महिला थाने या 'समझौता' कराने के अड्डे

    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी के लिए
  • प्रकाशित

पटना के गांधी मैदान स्थित महिला थाने में पान की पीक से पुती दीवारें आपका स्वागत करती हैं और यहां मर्दों की उपस्थिति का संकेत करती हैं.

देखकर लगता है जैसे मर्द और बरसों से चली आ रही मर्दाना सोच महिला थानों में भी घुसी हुई है. बिहार में महिला थानों में कैसे हालात हैं ?

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महिला थाना, पटना, बिहार

पटना की 24 साल की भूमिका (नाम बदला हुआ) कई महीनों से कोर्ट के चक्कर लगा रही हैं.

उनका आरोप हैं कि उनके होने वाले पति ने शादी से पहले ही उनके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए.

भूमिका का कहना है कि वे शिकायत लेकर महिला थाने गईं, लेकिन वहां उनकी शिकायत दर्ज नहीं हुई. उन्हें कोर्ट के चक्कर काटने पड़े और 6 महीने की कोशिश के बाद मई 2015 में मामले की एफ़आईआर हुई.

भूमिका कहती हैं, “मैं जब थाने गई तो महिला पुलिसकर्मियों ने मुझे उसी लड़के से ही शादी कर लेने की सलाह दी. वो यहां कानून का पालन करने के लिए हैं या समझौता करवाने के लिए."

"मुझे इस बात का अहसास कराया गया कि जैसे जुर्म मैंने ही किया है. मेरा पूरा एक साल इस चक्कर में बर्बाद हो गया और लड़का आज भी खुलेआम घूम रहा है.”

पुरुष मानसिकता

बिहार महिला पुलिस अफ़सर

बिहार सरकार ने 2009 में ही हर ज़िले में थाना खोलने के प्रस्ताव को अनुमति दी थी.

राज्य की जनसंख्या में क़रीब पांच करोड़ (4,98,21295) महिलाएँ हैं और 40 महिला थाने हैं. इसके अलावा 112 अनुमंडलों में महिला थाना कोषांग खोलने की योजना है.

हालांकि ऐसा नहीं है कि महिला थानों में सिर्फ महिलाओं की ही तैनाती हो. इन थानों में पुरुष पुलिस कर्मचारियों की भी तैनाती है.

बिहार में इन थानों को खोलने का मक़सद महिलाओं को जल्द न्याय दिलाना था, लेकिन महिला एक्टीविस्टों की मानें तो नतीजा शून्य रहा.

बकौल महिला एक्टीविस्ट और अधिवक्ता श्रुति सिंह, “ये थाने समझौता का अड्डा बनते जा रहे हैं. सरकार 4-5 महिला चेहरों को सामने रखकर सशक्तिकरण का दावा करती है, लेकिन जमीन पर ऐसा कुछ हो नहीं रहा है. थाने पुरुष मानसिकता के साथ काम कर रहे है ऐसे में महिलाओं के कल्याण की बात बेमानी है.”

महिला थाने में पंहुची महिलाएं

हालांकि पटना के गांधी मैदान स्थित महिला थाने की प्रभारी नीलमणि इस बात को खारिज करती है कि थाने पुरुष मानसिकता के साथ काम कर रहे हैं.

वो कहती हैं, “हमारे पास ज़्यादातर मसले पति पत्नी के झगड़े के आते हैं. ज़्यादातर महिलाएं समझौता चाहती हैं. सो हम कांउसलिंग के जरिए रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं. जिस मामले में ये संभव नहीं वहां शिकायत दर्ज होती है.”

थाने में 7 महिला पदाधिकारियों की तैनाती है. इसके अलावा एक पुरुष पदाधिकारी और 2 पुरुष ड्राइवर हैं. पुरुष पदाधिकारी की तैनाती के सवाल पर नीलमणि कहती हैं, “हमें अगर किसी पुरुष को पकड़ना है तो हमें पुरुष पदाधिकारी चाहिए ही.”

‘आयोग में आने वाले मामलों में कमी’

बिहार में राज्य महिला आयोग का भी दावा है कि महिला थाने बिहार में सफल हुए हैं.

आयोग की अध्यक्ष अंजुम आरा कहती हैं, “महिला थाना बनने के बाद आयोग में आने वाली शिकायतें कम हुई हैं. जिसका साफ़ मतलब है कि ज़िलों में भी महिला थाने और महिलाओं की सहायता के लिए बने दूसरे तंत्रों में ठीक तरीके से काम हो रहा है.”

अक्सर पुलिस को जेंडर सेंसेटिव बनाने की बात होती है फिर चाहे वो महिला पुलिस ही क्यों न हो.

25 साल से महिलाओं के बीच काम कर रहीं नीलू कहती हैं कि ऐसे सेमिनार तो बिहार में होते हैं लेकिन ये हॉल के अंदर तक ही प्रभावी होते हैं.

क्या कहती है महिलाएं

बिहार की महिला थाना

इस सब के बीच बिहार की महिलाओं की अलग-अलग राय है.

अनामिका गया में मगध यूनीवर्सिटी से वूमेन स्टडीज की पढ़ाई कर रही हैं.

वो कहती हैं, “हमारे यहां महिला थाना ठीक ठाक काम कर रहा है. मैं जब भी किसी महिला पुलिसकर्मी को देखती हूँ तो ज़्यादा सहज महसूस करती हूँ. मुझे लगता है कि अगर महिला थाने में सिर्फ महिलाएं तो वहां हमारा कंफ़र्ट लेवल बढ़ जाएगा.”

हालांकि समस्तीपुर की सुमन मुर्तजा इससे इत्तेफाक नहीं रखती. सुमन ब्यूटी पार्लर चलाती हैं.

वो कहती हैं, “महिला थाने में औरतों से उम्मीद की जाती है कि घर बचाना है तो वो थोड़ा एडजेस्ट करके रहें. अगर एडजेस्ट कराना ही आपकी प्राथमिकता है तो फिर पुरुष थाने ही रहने देते. ये अलग से महिला थाना क्यों खोला?”

सुमन जैसी महिलाओं का ये जवाब बिहार में महिला थानों पर कई सवाल छोड़ जाता है.

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