राघव चड्ढा और अन्य सांसदों ने अचानक छोड़ी आम आदमी पार्टी? 'आप' में चल क्या रहा है?

राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा (मध्य) ने संदीप पाठक (बाएं) और अशोक मित्तल (दाएं) के साथ आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी में जाने का एलान किया

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राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल होने की घोषणा की है और 'आप' के छह अन्य राज्यसभा सांसदों के अपने साथ होने का दावा किया है.

इस घोषणा के बाद राघव चड्ढा दल बदलने वाले कुछ सांसदों के साथ बीजेपी दफ़्तर पहुंचे.

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा में कुल दस सांसद हैं. दो-तिहाई से अधिक सांसदों के पार्टी छोड़ने पर दल बदल क़ानून लागू नहीं होगा. सात सदस्यों के निकलने के बाद पार्टी के राज्यसभा में सिर्फ़ तीन सांसद रह जाएंगे.

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इस घटनाक्रम के बाद दी गई अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा है, "बीजेपी ने फिर से पंजाबियों के साथ किया धक्का."

वहीं आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने भी इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे पंजाब के साथ 'धोखा' करार दिया है.

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आम आदमी पार्टी इस समय पंजाब में सरकार चला रही है और अगले साल फ़रवरी में होने वाले चुनावों की तैयारी कर रही है.

संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ मिलकर प्रेस कांफ़्रेंस कर राघव चड्ढा ने दावा किया है कि स्वाति मालीवाल, राजेंद्र गुप्ता, विक्रम साहनी और हरभजन सिंह ने भी पार्टी छोड़ी है.

आम आदमी पार्टी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि पार्टी छोड़कर गए नेताओं को पार्टी ने सब-कुछ दिया.

पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा, "राघव चड्ढा को पार्टी ने विधायक बनाया, सांसद बनाया और आप भारतीय जनता पार्टी की गोदी में पहुंच गए. संदीप पाठक को पंजाब की जनता के प्यार और आशीर्वाद से राज्यसभा में पहुंचने का मौका मिला, पार्टी ने बड़ी-बड़ी ज़िम्मेदारियां दीं."

संजय सिंह ने कहा, "पंजाब के साथ गद्दारी करने वाले ये जो सातों लोग हैं, पंजाब की जनता कभी इन्हें माफ़ नहीं करेगी."

संकेत पहले से मिल रहे थे

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा में नेता संजय सिंह ने इसे बीजेपी का ऑपरेशन लोटस कहा

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यह पहली बार नहीं है कि राजनेताओं ने आम आदमी पार्टी को छोड़ा है. हालांकि यह पहली बार है कि सात सांसदों के एक साथ पार्टी छोड़ने की चर्चा हो रही है.

अरविंद केजरीवाल ने जब भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चले आंदोलन के बाद पार्टी का गठन किया था तब से पार्टी के साथ जुड़े कई बड़े लोग पार्टी छोड़कर गए हैं.

पार्टी पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी इस घटनाक्रम को झटका तो ज़रूर लगा है लेकिन इसका पार्टी पर कोई ख़ास असर नहीं होगा.

लंबे समय से आम आदमी पार्टी को कवर कर रहे विक्रांत यादव कहते हैं, "आम आदमी पार्टी को लग रहा है कि राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में जाने को वह आगामी चुनावों में एक भावनात्मक मुद्दे की तरह इस्तेमाल कर सकेगी."

यह सवाल भी है कि क्या इतनी बड़ी तादाद में सांसदों के पार्टी को छोड़ने की आम आदमी पार्टी नेताओं को भनक तक नहीं लगी?

आम आदमी पार्टी ने इसे बीजेपी का 'ऑपरेशन लोटस' बताया है.

पत्रकार विक्रांत यादव कहते हैं, "हमें जानकारी मिली है कि आम आदमी पार्टी को कल ही ये संकेत मिल गए थे कि कई सांसद पार्टी छोड़ सकते हैं. हालांकि पार्टी ने जब इन सांसदों से संपर्क करने की कोशिश की तो बात नहीं हो सकी."

बीबीसी से बात करते हुए भी आम आदमी पार्टी के एक सक्रिय कार्यकर्ता ने संकेत दिया कि पार्टी को कई सांसदों के छोड़कर जाने के संकेत मिल रहे थे.

आम आदमी पार्टी ने हाल ही में राघव चड्ढा की जगह अशोक मित्तल को राज्यसभा में पार्टी का उप-नेता बनाया था. इस घटनाक्रम के बाद से ही राघव चड्ढा और पार्टी के बीच दूरी नज़र आ रही थी.

बीते 15 अप्रैल को जब अशोक मित्तल के कारोबारी ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय की रेड हुई तब आम आदमी पार्टी विधायक सौरभ भारद्वाज ने कहा था कि इस कार्रवाई के पीछे राघव चड्ढा का हाथ है.

विश्लेषक अब इस बात से हैरान हैं कि अशोक मित्तल भी राघव चड्ढा के साथ चले गए हैं.

'नेतृत्व से नाराज़गी नहीं, असली कारण कुछ और'

'राघव चड्ढा को लग रहा था कि उन्हें पार्टी ने किनारे कर दिया है'

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बीबीसी को पता चला है कि प्रवर्तन निदेशालय की रेड के बाद अशोक मित्तल से जुड़े कार्यकर्ताओं ने उनके और राघव चड्ढा के बीच टकराव दिखाने और रेड को राघव चड्ढा से जोड़ने की कोशिश की थी.

ऐसे में सवाल उठता है कि राघव चड्ढा के साथ अशोक मित्तल ने भी पार्टी क्यों छोड़ दी?

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री इसे प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई से जोड़कर देखते हैं.

हेमंत अत्री कहते हैं, "अशोक मित्तल राघव चड्ढा के साथ प्रेस कॉन्फ़्रेंस में शामिल हुए और फिर बीजेपी मुख्यालय पहुंचे. यह वही अशोक मित्तल हैं जिनके ठिकानों पर दस दिन पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई चल रही थी. क्या अब आगे भी उन पर कार्रवाई होगी?"

लंबे समय से आम आदमी पार्टी पर नज़र रखने वाले पत्रकार मुकेश केजरीवाल को लग रहा है कि अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, सत्येंद्र जैन और अन्य नेताओं के जेल जाने के बाद पार्टी के कई नेताओं में डर रहा होगा कि कहीं वह भी ऐसी ही कार्रवाई का निशाना न बन जाएं.

मुकेश केजरीवाल कहते हैं, "आम आदमी पार्टी ने जिन लोगों को नेता बनाया वह भी साधारण लोग ही साबित हुए. या तो वो किसी लालच में आए या एजेंसियों की कार्रवाई से डर गए."

हालांकि, पार्टी छोड़ने के बाद राघव चड्ढा ने कहा है कि आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ होने के अपने सिद्धांत से भटक गई है. उन्होंने कहा, "मैं उनकी दोस्ती के क़ाबिल नहीं था क्योंकि मैं उनके ग़ुनाह में शामिल नहीं था."

चड्ढा ने कहा, "जिस पार्टी को मैंने अपने खून-पसीने से सींचा और अपनी जवानी के 15 साल दिए, वह आज पूरी तरीके से अपने सिद्धांतों, मूल्यों और कोर मॉरल से भटक चुकी है."

हालांकि, विक्रांत यादव को लगता है कि सांसदों के पार्टी छोड़ने के पीछे सिर्फ़ नेतृत्व से नाराज़गी होने के तर्क नहीं हो सकता.

वह कहते हैं, "यदि पार्टी के भीतर नाराज़गी होती तो अशोक मित्तल जैसे नेता, जिन्हें अभी उप-नेता बनाया गया था, पार्टी छोड़कर नहीं जाते. असली कारण कुछ और ही हो सकते हैं."

मुकेश केजरीवाल यह भी याद दिलाते हैं कि जब अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री थे तब पंजाब में राघव चड्ढा को सक्रिय भूमिका दी गई थी और एक तरह से राज्य में पार्टी वही चला रहे थे.

लेकिन पिछले कुछ महीनों से उन्हें पार्टी में सक्रिय भूमिका से अलग कर दिया गया था और अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया पंजाब में अधिक सक्रिय हो गए थे.

मुकेश केजरीवाल कहते हैं, "राघव चड्ढा को लग रहा था कि पार्टी ने उन्हें किनारे कर दिया है, उन्हें पार्टी में अपना कोई भविष्य नज़र नहीं आ रहा था. लेकिन सवाल यह है कि वह बीजेपी में जाकर क्या हासिल कर लेंगे? क्या बीजेपी में उन्हें वह अहमियत मिल पाएगी जो आम आदमी पार्टी में हुआ करती थी?"

'सवाल केजरीवाल पर भी उठेंगे'

'सवाल अरविंद केजरीवाल पर भी उठेंगे कि आख़िर लोग उन्हें छोड़कर क्यों जा रहे हैं. केजरीवाल ने ही इन लोगों को पार्टी में ख़ास जगह दी थी'

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विश्लेषक यह भी मान रहे हैं कि इस घटनाक्रम से आम आदमी पार्टी के मनोबल पर असर हो सकता है.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, "यह साफ़ है कि जो कुछ भी हुआ है वह पंजाब चुनावों को ध्यान में रखकर किया गया है. आम आदमी पार्टी दिल्ली में सत्ता से पहले ही बाहर है, अब बीजेपी आप के नेताओं को अपनी तरफ़ खींचकर पंजाब के चुनाव में जाने का प्रयास कर रही है."

हालांकि, मुकेश केजरीवाल मानते हैं कि जो राज्यसभा सांसद पार्टी छोड़कर गए हैं उनका कोई ज़मीनी जनाधार नहीं था, ऐसे में चुनावों में शायद पार्टी को इससे बहुत फ़र्क न पड़े.

मुकेश केजरीवाल कहते हैं, "इन सब में से किसी का भी ऐसा जनाधार नहीं है और इनके जाने से पार्टी के वोट बेस पर कोई बहुत बड़ा असर नहीं पड़ेगा. आम आदमी पार्टी के समर्थक इन नेताओं की वजह से पार्टी से नहीं जुड़े हैं, वे पार्टी की नीतियों की वजह से साथ हैं."

अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन से निकलकर आम आदमी पार्टी बनाई थी, अब वह ख़ुद और पार्टी के कई बड़े नेता कथित भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसे हैं. दिल्ली शराब नीति में हुए कथित घोटाले के आरोप में वह जेल जा चुके हैं.

शुरुआती सालों में पार्टी के साथ जुड़े कई बड़े नेता धीरे-धीरे करके अलग होते चले गए. जिन नेताओं ने अब पार्टी छोड़ी है ये सभी बाद में अरविंद केजरीवाल के साथ जुड़े थे.

हेमंत अत्री कहते हैं, "शांति भूषण, योगेंद्र यादव या उन जैसे उस समय के दूसरे नेता अरविंद केजरीवाल को छोड़कर गए क्योंकि उनका क़द उस समय केजरीवाल से बड़ा था और केजरीवाल व्यक्ति आधारित पार्टी बनाना चाहते थे. लेकिन अब तो वह नेता पार्टी छोड़कर गए हैं जिन्हें केजरीवाल ने तैयार किया, पार्टी में जगह और ओहदे दिए. ऐसे में ये सवाल भी उठेगा कि आम आदमी पार्टी में केजरीवाल के साथ एडजस्ट होने में लोगों को दिक़्क़त क्यों आ रही है?"

वहीं मुकेश केजरीवाल कहते हैं, "एक साथ इतने सांसद गए हैं, सवाल अरविंद केजरीवाल पर भी उठेंगे कि आख़िर लोग उन्हें छोड़कर क्यों जा रहे हैं. केजरीवाल ने ही इन लोगों को पार्टी में ख़ास जगह दी थी."

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