'इसराइल की साख हुई कमज़ोर', युद्धविराम पर इसराइली मीडिया जता रहा है चिंता

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- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
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ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम की घोषणा के बाद इसराइली मीडिया ने इस समझौते पर नाराज़गी जताई है.
इसराइली मीडिया का कहना है कि इस युद्ध का कोई भी लक्ष्य हासिल नहीं हुआ.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार तड़के ईरान के साथ 14 दिनों के युद्धविराम और होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने की घोषणा की थी.
उन्होंने ये घोषणा होर्मुज़ स्ट्रेट खोलने के लिए दी गई अपनी डेडलाइन ख़त्म होने के ठीक पहले की थी.
इसराइली मीडिया ने पहले अनुमान लगाया था कि समझौते के लिए चल रही बातचीत नाकाम रहेगी.और लड़ाई और तेज हो जाएगी. ख़ासकर दक्षिणपंथी टिप्पणीकार इस बढ़त के पक्ष में थे.
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने पहले सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर अंग्रेज़ी में पोस्ट कर कहा कि इसराइल "ट्रंप के दो हफ़्ते के लिए हमले रोकने के फै़सले का समर्थन करता है."
बाद में उन्होंने हिब्रू में भी एक विस्तृत पोस्ट डाला. उन्होंने कहा कि इसराइल के कुछ लक्ष्य अभी बाकी हैं. उन्हें या तो समझौते के जरिये हासिल किया जाएगा या फिर लड़ाई से.
इसराइल के पब्लिक ब्रॉडकास्टर 'केन' ने एक अनाम सूत्र के हवाले से कहा कि सरकार "ट्रंप के फ़ैसले से हैरान थी" और उन्हें "आख़िरी समय में जानकारी दी गई."
यह घोषणा पासओवर (यहूदी त्योहार) के कारण मीडिया में सीमित कवरेज पा सकी.
दक्षिणपंथी चैनल 14 ने इस ख़बर को कवर नहीं किया क्योंकि वह छुट्टियों और वीकेंड में प्रसारण नहीं करता है. ये चैनल इस लड़ाई का समर्थन और ट्रंप की तारीफ़ करता रहा है.
मुख्यधारा के मीडिया संस्थान अब भी युद्धकालीन नारे दिखा रहे थे. जैसे-"युद्ध में सब साथ."
'ट्रंप के सामने आत्मसमर्पण'

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विपक्षी नेताओं ने भी युद्धविराम की कड़ी आलोचना की है. याएर लापिड ने इसे "राजनीतिक आपदा" कहा, जबकि याएर गोलान ने इसे "पूरी तरह नाकामी" बताया.
इसराइली मीडिया में 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की उस रिपोर्ट को भी प्रमुखता दी गई, जिसमें बताया गया कि ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध में अमेरिका को शामिल करने में नेतन्याहू का कितना असर था.
विश्लेषकों ने चिंता जताई कि इस युद्ध से ट्रंप के साथ संबंध ख़राब हुए हैं, क्योंकि कोई भी लक्ष्य हासिल नहीं हुआ.
इसराइली अख़बार हारेत्ज़ के रक्षा विश्लेषक अमोस हरेल ने युद्धविराम को "जाल" बताया.
उन्होंने कहा कि नेतन्याहू ने ट्रंप को एक ऐसी योजना दी थी जिसमें कुछ हफ़्तों में ईरान की मिसाइल क्षमता खत्म करने, शासन को कमजोर करने और होर्मुज़ स्ट्रेट को खुला रखने का दावा किया गया था. लेकिन यह सब नहीं हो पाया.
उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ इसराइल की साख "काफी कमजोर हुई है" और अब आरोप लग रहे हैं कि ट्रंप को "बेकार के युद्ध में खींचा गया."
नेतन्याहू के करीबी लोगों ने इस अभियान के तीन बड़े लक्ष्य बताए थे.1.ईरान की सरकार को गिराना. 2. ईरान के परमाणु कार्यक्रम खत्म करना और 3. बैलिस्टिक मिसाइलों के ख़तरे को ख़त्म करना. लेकिन अब तक इनमें से कोई भी लक्ष्य हासिल नहीं हुआ.
'केन' की कूटनीतिक संवाददाता गिली कोहेन ने कहा कि नेतन्याहू ने "ट्रंप के सामने आत्मसमर्पण कर दिया."
उन्होंने यह भी कहा कि नया ईरानी नेतृत्व और ज्यादा कट्टर रुख़ अपना रहा है.

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चैनल 12 के पत्रकार युवाल सादे ने लिखा, "नाकामी या यूं कहें कि एक बड़ा मौका चूकने का एहसास है."
उन्होंने कहा, "जो युद्ध एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में शुरू हुआ था, वह अब एक कमजोर राहत की सांस के साथ ख़त्म हो रहा है."
नेतन्याहू ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर कहा कि, ''जब आप बम शेल्टरों और सुरक्षित कमरों में बैठकर भी दृढ़ता से डटे रहे, तब हमने मिलकर बड़ी जीत हासिल की. हमारे योद्धा मोर्चे पर थे और आप गृह मोर्चे पर.''
''इसराइल राष्ट्र ने बड़ी सफलताएं हासिल की हैं. ऐसी सफलताएं, जो हाल तक पूरी तरह असंभव लगती थीं. ईरान पहले से कहीं अधिक कमजोर है और इसराइल पहले से कहीं अधिक मजबूत.अब तक के इस अभियान का यही निष्कर्ष है.
'' और मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं. हमारे कुछ लक्ष्य अभी बाकी हैं. हम उन्हें या तो समझौते के जरिए हासिल करेंगे या फिर लड़ाई फिर से शुरू करके.''
ईरान का दावा

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ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने शर्तों के साथ युद्धविराम की घोषणा की थी.
उसके बाद एक बयान में उसने कहा था कि समझौते के ब्योरे को अंतिम रूप देने के लिए अधिकतम 15 दिनों के भीतर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में बातचीत होगी.
बयान में कहा गया कि ये बातचीत इसलिए होगी ताकि "मैदान में ईरान की जीत को राजनीतिक बातचीत में भी मज़बूत किया जा सके."
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के बयान के अनुसार अमेरिका ने इन बातों पर सहमति जताई है-
- ईरान के खिलाफ अपनी "आक्रामक कार्रवाई" दोबारा न करने की गारंटी
- होर्मुज़ स्ट्रेट पर ईरान का नियंत्रण जारी रहना
- यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) को स्वीकार करना
- सभी प्रतिबंध हटाना
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के सभी प्रस्ताव ख़त्म करना
- ईरान को मुआवज़ा देना
- क्षेत्र से अमेरिकी लड़ाकू बलों की वापसी
- और सभी मोर्चों पर युद्ध रोकना, जिसमें "लेबनान की इस्लामिक रेजिस्टेंस" के खिलाफ कार्रवाई भी शामिल है.
ईरानी सरकार और सरकारी मीडिया अमेरिका के साथ हुए समझौते को वहां के शासन की एक बड़ी जीत के रूप में पेश कर रहे हैं.
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के जारी बयान में कहा गया है कि ईरान ने इस युद्ध में अपने लगभग सभी लक्ष्य हासिल कर लिए हैं, और दुश्मन एक ऐतिहासिक विफलता का सामना कर रहा है.
युद्ध की शुरुआत में ही इस्लामिक रिपब्लिक के नेता अली ख़ामेनेई और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के वरिष्ठ जनरलों की अमेरिकी-इसराइली हमलों में मौत हो गई थी.
यह लड़ाई वहां के शासन के लिए अस्तित्व का ख़तरा था, एक अस्तित्व की लड़ाई थी.
इसलिए वे ख़ुद को विजयी मान रहे हैं, क्योंकि वे अमेरिका और इसराइल के साथ 30 से अधिक दिनों तक चले इस युद्ध में टिके रहे और बच गए.
इसलिए ईरान के इस बयान और ईरान के ख़ुद को विजेता के रूप में पेश करने को अहम माना जा रहा है.
बातचीत का एक दौर फिर से शुरू होने के बीच ये बात याद रखनी होगी कि अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे की बेहद कमी है.
पिछले एक साल में ईरान और अमेरिका के बीच दो बार बातचीत हुई है. दोनों ही बार बातचीत के बीच में युद्ध शुरू हो गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित



































