भारत में परिसीमन

भारत में परिसीमन

सीटों की संख्या बढ़कर 850 तक होने से लोकसभा में क्या बदलाव आएगा?

बीते 55 साल में भारत की जनसंख्या में भारी इजाफा हुआ है. 1971 में भारत की जनसंख्या 54 करोड़ थी, जो 2026 में बढ़कर करीब एक अरब 42 करोड़ हो गई है. यानी कुल 163 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

लेकिन लोकसभा का आकार काफी हद तक लगभग समान ही बना हुआ है. 1977 के बाद से केवल एक सीट जोड़ी गई है, जब 1987 में गोवा से दमन और दीव के अलग होने के बाद यह बदलाव हुआ. इसके साथ ही निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या बढ़कर वर्तमान में 543 हो गई.

सरकार ने अब लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए एक विधेयक संसद में पेश किया है. इस पर संसद के विशेष सत्र में चर्चा हो रही है. वर्तमान संवैधानिक सीमा 550 सीटों की है और संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक इस सीमा को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव करता है.

यह विधेयक महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण को लागू करने का भी प्रयास करता है. नारी शक्ति वंदन अधिनियम जिसे सितंबर 2023 में पारित किया गया था, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करता है.

सरकार ने ऐसे संशोधन प्रस्तावित किए हैं, जिनसे 2011 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल करके इस आरक्षण को लागू किया जा सके. इससे 2029 के लोकसभा चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण को लागू करना संभव हो सकता है.

543 seats in the Lok Sabha

यहां हर स्क्वायर लोकसभा की एक सीट को दिखाता है. लोकसभा में फिलहाल 543 सीटें हैं, जो 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों के बीच बंटी हुई हैं.

543 seats in the Lok Sabha

सरकार अब लोकसभा में सीटों की कुल संख्या बढ़ाकर 850 करने की योजना बना रही है. इनमें से 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेश के लिए तय होंगी. इनमें से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी.

प्रस्तावित एक अन्य विधेयक, परिसीमन विधेयक 2026 (डीलिमिटेशन बिल 2026), एक ऐसे आयोग के गठन का प्रावधान करता है जिसे राज्यों के बीच लोकसभा की सीटों का आवंटन करने, निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करने और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की ज़िम्मेदारी दी जाएगी.

हालांकि, सीटों के आवंटन के फॉर्मूले को लेकर विधेयक स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन दो संभावनाएं हैं-

• राज्य लोकसभा के विस्तार के दौरान अपने मौजूदा प्रतिशत हिस्से को बनाए रखें.
• जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर सीटों में अनुपात के हिसाब से वृद्धि की जाए. विधेयक के अनुसार, आयोग को नवीनतम प्रकाशित जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करना होगा, जिससे 2011 की जनगणना के आंकड़े के आधार बनने की संभावना है.

उत्तर प्रदेश के पास मौजूदा समय में 80 सीटें हैं - जो लोकसभा की 543 सीटों का 14.7% हिस्सा है. यदि 850 सदस्यीय लोकसभा में यही हिस्सा बरकरार रहता है, तो 14.7% के हिसाब से उत्तर प्रदेश को 124 सीटें मिलेंगी. वहीं, यदि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर सीटों का आवंटन होता है, तो यहां सीटों की संख्या बढ़कर 138 हो सकती है.

इसी तरह, केरल के पास अभी लोकसभा में 20 सीटें हैं. यदि उसका मौजूदा शेयर बरकरार रहता है, तो उसकी सीटें बढ़कर 31 हो जाएंगी, लेकिन यदि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर आवंटन होता है, तो यह संख्या मामूली रूप से बढ़कर 23 ही होगी.

राज्यसीटमौजूदा हिस्सेदारी के आधार पर प्रोजेक्शन2011 की जनगणना के आधार पर प्रोजेक्शन
Uttar Pradesh80
124
+44
138
+58
Maharashtra48
75
+27
78
+30
West Bengal42
65
+23
63
+21
Bihar40
62
+22
72
+32
Tamil Nadu39
61
+22
50
+11
Madhya Pradesh29
45
+16
50
+21
Karnataka28
43
+15
42
+14
Gujarat26
40
+14
42
+16
Andhra Pradesh25
39
+14
34
+9
Rajasthan25
39
+14
47
+22
Odisha21
33
+12
29
+8
Kerala20
31
+11
23
+3
Telangana17
26
+9
24
+7
Assam14
22
+8
21
+7
Jharkhand14
22
+8
23
+9
Punjab13
20
+7
19
+6
Chhattisgarh11
17
+6
18
+7
Haryana10
16
+6
17
+7
Delhi7
13
+6
16
+9
Jammu & Kashmir5
9
+4
12
+7
Uttarakhand5
8
+3
7
+2
Himachal Pradesh4
6
+2
5
+1
Arunachal Pradesh2
3
+1
2
+0
Goa2
3
+1
2
+0
Manipur2
3
+1
2
+0
Meghalaya2
3
+1
2
+0
Tripura2
3
+1
2
+0
Andaman & Nicobar Islands1
2
+1
1
+0
Chandigarh1
2
+1
1
+0
Dadra & Nagar Haveli1
2
+1
1
+0
Daman & Diu1
2
+1
1
+0
Lakshadweep1
1
+0
1
+0
Mizoram1
2
+1
1
+0
Nagaland1
2
+1
1
+0
Puducherry1
2
+1
1
+0
Sikkim1
2
+1
1
+0
Ladakh1
2
+1
1
+0

अगर 2011 की जनगणना आंकड़ों का उपयोग किया जाता है, तो पांच दक्षिणी राज्यों की कुल सीटें बढ़कर 173 हो सकती हैं, यानी 44 सीटों की वृद्धि, जबकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले चार राज्यों की कुल सीटें बढ़कर 307 हो सकती हैं-जो 133 सीटों की वृद्धि है.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने कहा, “केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा कल संसद में पेश किए जाने वाला परिसीमन संशोधन विधेयक तमिलनाडु और दक्षिणी राज्यों पर थोपा गया ‘एक बड़ा ऐतिहासिक अन्याय’ है.”

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने प्रधानमंत्री को लिखे एक खुले पत्र में कहा कि दक्षिणी राज्यों के राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने के बाद भी संसद में उनकी आवाज़ कमजोर हो जाएगी, जबकि उत्तर-मध्य बेल्ट के अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को असमान रूप से अधिक लाभ मिलेगा.

रेड्डी ने सीटों के आवंटन के लिए एक वैकल्पिक फॉर्मूला भी प्रस्तावित किया, जिसमें राज्यों के आर्थिक योगदान के प्रदर्शन को ध्यान में रखा जाए.

लोकसभा में सीटें बढ़ाने की जरूरत क्यों है?

पिछले 50 साल में भारत की जनसंख्या 2.5 गुना से अधिक बढ़ी है, लेकिन यह वृद्धि सभी राज्यों में समान रूप से नहीं हुई है.

राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में, 1971 से 2027 के बीच आबादी में लगभग 190 फ़ीसदी से लेकर 220 फ़ीसदी से भी ज़्यादा की बढ़ोतरी का अनुमान है.

2027 के लिए जनसंख्या का अनुमान, जनसंख्या आकलन विषय पर टेक्निकल ग्रुप की रिपोर्ट से लिए गए हैं.

इसके उलट केरल में जनसंख्या में केवल 70 फ़ीसदी और तमिलनाडु में 88 फ़ीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान है. कर्नाटक में 137 फीसदी और अविभाजित आंध्र प्रदेश में 113 फीसदी जनसंख्या बढ़ने का अनुमान है.

दक्षिण भारत के सभी राज्यों में पिछले कुछ सालों में जनसंख्या वृद्धि भारत के औसत से काफी कम रही है. इस असमान बढ़ोतरी का नतीजा एक सांसद कितने लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, उसमें दिखाई देता है.

राजस्थान में एक सांसद औसतन 33 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है. यह संख्या कतर की कुल जनसंख्या से भी ज्यादा है. वहीं, केरल का एक सांसद इससे लगभग आधे, यानी 18 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है.

एक सांसद द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले लोगों की संख्या (लाख में)

एक सांसद द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले लोगों की संख्या (लाख में)

1977 में जब छठी लोकसभा के चुनाव हुए थे, तब सभी बड़े राज्यों में सांसदों ने औसतन करीब 10.44 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व किया था.

अगर लोकसभा की सदस्य संख्या 543 ही बनी रहती है, तो 2027 तक उत्तर प्रदेश का एक सांसद करीब 30 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करेगा. यह कर्नाटक या तमिलनाडु के किसी सांसद द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले लोगों की संख्या से कहीं अधिक है.

850 सांसदों वाली लोकसभा में, यदि सीटों का पुनर्वितरण प्रतिशत के आधार पर मौजूदा हिस्सेदारी के अनुसार किया जाता है, तो भी यह असंतुलन समाप्त नहीं होगा. हालांकि प्रति सांसद प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों की संख्या कम हो जाएगी, लेकिन असमानता बनी रहेगी. उत्तर प्रदेश में एक सांसद लगभग 19.7 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करेगा, जबकि केरल में प्रति सांसद यह संख्या लगभग 11.7 लाख लोगों की होगी.

राज्यों के बीच निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या में बढ़ता यह अंतर भारत के लिए लंबे समय से एक राजनीतिक चुनौती रहा है, और यह 1970 के दशक से परिसीमन पर लगी रोक का परिणाम है

आसान शब्दों में कहें तो, परिसीमन सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया है. इसका उद्देश्य हर 10 साल में जनगणना के बाद इसे पूरा करना था, ताकि जनसंख्या में हुए बदलावों को ध्यान में रखा जा सके. इसके पीछे मूल विचार यह सुनिश्चित करना था कि राज्यों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में ही सीटें आवंटित की जाएं. जिससे हर सांसद या प्रतिनिधि के पास लगभग समान संख्या में लोगों का प्रतिनिधित्व हो.

यह प्रैक्टिस संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 के जरिए अनिवार्य की गई है. संविधान का अनुच्छेद 81 कहता है कि सभी राज्यों के लिए सीटों और जनसंख्या का अनुपात, जहाँ तक संभव हो, समान होना चाहिए. वहीं अनुच्छेद 82 में कहा गया है कि प्रत्येक जनगणना के बाद लोकसभा की सीटों का पुनः समायोजन किया जाना चाहिए.

हालांकि, सीमाओं के पुनः समायोजन की इस प्रैक्टिस को 1976 में संविधान के 42वें संशोधन के माध्यम से रोक दिया गया था. यह रोक तब तक लागू रहनी थी जब तक कि 2001 की जनगणना के आँकड़े उपलब्ध नहीं हो जाते. इसका तर्क यह था कि राज्यों को जनसंख्या वृद्धि को स्टेबलाइज करने का मौका मिला.

2002 में संविधान के 84वें संशोधन ने परिसीमन पर लगी रोक को 2026 तक बढ़ा दिया, ताकि "राज्यों को जनसंख्या स्टेबलाइजेशन की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया जा सके." इसका मतलब यह था कि परिसीमन का काम 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक के लिए टाल दिया जाएगा.

हालांकि, विधेयक में प्रस्तावित है कि परिसीमन “उस नवीनतम जनगणना के आधार पर किया जाए, जिसके प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित हो चुके हैं”, या 2011 की जनगणना के आधार पर.

आख़िरी जनगणना, जो 2021 में होनी थी, वह अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई थी. जून 2025 में गृह मंत्रालय ने घोषणा की कि जनगणना 2027 में कराई जाएगी. जनगणना 2027 का पहला चरण अभी जारी है.

परिसीमन नहीं होने से और समय के साथ जनसंख्या वृद्धि में भारी अंतर का नतीजा यह हुआ है कि भारत के कुछ राज्यों का प्रतिनिधित्व अब कम है, जबकि अन्य राज्यों का प्रतिनिधित्व जरूरत से ज्यादा है.

जैसा कि पंकज पटेल और टी. वी. शेखर ने 2024 में जर्नल ऑफ एशियन एंड अफ्रीकन स्टडीज़ के लिए अपने रिसर्च आर्टिकल में कहा है, "इन ज़्यादा समृद्ध राज्यों को, खासकर से दक्षिण भारत में, परिवार नियोजन कार्यक्रमों, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और उच्च शिक्षा स्तरों से लाभ मिला है. इसकी वजह से यहां जनसंख्या वृद्धि की गति धीमी रही है. नतीजा ये हुआ कि उनके पास अब जनसंख्या के साइज की तुलना में संसद में ज्यादा सीटें हैं. इससे वो राजनीतिक रूप से ओवर रिप्रेजेंटेशन की स्थिति में आ गए हैं.

वहीं दूसरी ओर, उच्च प्रजनन दर वाले उत्तरी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम है. मतलब उनकी जनसंख्या के साइज के अनुपात में उनके पास सीटों की संख्या कम है.

लोकसभा में ओवर रिप्रेजेंटेशन और अंडर रिप्रेजेंटेशन

उत्तर प्रदेश80
बिहार40
मध्य प्रदेश29
राजस्थान25
-11
-10
-5
-6
543 seats in the Lok Sabha

इन चारों राज्यों के रिप्रेजेंटेशन में 31 सीटें कम हैं. इसमें उत्तर प्रदेश के पास अपनी जनसंख्या के अनुपात में 11 सीटें कम हैं.

तमिलनाडु39
कर्नाटक28
आंध्र प्रदेश25
केरल20
तेलंगाना17
+10
+2
+5
+6
+3
543 seats in the Lok Sabha

इन पांच राज्यों में 26 सीटों का ओवर रिप्रेजेंटेशन है. इसमें तमिलनाडु के पास उसकी जनसंख्या के अनुपात में 10 सीटें अधिक हैं.

नतीजतन, अगर लोकसभा की 543 सीटों को फिर से एडजस्ट किया जाता, तो दक्षिण भारत के राज्यों को तेजी से जनसंख्या बढ़ने वाले राज्यों की तुलना में अपनी सीटें गंवानी पड़तीं.

इसी वजह से दक्षिण भारत के राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने पहले कहा था कि उन्हें जनसंख्या नियंत्रण के उपाय लागू करने की सजा दी जा रही है.

परिसीमन पर हुई जॉइंट एक्शन कमेटी की मीटिंग में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने कहा था, "यहां हर राज्य ने जनसंख्या नियंत्रण के जरिए काफी प्रगति की है. यह कदम ऐसे राज्यों को सजा देने वाला है. लोगों के प्रतिनिधियों की संख्या कम करके, हमारी आवाज को दबा दिया जाएगा."

तमिलनाडु में एक और सर्वदलीय बैठक में स्टालिन ने कहा, "अगर संसद की सीटें बढ़ाई जाती हैं, तो मौजूदा ढांचे के मुताबिक तमिलनाडु का प्रतिनिधित्व भी उसी अनुपात में बढ़ना चाहिए. तमिलनाडु की मौजूदा सीटों का प्रतिशत, जो कुल सीटों का 7.18 प्रतिशत है, किसी भी हाल में कम नहीं किया जाना चाहिए."