हिमंत बिस्वा सरमा वीडियो विवाद: बीजेपी ने पोस्ट क्यों हटाई और इसके राजनीतिक मायने क्या हैं?

ओवैसी और सरमा
इमेज कैप्शन, असदुद्दीन औवेसी ने हिमंत बिस्वा सरमा के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई है (फ़ाइल फ़ोटो)
    • Author, इल्मा हसन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

असम बीजेपी के एक्स हैंडल पर पोस्ट किए गए एक वीडियो को विवाद खड़ा होने के बाद हटा लिया गया है.

इस वीडियो में राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को एक राइफ़ल संभालते हुए दिखाया गया था.

वीडियो में एआई से तैयार किया गया पार्ट जोड़ा गया था, जिनमें दाढ़ी और सफ़ेद टोपी पहने पुरुषों की तस्वीरों पर गोलियाँ लगती हुई दिखाई गईं.

यह वीडियो 7 फ़रवरी को असम बीजेपी हैंडल पर पोस्ट किया गया था और आलोचना बढ़ने के बाद इसे 8 फ़रवरी को हटा दिया गया.

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वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली.

विपक्षी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कई यूज़र्स ने इसे भड़काऊ और ख़तरनाक बताया. आलोचकों का कहना है कि वीडियो एक समुदाय को निशाना बनाता है और इससे समाज में तनाव बढ़ सकता है.

इस वीडियो में "फ़ॉरेनर फ़्री असम" और "नो मर्सी" जैसे वाक्य भी स्क्रीन पर दिखाए गए थे.

वीडियो में एक तस्वीर में दो लोगों को दिखाया गया था, जिनमें से एक की पहचान कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई के रूप में की जा रही थी. दोनों को सफ़ेद टोपी पहने हुए दिखाया गया था.

क़रीब 17 सेकंड के इस वीडियो के अंत में मुख्यमंत्री को काउबॉय अंदाज़ में दिखाया गया था. इस दृश्य में वह राइफ़ल और काउबॉय हैट के साथ दिखाई देते हैं.

वीडियो में कुछ संदेश भी दिखाई दिए जिनका अर्थ था, "तुम पाकिस्तान क्यों नहीं चले गए?" और "बांग्लादेशियों के लिए कोई माफ़ी नहीं है."

यह वीडियो ऐसे समय में साझा किया गया जब असम में बंगाली मूल के मुसलमानों को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी पहले से तेज़ हो गई है.

हिमंत बिस्वा सरमा ने क्या कहा

हिमंत बिस्वा सरमा
इमेज कैप्शन, हिमंत बिस्वा सरमा कई बार विवादों के केंद्र में रहे हैं (फ़ाइल फ़ोटो)

इस विवाद के बीच मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक इंटरव्यू में कहा कि उन्होंने वीडियो नहीं देखा था.

उन्होंने कहा कि वह हर सोशल मीडिया पोस्ट को व्यक्तिगत रूप से नहीं देखते और कई बार पार्टी के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म अलग टीम संभालती है.

हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि वह 'मियां' मुसलमानों के ख़िलाफ़ बोलते रहते हैं.

इस बीच एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि उन्होंने असम के सीएम के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हुए शिकायत दर्ज कराई है.

इस पर न्यूज़ एजेंसी एएनआई से बातचीत में सरमा ने कहा, ''मैं जेल जाने के लिए तैयार हूं, मैं क्या कर सकता हूं? मुझे किसी भी वीडियो के बारे में कुछ नहीं पता. अगर उन्होंने मेरे ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया है तो मुझे गिरफ़्तार कर लीजिए. मुझे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन मैं अपने शब्दों पर कायम हूं. मैं बांग्लादेशी घुसपैठियों के ख़िलाफ़ हूं और आगे भी उनके ख़िलाफ़ रहूंगा.''

विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया

अमन वदूद का कोट कार्ड
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इस वीडियो पर कांग्रेस ने अपने आधिकारिक बयान में कहा, "बीजेपी के असम प्रदेश के आधिकारिक हैंडल ने एक वीडियो पोस्ट किया, जो अल्पसंख्यकों की 'पॉइंट-ब्लैंक' हत्या को महिमामंडित करता हुआ दिखाई देता है. यह बेहद घृणित और परेशान करने वाला है और इसे किसी सामान्य ट्रोल सामग्री के तौर पर खारिज नहीं किया जा सकता. यह बड़े पैमाने पर हिंसा और नरसंहार के लिए उकसाने जैसा है."

वहीं कांग्रेस नेता और वकील अमन वदूद ने इस वीडियो को लेकर बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए.

उन्होंने कहा, "वीडियो बिल्कुल साफ़ तौर पर बड़े पैमाने पर हिंसा भड़काने की कोशिश है. यह नरसंहार जैसी सोच को बढ़ावा देने वाला है."

उन्होंने कहा, "वीडियो का संदेश इतना भद्दा और स्पष्ट था कि हर जगह इसकी आलोचना हो रही थी. सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के मीडिया तक में बीजेपी पर हमला हो रहा था. लगभग हर कोई अदालतों और संस्थाओं से पूछ रहा था कि इस मामले में क़ानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है."

अमन वदूद ने कहा, "असम में बीजेपी पूरी तरह भटक चुकी है. विकास के उनके दावे काम नहीं कर रहे हैं. बीजेपी नहीं चाहती कि लोग इन मुद्दों पर बात करें. अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए 'मियां' समुदाय पर लगातार हमला किया जा रहा है."

जबकि तृणमूल कांग्रेस ने कहा, "कल्पना कीजिए, एक निर्वाचित मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के वीडियो में मुसलमानों पर पॉइंट-ब्लैंक गोली चलाने का अभिनय कर रहे हों, जो इतना आपत्तिजनक था कि तीखी प्रतिक्रिया के बाद उसे हटाना पड़ा."

टीएमसी ने इसे 'राज्य समर्थित कट्टरपंथीकरण' बताया है.

असम में विधानसभा चुनाव क़रीब

अफ़रीदा हुसैन का कोट कार्ड

वरिष्ठ पत्रकार अफ़रीदा हुसैन का कहना है कि इस तरह का वीडियो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है.

वह कहती हैं, "जब मैंने पहली बार यह वीडियो देखा तो मेरे मन में बेहद नकारात्मक भाव आए. यह उस तरह का वीडियो नहीं है जिसकी उम्मीद किसी सत्तारूढ़ दल या संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से की जाती है. किसी समुदाय की ओर राइफ़ल ताने हुए दिखाना स्वस्थ लोकतंत्र का संकेत नहीं है. यह सार्वजनिक विमर्श में हिंसा को सामान्य बनाने जैसा है. वे ख़ून-ख़राबे की मानसिकता को बढ़ावा नहीं दे सकते."

उन्होंने कहा, "वे गौरव को सफ़ेद टोपी में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. अब वे कह रहे हैं कि इसका मक़सद घुसपैठियों को दिखाना था, लेकिन कोई संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ऐसे वीडियो कैसे पोस्ट कर सकता है?"

अफ़रीदा हुसैन का कहना है कि वीडियो हटाना पर्याप्त नहीं है.

वह कहती हैं, "लाखों लोगों तक यह वीडियो पहले ही पहुंच चुका है. नफ़रत पहले ही फैल चुकी है. अगर आगे चलकर कोई हिंसा होती है तो उसकी ज़िम्मेदारी से बचना मुश्किल होगा."

विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब असम में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.

राज्य में पहचान, नागरिकता और प्रवासन से जुड़े मुद्दे लंबे समय से चुनावी विमर्श का हिस्सा रहे हैं. राज्य की राजनीति पर नजऱ रखने वालों का कहना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों को लेकर बनाई गई सामग्री चुनावी ध्रुवीकरण को तेज़ कर सकती है.

गुवाहाटी यूनिवर्सिटी के राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर अखिल रंजन दत्ता का कहना है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में ध्रुवीकरण की रणनीति तेज़ हुई है.

वह कहते हैं, "सरकार तुष्टिकरण की राजनीति करने के बावजूद अपनी लोकप्रियता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखती. मुझे लगता है कि असुरक्षा की भावना ने सरकार को ध्रुवीकरण की राजनीति की ओर धकेला है."

असम में 'मियां' शब्द आम तौर पर बंगाली मूल के मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. यह समुदाय लंबे समय से पहचान और नागरिकता से जुड़े विवादों के केंद्र में रहा है.

बीजेपी और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा लंबे समय से 'मियां' मुसलमानों को लेकर सख़्त रुख़ अपनाते रहे हैं. उनके बयानों में अक्सर घुसपैठ और बंगाली मूल के मुसलमानों का मुद्दा प्रमुख रूप से उठाया जाता रहा है.

विवाद ने 'मियां' समुदाय को लेकर सरमा की पहले की टिप्पणियों पर भी दोबारा ध्यान खींचा है.

इससे पहले एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सरमा ने कहा था कि उनका काम "मियां लोगों को परेशान करना" है और उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि अगर रिक्शा चालक मियां मुसलमान हो तो उसे तय किराए से कम पैसे दिए जाएँ.

उन्होंने कहा था, "जो भी किसी भी तरह से परेशानी दे सकता है, वह दे, आप भी दें. रिक्शा में अगर किराया 5 रुपये है तो उन्हें 4 रुपये दें. तभी वे परेशान होंगे और असम छोड़ देंगे."

'असम सरकार में घबराहट की झलक'

अखिल रंजन का कोट कार्ड

प्रोफ़ेसर अखिल रंजन का कहना है कि मुसलमानों को लेकर राजनीतिक संदेशों में लगातार बदलाव देखने को मिला है. यह चुनावों से पहले हिमंत के घबराए होने का संकेत माना जा रहा है.

वह कहते हैं, "कभी सभी मुसलमानों को निशाना बनाया जाता है, कभी बांग्लादेशी मुसलमानों और स्थानीय 'मियां' मुसलमानों के बीच अंतर किया जाता है और कभी सभी 'मियां' लोगों को बाहर करने की बात कही जाती है. इससे स्थानीय लोगों के बीच नागरिक अधिकारों को लेकर भ्रम पैदा किया जा रहा है. यह एक राजनीतिक रणनीति है."

विशेषज्ञों का मानना है कि वीडियो हटाने का फ़ैसला केवल सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके क़ानूनी और राजनीतिक असर को लेकर भी चिंताएं थीं.

अखिल रंजन कहते हैं, "इस तरह के वीडियो गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकती हैं. किसी कम्युनिटी की ओर राइफ़ल ताने हुए दिखना बयान देने से कहीं ज़्यादा गंभीर माना जा सकता है. इसे क़ानूनी तौर पर भी चुनौती मिल सकती थी."

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की राजनीतिक रणनीति को समझे बिना इस विवाद को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता.

अखिल रंजन कहते हैं, "वह दो तरह की राजनीतिक छवि बनाने की कोशिश कर रहे हैं. एक तरफ़ वह ख़ुद को कट्टर हिंदुत्ववादी नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं और दूसरी तरफ़ स्थानीय और स्वदेशी समुदायों के हितों के रक्षक के तौर पर पेश करना चाहते हैं. वह हिंदुत्व और स्थानीय पहचान को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं."

अफ़रीदा हुसैन का मानना है कि यह रणनीति पार्टी के भीतर अपनी राजनीतिक भूमिका मज़बूत करने की कोशिश का हिस्सा भी हो सकती है.

वह कहती हैं, "वह पार्टी में ख़ुद को एक अहम और मज़बूत नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं. उनकी राजनीति उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा आक्रामक और ध्रुवीकरण करने वाले नेताओं की श्रेणी में ला रही है."

विधानसभा चुनाव से पहले पहचान और घुसपैठ से जुड़े मुद्दों के बार-बार सामने आने की संभावना है.

हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि इस तरह की रणनीति का चुनावी असर कितना होगा, यह स्पष्ट नहीं है.

अफ़रीदा हुसैन कहती हैं, "हर बार चुनावी ध्रुवीकरण से राजनीतिक फ़ायदा मिलेगा, यह तय नहीं है. लेकिन इस तरह की बयानबाज़ी समाज में विभाजन को ज़रूर गहरा कर सकती है."

वह यह भी कहती हैं कि इस तरह की रणनीति का चुनाव पर क्या असर होगा, इसके बारे में कुछ भी सटीक तौर पर नहीं कहा जा सकता.

वहीं, अखिल रंजन कहते हैं, "यह कहना मुश्किल है कि इससे चुनाव में कितना फ़ायदा होगा, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में सरकार की घबराहट और असुरक्षा की झलक दिखाई देती है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.