बेगूसराय में महिला का सामूहिक बलात्‍कार, प्राइवेट पार्ट से डॉक्‍टरों ने लकड़ी निकाली, अब तक क्‍या पता है

डॉक्टरों ने सोमा के प्राइवेट पार्ट से एक लकड़ी का टुकड़ा निकाला

इमेज स्रोत, Shahnawaz Ahmad/BBC

इमेज कैप्शन, डॉक्टरों ने सोमा के प्राइवेट पार्ट से एक लकड़ी का टुकड़ा निकाला
    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बेगूसराय से
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

(चेतावनी: इस रिपोर्ट के कुछ विवरण पाठकों को विचलित कर सकते हैं)

सोमा (बदला हुआ नाम) अस्पताल के बेड पर पड़ी हैं और थोड़ी-थोड़ी देर में चौंक जाती हैं. उनकी नींद लगातार आने वालों के चलते बार-बार टूट रही है जिनमें पत्रकार, नेता, सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं.

आस-पास के बेड पर भर्ती अन्य महिला मरीज़ और उनके रिश्तेदार सोमा को कभी जिज्ञासा तो कभी सहानुभूति की नज़रों से देखते हैं.

सोमा की सुरक्षा में तैनात महिला सिपाही परेशान है कि उसे आराम नहीं मिल रहा. लेकिन सोमा को अपने बच्चों की फ़ि‍क्र है. वे उससे कई किलोमीटर दूर गांव में रिश्तेदारों के सहारे हैं.

सोमा के प्राइवेट पार्ट (गुप्‍तांग) से डॉक्टरों ने तकरीबन चार इंच का लकड़ी का एक टुकड़ा निकाला है. आरोप है कि यह टुकड़ा गैंगरेप के बाद उनके प्राइवेट पार्ट में डाला गया. सोमा अपने साथ एक बंदूक की खाली गोली (खोखा) भी लाई थीं. उनके दावे के मुताबिक, वह भी उनके प्राइवेट पार्ट से निकली है.

बेगूसराय के एसपी मनीष ने बीबीसी को बताया, "मेडिकल रिपोर्ट में सेक्सुअल असाल्ट (यौन हमला) की पुष्टि हुई है. इस मामले में बीएनएस की धारा 70(1) के अंतर्गत एफ़आईआर दर्ज की गई है. इस मामले में तीन नामजद और दो अज्ञात अभियुक्त हैं."

"नामजद अभियुक्त नीतीश महतो और एक अन्य अभियुक्त अमर निषाद की गिरफ़्तारी कर ली गई है. इस मामले में एसआईटी गठित की गई है और वह अन्य अभियुक्तों की गिरफ़्तारी के लिए छापेमारी कर रही है. जो सबूत दिए गए हैं, उनकी जांच जारी है."

क्या है पूरा मामला?

सोमा ने बताया कि बीती 11 जून की रात तकरीबन साढ़े ग्यारह बजे वह अपने घर में बने शौचालय में गई थीं. उनके एक कमरे के घर में कोई चारदीवारी नहीं है. शौचालय में दरवाजा नहीं है. उस पर महज़ एक पर्दा टंगा है.

सोमा ने बीबीसी को बताया, "गाँव के ही रामू महतो, सूरज महतो और नीतीश महतो आए और उन्होंने मेरी साड़ी खोलकर मेरा मुंह बांध दिया. मेरा ब्लाउज़ फाड़कर मेरा हाथ बांध दिया. ये लोग ग़लत करने लगे. ये लोग मेरी छाती पर ब्लेड मारने लगे और दुष्कर्म किया."

"हम दर्द से कराह रहे थे तो मेरे पति को लगा कि बिल्ली आवाज कर रही है. उन्होंने बिल्ली समझकर दो बार डाँटा, लेकिन फिर उन्हें शक हुआ. उन्होंने बाहर आने के लिए कमरे का दरवाज़ा खोलना चाहा तो वह बाहर से बंद था. जिसके बाद उन्होंने बगल वाले घर में फोन किया. इसके बाद दरवाज़ा खुला और सब लोग मेरी हालत देखकर रोने लगे."

सोमा और उसका परिवार एक कमरे के घर में रहता है. इस घर में चारदीवारी नहीं है और शौचालय में पर्दा टंगा है

इमेज स्रोत, Shahnawaz Ahmad/BBC

इमेज कैप्शन, सोमा और उसका परिवार एक कमरे के घर में रहता है. इस घर में चारदीवारी नहीं है और शौचालय में पर्दा टंगा है

सभी अभियुक्त सोमा के घर से महज़ 300 मीटर की दूरी पर रहते हैं.

सोमा के पति ई– रिक्शा चलाते हैं. अपनी पत्नी की ये हालत देखकर वे ई- रिक्शा से सोमा को स्थानीय थाने लेकर गए जो उनके घर से तकरीबन तीन किलोमीटर दूर है.

सोमा का आरोप है, "उन्हें थाने से भगा दिया और कहा कि पहले जाकर इसका इलाज़ कराओ."

वह कहती हैं कि उनके पति के पास थाने का वीडियो मौजूद है.

बेगूसराय पुलिस ने इस मामले में थानाध्यक्ष राजीव कुमार की 'लापरवाही, उदासीनता और संवेदनहीनता' मानते हुए उन्हें निलंबित कर दिया है.

तीन जगह इलाज के लिए गई महिला

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
दिनभर: पूरा दिन,पूरी ख़बर (Dinbhar)

वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.

एपिसोड

समाप्त

सोमा के पति ने बताया कि थाने से निकलने के बाद वह उन्हें, ई- रिक्शा से ही थाने से थोड़ी दूर स्थित एक प्राइवेट क्लीनिक इलाज के लिए गए. उनके साथ परिवार के कुछ सदस्य भी थे. क्लीनिक ने इलाज करने से इनकार कर दिया.

बीबीसी ने जब क्लीनिक के कर्मचारी से इस बारे में सवाल पूछा तो उन्होंने बताया, "महिला टोटो (ई- रिक्शा) से आई थी. उसकी हालत सीरियस थी. हमारे यहां इमरजेंसी केस नहीं लेते. यहां कोई डॉक्टर भी नहीं था. तो हमने मना कर दिया."

परिवार इसके बाद महिला को सामुदायिक स्वास्थय केन्द्र लेकर गया. यहां 11 जून की रात की ड्यूटी में आयुष मेडिकल ऑफिसर कविता कुमारी थीं.

कविता कुमारी ने बीबीसी को बताया, "महिला बेहोश थी. वह कुछ बताने की हालत में नहीं थी और उसके साथ आई महिलाओं ने भी कुछ नहीं बताया. उन्होंने छाती और पाँव दिखाया जिसमें खरोंच के निशान थे. मैंने उसे इलाज के लिए सदर अस्पताल रेफ़र कर दिया."

इसके बाद सोमा का इलाज सदर अस्पताल में हुआ. सोमा के मुताबिक़, उसे 12 जून की सुबह तकरीबन सात से आठ बजे के बीच होश आया तब उन्होंने अपने पति को यौन हमले के बारे में जानकारी दी.

डॉक्टरों ने पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी?

बेगूसराय सिविल सर्जन अशोक कुमार ने बीबीसी से कहा कि महिला पेट दर्द की शिकायत लेकर अस्पताल आई थीं. उन्होंने 13 जून को अपने साथ हुई हिंसा के बारे में बताया

इमेज स्रोत, Shahnawaz Ahmad/BBC

इमेज कैप्शन, बेगूसराय सिविल सर्जन अशोक कुमार ने बीबीसी से कहा कि महिला पेट दर्द की शिकायत लेकर अस्पताल आई थीं. उन्होंने 13 जून को अपने साथ हुई हिंसा के बारे में बताया

सामुदायिक स्वास्‍थ्‍य केन्द्र में जहां सोमा का इलाज सबसे पहले हुआ, वहां उनके बारे में एंट्री में "फ़िज़िकल असाल्ट" लिखा है यानी शारीरिक हमला.

क्या पुलिस को इसकी जानकारी दी गई?

इस सवाल पर कविता कुमारी कहती हैं, "महिला को कोई ब्लीडिंग नहीं थी और दुष्कर्म जैसा मामला ऊपरी तौर पर नहीं लग रहा था. इसलिए सूचना नहीं दी गई."

सदर अस्पताल ने क्या पुलिस को इस बात की सूचना दी?

इस सवाल पर बेगूसराय के सिविल सर्जन अशोक कुमार बीबीसी से कहते हैं, "महिला जब आई तो उसने पेट दर्द की शिकायत की थी. उसने इस घटना (सामूहिक दुष्कर्म की घटना) के बारे में कुछ नहीं बताया. 13 जून को उसने बताया कि सामूहिक दुष्कर्म हुआ तब चिकित्सकों ने उनकी मेडिकल जांच की."

बता दें इस मामले में एफ़आईआर स्थानीय थाने में 13 जून को दर्ज़ हुई जबकि सोमा और उसके परिवार वाले घटना के तुरंत बाद थाने गए थे.

हालाँकि सोमा ने बीबीसी से दावा किया, "12 जून को इलाज़ के दौरान डॉक्टर उसे सुई देने के दौरान पूछ रही थीं कि क्या तुम्हारा बलात्कार भी हुआ है. तो हम कहते थे कि हाँ मैडम हुआ है."

ऐसे मामलों में अस्पतालों की क्या ज़िम्मेदारी है?

बीबीसी के इस सवाल पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के बिहार चैप्टर के अध्यक्ष आशुतोष शरण कहते हैं, "यह निर्भर करता है कि शारीरिक हमला कितना गंभीर हैं. हर केस में सूचना नहीं दी जाती लेकिन अगर चिकित्सक को लगे कि स्थिति गंभीर है तो पुलिस को इंफार्म किया जाना चाहिए. महिला मरीज़ के मामले में यह ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है."

बार-बार बेहोश होती सोमा, पेट में जलन से परेशान

सदर अस्पताल में मेडिकल जांच के बाद 13 जून की रात सोमा वापस अपने घर लौट आईं.

सोमा के पति ने बीबीसी को बताया, "घर लौटने के बाद 14 जून की सुबह यह बेहोश हो गईं. कहती थीं कि प्राइवेट अस्पताल में दिखाओ लेकिन थाने ने कहा कि सदर अस्पताल जाओ. अस्पताल गए, इलाज करवाए और फिर से 15 जून को घर लौट आए. लेकिन यह बार–बार बेहोश हो जाती थीं और दिन भर सोती रहती थीं. कहती थी कि पेट में लहर जैसी उठती है."

"गांव की दाई (प्रसव कराने वाली महिला) ने पेट छूकर बताया कि पेट में कुछ है. बाद में 18 जून की सुबह ये एक गोली लेकर आई और बोली कि यह उसके प्राइवेट पार्ट से निकला है. हमने देखा कि वह एक गोली थी."

सोमा और उसके पति ये गोली लेकर फिर से सदर अस्पताल गए.

सिविल सर्जन अशोक कुमार बताते हैं, "यह एक खाली गोली या खोखा थी. हम लोगों ने महिला की फिर से जाँच की तो डॉक्टरों ने उसके प्राइवेट पार्ट से लकड़ी का एक टुकड़ा निकाला. यह तीन से चार इंच लंबा था. महिला फिलहाल स्वस्थ हैं और रिकवर कर रही हैं."

मार्च में भी महिला पर हुआ था यौन हमला

11 जून की रात घटी घटना में तीन नामजद अभियुक्त हैं रामू महतो, सूरज महतो और नीतीश महतो.

आरोप है कि उसने अपने भाई प्रदीप महतो के साथ 12 मार्च, 2026 को भी सोमा पर यौन हमला किया था. इस मामले की एफ़आईआर स्थानीय थाने में तीन मई को दर्ज़ हुई थी.

इस एफ़आईआर में लिखा है, "रामू और प्रदीप महतो ने लूटपाट, मारपीट की और कपड़ा खोलने की कोशिश की. वह ग़लत काम में असफल रहा."

इस मामले को अन्य धाराओं के साथ साथ बीएनएस की धारा 76 में दर्ज़ किया गया है.

धारा 76 किसी महिला को निर्वस्त्र करने या नग्न होने के लिए मजबूर करने के इरादे से उस पर हमला करने से जुड़ी है. इस मामले में रामू और प्रदीप महतो को थाने से ही बेल मिल गई.

बेगूसराय रेंज के डीआईजी शैलेश कुमार सिन्हा ने मार्च में यौन हमले के मामले में पुलिस के लापरवाही बरतने के आरोप से इनकार किया है

इमेज स्रोत, Shahnawaz Ahmad/BBC

इमेज कैप्शन, बेगूसराय रेंज के डीआईजी शैलेश कुमार सिन्हा ने मार्च में यौन हमले के मामले में पुलिस के लापरवाही बरतने के आरोप से इनकार किया है

इस मामले के इंवेस्टिगेशन ऑफिसर अभिराम कुमार झा ने बीबीसी से कहा, "चूँकि इस मामले में तीन साल की सज़ा का प्रावधान है इसलिए रामू और प्रदीप को बेल मिल गई."

हालांकि सोमा ने बीबीसी से बात करते हुए आरोप लगाया, "पिछली बार भी इन लोगों ने हमारा बलात्कार किया था. हम बार-बार कहते थे बलात्कार लिखो लेकिन ये लोग लूटपाट लिख रहे थे. हम पढ़े-लिखे नहीं है. बाद में किसी से आवेदन पढ़ाया तो पता चला कि लूटपाट लिखा है. उन लोगों (अभियुक्तों) को थाने से बेल मिल गया तो उनका मन बढ़ गया. पहले ही पुलिस कुछ करती तो ऐसा नहीं होता."

बीबीसी से हुई बातचीत में बेगूसराय रेंज के डीआईजी शैलेश कुमार सिन्हा ने मार्च के महीने में घटी उस घटना के संबंध में किसी तरह की लापरवाही से इनकार किया.

उन्होंने कहा, "मार्च में हुई घटना का जो आवेदन दर्ज़ हुआ था, उसके आलोक में धाराएँ लगाई गईं. थानाध्यक्ष ने उसी आधार पर कार्रवाई की. इस बार (11 जून की घटना) थानाध्यक्ष ने लापरवाही बरती इसलिए उन पर कार्रवाई हुई."

क्या पहले से कोई विवाद था?

सोमा के गाँव में ज़्यादातर लोग एक ही जाति के है. इस गांव में दसवीं पास लोग भी गिने-चुने हैं और कोई सरकारी नौकरी में नहीं है. ये लोग मज़दूरी करके या अन्य कोई काम करके अपना गुज़र-बसर करते हैं.

सोमा और उनकी बहन एक ही गांव में रहती है. सोमा की बहन बीबीसी से कहती है, "इस परिवार का कोई विवाद किसी से नहीं है. न खेत का विवाद है और न ही कोई कर्ज़ा है. कभी लड़ाई भी नहीं हुई. लेकिन फिर भी ये लोग ऐसा क्यों करते है, ये तो यही लोग बताएँगे."

हालाँकि गांव में एक पूर्व जनप्रतिनिधि ने बीबीसी से बताया, "सोमा किसी से दबती नहीं है. अगर उसे कोई बात बुरी लगेगी तो वो मुखर होकर उसका विरोध करती थी. विवाद की वजह यही लगती है.''

उनका दावा है, "अभियुक्त आपराधिक प्रवृत्ति के हैं जबकि सोमा का परिवार ईमानदार तरीक़े से कमाने-खाने वाले लोग हैं."

बेगूसराय पुलिस ने भी रविवार को जिन दो अभियुक्तों नीतीश महतो और अमर निषाद की गिरफ़्तारी की है, उनका आपराधिक इतिहास है. बेगूसराय पुलिस द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में लिखा है कि ये लोग गांव में 'दबदबा बनाए रखने के लिए देसी कट्टा और गोली' रखते थे.

सोमा के परिवार का किसी से कोई विवाद नहीं है और न ही कभी लड़ाई हुई है

इमेज स्रोत, Shahnawaz Ahmad/BBC

इमेज कैप्शन, सोमा के परिवार का किसी से कोई विवाद नहीं है और न ही कभी लड़ाई हुई है

इस घटना के बाद से सोमा के गाँव में दहशत है.

गाँव की ही एक महिला ने बीबीसी से कहा, "हम लोग अब हँसिया साथ में रखकर सोते हैं."

प्राइवेट पार्ट में बुलेट

इस पूरी घटना में अहम सवाल ये है कि क्या किसी व्यक्ति के शरीर में इतने दिन बुलेट या कोई बाहरी वस्‍तु रह सकती है.

इस पर चिकित्सकों की राय बँटी हुई है.

बेगूसराय सिविल सर्जन अशोक कुमार कहते हैं, "कोई फ़ॉरेन बॉडी इतने दिन तक शरीर में रह नहीं पाएगी. आदमी चलेगा-फिरेगा तो वह गिर जाएगी. अगर इतना दिन रह जाएगा तो शरीर में सेप्टिसीमीया जैसी जानलेवा स्थिति बन सकती है."

वहीं बुलेट के सवाल पर आईएमए के आशुतोष शरण कहते हैं, "खाली बुलेट सबसे सुरक्षित धातु है. आप देखिए सोना तस्करी में तस्कर प्राइवेट पार्ट में सोना छिपाकर लाते हैं. उनको कोई परेशानी नहीं होती. इसलिए बुलेट अंदर होने से किसी व्यक्ति की जान का ख़तरा नहीं होता."

बीती अप्रैल में सत्ता संभालने के बाद मुख्‍यमंत्री सम्राट चौधरी अलग-अलग मंच से महिलाओं के प्रति अपराध के ख़िलाफ़ कठोर कदम उठाने की बात कहते रहे हैं.

लेकिन सोमा के साथ हुई घटना ने पुलिस व्‍यवस्‍था की सबसे निचली प्रशासनिक इकाई यानी थाने के कामकाज के तरीके और महिला हिंसा के प्रति उनकी संवेदनशीलता पर सवाल उठा दिया है. बिहार उन राज्यों में शामिल है, जहाँ पुलिस बल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सबसे ज़्यादा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)