अरब जगत में बढ़ता चीन का दबदबा भारत के लिए चिंता की बात?

प्रकाशित

शुभम किशोर

बीबीसी संवाददाता

बुधवार को बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने फ़लस्तीनी प्राधिकरण के प्रमुख मोहम्मद अब्बास से मुलाकात की.
इमेज कैप्शन, बुधवार को बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने फ़लस्तीनी प्राधिकरण के प्रमुख मोहम्मद अब्बास से मुलाकात की.

इसी साल 6 अप्रैल को सऊदी अरब और ईरान के विदेश मंत्री सात साल में पहली बार मिले.

इससे एक महीने पहले ही दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने सालों की दुश्मनी के बाद राजनयिक संबंधों को फिर से स्थापित करके दुनिया को चौंका दिया था.

जिन बैठकों के कारण ये सफलता मिली थी, उनकी मेज़बानी और मध्यस्थता चीन ने की थी.

इसी के साथ मध्य-पूर्व देशों की तरफ़ चीन के बढ़ते रुझान की चर्चा शुरू हो चुकी थी और वो अब भी जारी है.

अप्रैल में ईरान और सऊदी अरब के विदेश मंत्री चीन में मिले थे.
इमेज कैप्शन, अप्रैल में ईरान और सऊदी अरब के विदेश मंत्री चीन में मिले थे.

चीन में फ़लस्तीनी नेता

अब चीन इसराइल और फ़लस्तीनियों के विवाद सुलझाने में अपनी भूमिका तलाश रहा है.

गुरुवार को चीनी प्रीमियर ली क्वेंग ने फ़लस्तीनी प्राधिकरण के प्रमुख मोहम्मद अब्बास से मुलाकात की.

ली ने अब्बास को “चीन का पुराना दोस्त” बताया जिन्होंने “चीन-फ़लस्तीन के रिश्तों को बढ़ाने के लिए बहुत सहयोग किया है.”

इससे पहले बुधवार को बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने महमूद अब्बास के साथ बैठक की. दोनों नेताओं ने यह भी कहा कि उनके बीच रणनीतिक साझेदारी पर सहमती बनी है.

चीनी सरकारी मीडिया के अनुसार, अब्बास के साथ अपनी बैठक की शुरुआती टिप्पणी में, शी ने कहा कि चीन ने "फ़लस्तीनियों के अपने वैध राष्ट्रीय अधिकारों को बहाल करने के न्यायोचित कारण" का समर्थन किया है और चीन "फ़लस्तीन को आंतरिक सुलह हासिल करने और शांति को बढ़ावा देने में मदद करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार" है.

इससे पहले अब्बास का चीन में पूरे सैन्य सम्मान के साथ स्वागत किया गया था. दोनों पक्षों ने “सामरिक समझौते” की बात कही.

मोहम्मद अब्बास (बाएं) के साथ चीनी प्रीमियर ली क्वैंग
इमेज कैप्शन, मोहम्मद अब्बास (बाएं) के साथ चीनी प्रीमियर ली क्वैंग

सऊदी अरब से बेहतर होते रिश्ते

मार्च में सऊदी अरब की तेल कंपनी सऊदी अरामको ने चीन में कई अरब डॉलर के निवेश को बढ़ाने और चीन को कच्चे तेल देने से जुड़े दो प्रमुख सौदों की घोषणा की. दिसंबर में चीनी राष्ट्रपति शी जिनिपिंग ने दोनों देशों के बीच चीनी करेंसी युआन में व्यापार की बात कही.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक सऊदी अरब ने कहा है कि वो चीन के साथ सहयोग करना चाहता है, प्रतिस्पर्धा नहीं, देश के ऊर्जा मंत्री ने रविवार को कहा कि उन्होंने पश्चिमी देशों के संदेहों को "नज़रअंदाज" किया है.

दुनिया के शीर्ष तेल निर्यातक की दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता के साथ द्विपक्षीय संबंध हाइड्रोकार्बन पर आधारित हैं. लेकिन राजनीतिक संबंधों के गर्म होने के बीच सऊदी अरब और चीन के बीच सुरक्षा और तकनीक के क्षेत्र में भी सहयोग गहरा हुआ है.

सऊदी-चीन

चीन बदल रहा है अपना तरीक़ा

चीन का अभी तक जो दबदबा रहा है, वो आर्थिक मोर्चे पर रहा है, उसका निवेश कई देशों में हैं, व्यापार है, और वो एक बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है,

आईसीडब्ल्यूए के सीनियर फ़ेलो डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर्रहमान मानते हैं कि चीन अब अपनी छवि को बदलने की कोशिश कर रहा है.

वो कहते हैं, “चीन को लगने लगा है कि वो सिर्फ़ आर्थिक पावर बनकर नहीं रह सकते. उन्होंने अमेरिका से सीखा है कि जब तक राजनीति, डिप्लोमेसी और जियो पॉलिटिक्स को मिक्स नहीं करेंगे, तब तक वैश्विक पावर नहीं बनेंगे.”

उनका कहना है कि यही अमेरिकी मॉडल था जिस पर चीन ख़ुद को ले जा रहा है.

जो बाइडन

अमेरिका की दूरी का चीन को फ़ायदा?

अगले हफ्ते, अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के बीजिंग की यात्रा करने की उम्मीद है, जिसे वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच अमेरिकी राजनयिक संबंधों पर एक कथित चीनी जासूसी गुब्बारे की उपस्थिति के कारण स्थगित कर दिया गया था.

व्यापार और तकनीक के मामले में अमेरिका और चीन के रिश्ते पिछले एक दशक के सबसे ख़राब दौर में है. अमेरिका का ताइवान के लिए समर्थन और एशिया और अन्य जगहों पर प्रभाव की कोशिश से रिश्तों में दरार बढ़ी हैं.

अमेरिका पिछले 10 सालों में मध्य पूर्व एशिया से हटा है, उसकी जितनी दिलचस्पी पहले होती थी अब वैसी नहीं है, जब तक अमेरिका की वहां दिलचस्पी थी, चीन ने दूरी बनाए रखी.

छोड़िए YouTube पोस्ट
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: बीबीसी दूसरी वेबसाइट्स की सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. YouTube सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त

जेएनयू में प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, “अब जब अमेरिका का ध्यान यूरोप, यूक्रेन युद्ध और प्रशांत महासागर में ज़्यादा है, तो चीन इधर दिलचस्पी ले रहा है. सऊदी अरब और ईरान में जैसा कि तालमेल उसने करवाया है, उसी तर्ज़ पर वो फ़लस्तीन के साथ रिश्ते बढ़ाना चाहता है और उसकी मदद भी करना चाहता है.”

“जहां तक फ़लस्तीन और इसराइल का मुद्दा है, तो अमेरिका की इसराइल के साथ रिश्ते बहुत अच्छे हैं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में इनमें और सुधार आया था, लेकिन फ़लस्तीन के साथ उसके रिश्ते बिल्कुल अच्छे नहीं हैं.”

लेकिन चीन के रिश्ते फ़लस्तीन और इसराइल दोनों के साथ ठीक हैं, और क्योंकि वो बिल्कुल नया एक्टर है, ये उम्मीद करना कि वो दोनों देशों के बीच सकारात्मक बातचीत करवा सकता है, ग़लत नहीं होगा.

फ़लस्तीनियों के लिए भी अमेरिका की तुलना में चीन पर भरोसा करने में आसानी होगी.

हालांकि डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर्रहमान मानते हैं कि दोनों देशों के बीच सुलह कराना आसान नहीं है और चीन ऐसा कर पाएगा, ये मुश्किल लग रहा है.

इसराइल के राष्ट्रपति राष्ट्रपति हर्ज़ोग के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन
इमेज कैप्शन, इसराइल के राष्ट्रपति हर्ज़ोग के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन

अमेरिका पर कितना पड़ेगा फ़र्क़

अमेरिका की निर्भरता मध्य पूर्व एशिया पर कम हुई है.

डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं कि तेल और इसराइल, ये दो कारण थे कि अमेरिका मध्य पूर्व में अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता था, अब दोनों उसके लिए उतने ज़रूरी नहीं रहें.

अमेरिका कह रहा है, कि वो इंगेज नहीं कर रहा लेकिन वो पूरी तरह से डिसइंगेज भी नहीं कर रहा है. वो अभी भी अपनी मौजूदगी बनाए रखना चाहता है.

लेकिन मध्य पूर्व के देश चीन को मौका देने के पक्ष में दिख रहे हैं.

फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, “उन्होंने अमेरिका को देख लिया है, उन्हें ये भी समझ आ रहा है कि अमेरिका के रहते हुए उनकी समस्याओं का कोई समाधान नहीं निकला है.”

भारत यूएई

भारत के लिए चीन का बढ़ता दबदबा चिंता की बात?

चीन अपनी छवि और साख बनाने की कोशिश में है, इसलिए स्वर्ण सिंह मानते हैं कि भारत को चीन के इन कदमों का संज्ञान लेना चाहिए लेकिन ये बहुत चिंता की बात नहीं है, क्योंकि भारत से मध्य पूर्व के देशों से अच्छे संबंध हैं.

सिंह कहते हैं, “भारत ने वहां बहुत अच्छा तालमेल बनाया है. यहां तक कि जो देश आपस में दोस्ती नहीं रखते हैं, वो भी भारत से संबंध बनाए रखना चाहते हैं, इनमें इसराइल, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब शामिल हैं. अमेरिका ने भी शायद इसलिए चार देशों के समूह में भारत को शामिल किया है.”

जानकार मानते हैं कि भारत को इसलिए भी सचेत रहना चाहिए कि चीन जितना निवेश और पैसा भारत के पास नहीं हैं, लेकिन भारत के लिए अच्छी बात ये है कि मध्य पूर्व के देशों से उसके राजनीतिक और समाजिक रिश्ते अच्छे हैं.

ये भी पढ़ें:

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)