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ऋषि सुनक ब्रिटेन का पीएम बनने की रेस में कितना आगे?
ब्रिटेन एक बार फिर अगला प्रधानमंत्री चुनने की तैयारी कर रहा है. सितंबर में प्रधानमंत्री पद की रेस में लिज़ ट्रस से हारे भारतीय मूल के ऋषि सुनक इस बार पीएम बनने की रेस में सबसे मज़बूत दावेदार बन गए हैं.
पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के रेस से बाहर होने के बाद अब सुनक की प्रधानमंत्री दावेदारी पुख़्ता हो गई है.
अब ऋषि सुनक ये दौड़ तभी हार सकते हैं जब इस पद की दूसरी दावेदार पेनी मोरडॉन्ट आज लंच टाइम तक अपने समर्थक सांसदों की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी कर पाएं.
अगर वो ऐसा नहीं कर पाईं तो आज दोपहर को ही ऋषि सुनक कंज़र्वेटिव पार्टी के नेता चुन लिए जाएंगे और वे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन जाएंगे.
जो भी हो इस सप्ताह के अंत तक ब्रिटेन को एक नया प्रधानमंत्री मिल जाएगा.
सात सप्ताह में तीसरा व्यक्ति ब्रिटेन का पीएम बनने जा रहा है.
अस्थिरता और चिंता वाला दौर
ये एक अभूतपूर्व अस्थिरता वाला दौर रहा है और इस बात से निजी बातचीत में कंज़र्वेटिव पार्टी के अधिकतर सदस्य सहमत हैं. पार्टी के सदस्यों को इस बात की भी चिंता है कि इस बेहूदी सर्कस से पार्टी की प्रतिष्ठा को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचा है.
हमसें जिन पत्रकारों को इस उठापटक को कवर करने का अवसर मिला है वो जानते हैं ये वीकेंड सियासी रूप से कुछ जाना-पहचाना सा लगा है.
ये पहली बार नहीं था कि वेस्टमिंस्टर में लोग पूछ रहे हैं कि 'अब बोरिस जॉनसन क्या करेंगे?'
बोरिस जॉनसन कैरिबियाई मुल्क़ से लौटे और शनिवार-रविवार को फ़ोन करके सांसदों का मूड भांपने की कोशिश की. कुछ ही सप्ताह पहले इन्हीं सांसदों ने बोरिसा जॉनसन को इस्तीफ़ा देन पर मजबूर किया था.
वो जानना चाहते थे कि क्या बदले हुए हालात में उनकी पार्टी सांसदों का उनके बारे में नज़रिया बदला है या नहीं.
बोरिस जॉनसन के प्रयास
शनिवार दोपहर से ही उनकी टीम बता रही थी कि उनके साथ पर्याप्त संख्या में सांसद हैं. ब्रिटेन के कैबिनेट मंत्री जैकब रीस-मॉग ने तो सार्वजनिक रूप से इसका दावा किया.
एक और मंत्री क्रिस -हीटन-हैरिस तो इससे आगे बढ़ गए. उन्होंने दावा किया कि बोरिस जॉनसन को कंज़र्वेटिव पार्टी के लीडर बनने की दावेदारी करने के लिए ज़रूरी काग़ज़ी कार्रवाई पूरी कर उसे पार्टी के समक्ष रख चुके हैं.
इसका साफ़ मतलब था कि वो पद की दौड़ में शामिल हैं.
इन ख़बरों की प्रतिक्रिया के तौर पर ऐसे विषय उठाए गए जिनसे बोरिस जॉनसन अगर लौटने तो उन्हें दो-चार होना पड़ेगा. आसान भाषा में कहूँ तो ऐसे मुद्दों की भरमार है.
वैसे बोरिस जॉनसन के साथ खड़े लोग भी उनकी किसी बात पर यक़ीन नहीं कर रहे हैं.
ऐसे ही एक सांसद ने मुझसे एक निजी वार्ता में कहा कि अगर बोरिस जॉनसन कोविड के दौरान पार्टी के बारे में संसद में एक जांच का सामना नहीं कर रहे होते तो हालात बिल्कुल अलग होते.
सांसद ने मुझे बताया कि अगर उनके ख़िलाफ़ जांच नहीं हो रही होती तो वे एक बार फिर प्रधानमंत्री पद की दौड़ में होते.
लेकिन अब वो इस दौड़ में शामिल हैं.
और वो इस दौड़ में सिर्फ़ इसलिए नहीं हैं क्योंकि उनके साथ संख्याबल नहीं है. ऐसा लगता है कि वे कंज़र्वेटिव पार्टी के एक तिहाई सांसदों को भी अपने हक़ में खड़ा नहीं कर पाए हैं.
बोरिस जॉनसन इस बात को भली-भांति समझते हैं कि पार्टी सांसदों की मर्ज़ी के बिना अगर वो रेस जीत भी जाते हैं तो उनकी जीत बेमानी-सी होगी. बिना संसदीय दल के समर्थन के पीएम की ज़िम्मेदारियां निभाना कितना मुश्किल होगा ये उन्हें मालूम है.
एक और परिवर्तन
तो इसलिए ब्रिटेन में सत्ता में एक बार फिर से परिवर्तन हो रहा है.
मुझे पता चला है कि ब्रिटेन के सम्राट किंग चार्ल्स तृतीय, सोमवार शाम को लंदन में होंगे. अगर पार्टी में कांटेस्ट नहीं हुआ और आज दोपहर ऋषि सुनक को चुना गया तो शायद वो मंगलवार तक प्रधानमंत्री पद पर बैठने का इंतज़ार करेंगे ताकि वो दिन के उजाले में डाउनिंग स्ट्रीट में प्रवेश कर सकें.
लेकिन देखते हैं क्या होता है. हो सकता है कि अब भी पार्टी के भीतर नेता पद के लिए कांटेस्ट हो जाए.
लेकिन जो चीज़ मायने रखती है वो ये है कि जीतने वाले व्यक्ति के हिस्से भी वही समस्याएं आएंगी जो अपना पद छोड़ चुकी लिज़ ट्रस के हिस्से आई थीं.
ये समस्याएं हैं - बुरी तरह से विभाजित कंज़र्वेटिव पार्टी, लगातार बढ़ती महंगाई, चिंताजनक वित्तीय हालात और विपक्ष के ताबड़तोड़ हमले.
लेकिन एक उम्मीद ये भी है कि कंज़र्वेटिव पार्टी की हर बार तबाही से उबर कर मज़बूत होने की भूख फिर से जाग जाएगी.
अगर ऐसा नहीं हुआ तो ये मुश्किल काम दौर जल्द ही असंभव हो जाएगा.
कैसे पेश होती है दावेदारी?
ब्रिटेन में इस वक्त कंज़र्वेटिव पार्टी का बहुमत है. बोरिस जॉनसन के हटने के बाद लिज़ ट्रस प्रधानमंत्री बनी थीं.
अब पार्टी को फिर से नया नेता चुनना है. जो पार्टी का नेता चुना जाएगा वही अगला पीएम भी होगा.
कंज़र्वेटिव पार्टी में नेता बनने के चुनाव के लिए 100 सांसदों के हस्ताक्षरों की ज़रूरत होती है. ये प्रक्रिया सार्वजनिक तो नहीं है पर पार्टी की '1922 कार्यकारिणी' नए नेता का चुनाव करती है.
ये प्रक्रिया किसी प्रकाशित डॉक्यूमेंट में नहीं है. लेकिन बीबीसी संवाददाता हेलेन केट ने इस प्रक्रिया से जुड़े कुछ लोगों से बातचीत की और इसे समझाना चाहा.
कज़र्वेटिव पार्टी के दो सांसदों को उम्मीदवार के नाम का प्रस्ताव रखना होता है. इन दोनों सांसदों का नाम सार्वजनिक किया जाता है. इसके बाद 98 अन्य सांसदों को इस प्रस्ताव का समर्थन करना होता है. ये सांसद अपना नाम गुप्त रख सकते हैं.
पद के उम्मीदवार फ़ोन और ईमेल के ज़रिए सांसदों को प्रस्तावक बनने के लिए तैयार कर रहे हैं ताकि 1922 कार्यकारिणी में अपना फॉर्म जमा करवा पाएं.
हेलेन केट के मुताबिक इसके बाद पार्टी ये चेक करेगी कि जिनका नाम फॉर्म में बतौर प्रस्तावक है वो वाक़ई उम्मीदवार के साथ हैं या नहीं.
भारतीय समय के अनुसार नॉमिनेशन दाख़िल करने की अवधि आज शाम साढ़े छह बजे समाप्त हो जाएगी. अगर एक से अधिक सांसद नॉमिनेशन दाख़िल करते हैं तो रात आठे बजे से वोटिंग शुरू हो जाएगी.
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