हें नहीं लगा कि इसमें छिपाने वाली कोई बात है."

उनकी किताब, जिसमें उन्होंने अपनी मां कि सुनाई कई बातें का ज़िक्र किया है, पाठकों को कई बार हैरान करती है और भारत में 90 के दशक के मध्य में तवायफ़ों के जीवन को ईमानदारी से देखती है.

लेखक और डांसर मधुर गुप्ता के मुताबिक, "तवायफ़ भारतीय उपमहाद्वीप में 2 ईसा पूर्व से रही हैं."

"उन महिलाओं का काम राजाओं और देवताओं का मनोरंजन करना था."

आज़ादी से पहले ब्रिटिश राज में तवायफ़ों को इज्ज़तदार परफ़ॉर्मर का दर्जा दिया जाता था. वो कला में पारंगत होती थीं और उन्हें सबसे ताकतवर लोगों का संरक्षण मिलता था.

हिंदी फ़िल्म गंगूबाई तवायफ़ों के जीवन पर थी.
इमेज कैप्शन, हिंदी फ़िल्म गंगूबाई तवायफ़ों के जीवन पर थी.

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गुप्ता के मुताबिक, "समाज के मर्द उनके साथ दुर्व्यव्हार भी करते थे." भारतीय तवायफ़ों के दर्जे में गिरावट ब्रिटिश राज के बाद - जो उन्हें 'नाचने वालीं' या फिर सिर्फ़ सेक्स वर्कर की तरह देखते थे - इन्हें कम करने के लिए कानून लाए गए.

उनका स्टेटस भारत की आज़ादी के बाद और गिरता गया और कई तवायफ़ों को वेश्यावृत्ति का रुख करना पड़ा. ये प्रथा पूरी तरह से ख़त्म हो चुकी है, लेकिन तवायफ़ों के किस्से किताबों और फ़िल्मों में ज़िंदा हैं.

इन्हीं में से एक कहानी है रेखाबाई की.

वो पुणे के एक ग़रीब परिवार में पैदा हुईं, 10 बच्चों में वो छठे नंबर पर थीं. रेखाबाई को अपने जन्म की तारीख ठीक से नहीं पता है, बचपन से जुड़ी उनकी यादें धुंधली हैं. पांच लड़कियों को संभालते हुए थक चुके उनके पिता शराब पीकर एक तालाब में गिर गए थे.

नौ या दस साल की उम्र में कर्ज़ा नहीं चुका पाने के कारण उनकी शादी कर दी गई, कुछ समय बाद उन्हें कोलकाता के बाज़ार के कोठे में बेच दिया गया था.

किशोरावस्था में उन्होंने तवायफ़ की ट्रेनिंग शुरू कर दी थी. वो गाना और नृत्य सीखने लगीं. लेकिन उनकी ज़िंदगी और कमाई पर अधिकार उनकी महिला रिश्तेदारों का था. वो भी वहां तवायफ़ थीं.

1980 में एक कोठे में ली गई तस्वीर
इमेज कैप्शन, 1980 में एक कोठे में ली गई तस्वीर

जब मिला अपनी ज़िंदगी का कंट्रोल

भारत-चीन जंग के दौरान, उनकी रिश्तेदार चली गईं और फिर उन्हें अपनी ज़िंदगी का कंट्रोल मिला. उनके कैंडल लाइट परफ़ॉर्मेंस ने उन्हें अलग पहचान दिलाई और उन्हें अहसास दिलाया कि अगर वो हिम्मत दिखाएं तो खुद का ख़्याल रख सकती हैं और अपनी सुरक्षा कर सकती हैं.

और यही उनके जीवन का सिद्धांत बन गया. रेखाबाई बॉलीवुड की तवायफ़ों उमराव जान और पाकीज़ा की तरह दूसरे मर्द के साथ नहीं गईं. उन्होंने फिर से शादी नहीं करना का फ़ैसला किया - हालांकि उन्हें पसंद करने वालों की एक लंबी लिस्ट थी, जिनके लिए उन्होंने परफ़ॉर्म किया था - इनमें छोटे क्रिमिनल से लेकर बड़े शेख और म्यूज़िशियन शामिल थे - क्योंकि ऐसा करने का मतलब होता, कोठे और तवायफ़ का कारोबार छोड़ना.

छोटे से कोठे में उन्होंने परफ़ॉर्म किया, अपने बच्चों का ख़्याल रखा और कई बार ज़रूरत पड़ने पर अपने परिवार के लोगों को जगह दी. ये उनकी स्वतंत्रता और पावर का पर्याय बन गया.

हालांकि यही जगह विवाद और मुश्किलों का गढ़ बन गई. कई बार हालात ऐसे बने जिसके कारण मानवता और मासूमीयत ख़त्म होती दिखी, और इसकी जगह ले ली गुस्से, डर और दर्द ने.

फिल्म

कड़वे अहसासों ने बनाया मज़बूत

इस किताब में गायकवाड़ ने अपनी मां से जुड़ी कई कड़वी यादें साझा की हैं, जैसे कि एक बार शादी से इनकार करने पर एक ठग ने बंदूक निकाल ली थी.

एक और घटना हुई जब रेखाबाई से दूसरी तवायफों ने अभद्रता की क्योंकि वो उनसे जलती थीं. कुछ लोग गैंगस्टर बुलाकर उन्हें डराने की कोशिश करते थे, कुछ लोग उन्हें वेश्या भी कहते थें, जो वो नहीं थीं.

लेकिन कोठे ने उन्हें एक मज़बूत महिला भी बनने में मदद की. उन्होंने अपने डांस के टैलेंट को पहचाना और इसका असर भी समझा जो कि मर्दों पर होता था, वो मर्द जो अपनी असुरक्षाओं या जीवन की नीरसता और उदासी से बचना चाहते थे.

उन्होंने यहां मर्दों को समझना सीखा और उनके स्वाभिमान को ज़रूरत के हिसाब से शांत करना और तोड़ना सीखा.

वो कहती हैं, "मैंने कोठे की भाषा पर पकड़ बनाई. जब ज़रूरत पड़ी तो उस भाषा में बात की."

लेकिन इस साहसी, आकर्षक, स्ट्रीट-स्मार्ट कलाकार के साथ, कोठे ने रेखाबाई को एक दयालु, बेहद सुरक्षात्मक मां में तब्दील होते देखा, जिसने अपने बेटे को बेहतर जीवन देने के लिए हर संभव कोशिश की.

गायकवाड़ जब छोटे थे, तो उनकी मां उन्हें हमेशा अपने पास रखतीं. वो याद करते हैं कि कैसे परफ़ॉर्मेंस के बीच में भी वो उन्हें देखने भाग कर जाती थीं अगर उनके रोने की आवाज़ आती थी.

बाद में उन्होंने अपने बच्चे को बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया. फिर उन्होंने एक अपार्टमेंट ख़रीदा ताकि उन्हें अपने दोस्तों को बुलाने में शर्मिंदगी महसूस न हो.

उन्हें अपने बड़े होते बेटे पर गर्व था, ये बाद अलग थी कि उनकी अंग्रेज़ी मीडियम की पढ़ाई और बोर्डिंग स्कूल के रहन सहन ने उन्हें बहुत अलग बना दिया था.

किताब के एक दिल छू लेने वाले किस्से में, वह उस समय को याद करती है जब उनका बेटा, जो छुट्टियों के दौरान आया था, खाने के लिए कांटा और चम्मच मांगता है.

किताब में वो कहती हैं, "मुझे कांटे के बारे में पता था लेकिन अंग्रेज़ी में इसे क्या कहते हैं, मैं नहीं जानती थी. उसने जो बताया वो समझकर मैं मार्केट गई."

2000 के दशक के अंत में, वेश्या संस्कृति पूरी तरह से गायब हो गई थी और रेखाबाई ने कोलकाता में अपने अपार्टमेंट में रहने के लिए कोठा छोड़ दिया था. फरवरी में मुंबई में उनकी मृत्यु हो गई. गायकवाड़ का कहना है कि वह हमेशा अपनी मां, उनके धैर्य, प्रतिभा और जीवन के प्रति उत्साह से हैरान रहे.

वो कहते हैं, "मेरा मतलब है इस किताब को पढ़िये."

"भारत के मर्दों का मां को लेकर मानना है कि वो शुद्धता की प्रतिमान हों...लेकिन मुझे लगता है कि इस किताब से लोगों को अपनी माओं को एक इंसान, स्वतंत्र इंसान और हमसे रिश्तों के नज़रिए से देखना शुरू करेंगे."

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