परमाणु समझौता: विरोध ईरान में भी

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    • Author, राकेश भट्ट
    • पदनाम, बीबीसी मॉनीटरिंग
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"समाधान मिल गया!" तीन शब्दों के इस संदेश को ईरानी विदेश मंत्री मुहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने 2 अप्रैल की रात जैसे ही ट्विटर पर डाला अगले 17 मिनटों में ही इसके सात हज़ार शेयर हो गए.

ये समाधान जिसका उल्लेख ईरानी विदेश मंत्री ने अपने सन्देश में किया वह उस समस्या की ओर इशारा था जिससे ईरानी समाज पिछले 36 साल से जूझ रहा था.

रुहानी (फ़ाइल फोटो)

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान ने "न पूरब के साथ न पश्चिम के साथ, बस जम्हूरी इस्लाम का साथ" का मूलमंत्र अपनाया. इससे ईरान को एक ख़ास क़िस्म के कट्टरपन की पहचान मिली.

शायद ईरान का तत्कालीन नेतृत्व अपने ही समाज के उस मुहावरे को नज़रअंदाज़ कर रहा था जिसका मानना है कि बहते पानी में अगर दूसरी धाराओं का समावेश और संगम होता है तो वो नदी में तब्दील हो जाती है वरना अकेला बहने पर वो महज़ नाला रह जाता है.

पश्चिम से अलगाव

हसन रूहानी

अमरीका को शैतान-ए बुज़ुर्ग और इसराइल को धरती के मानचित्र से मिटाने के दम्भ ने उसे पश्चिमी समाज से अलग-थलग कर दिया और यह अलगाव तब और भी गहरा गया जब ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज़ किया. इसे अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने संदेह की दृष्टि से देखा.

इन्हीं संदेहास्पद सामरिक गतिविधियों के चलते पश्चिमी देशों और संयुक्त राष्ट्र ने उस पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए.

2011 में अमरीका ने ईरानी बैंकों पर प्रतिबंध लगाकर दबाव इतना अधिक कर दिया गया जिसके तहत ईरानी अर्थव्यवस्था लगभग चरमरा गई.

बाक़ी दुनिया से अलगाव और पश्चिमी एशिया के बदलते सत्ता समीकरणों के कारण इस देश की सरकार ने पश्चिमी देशों के साथ नरम रवैया अपनाया और पिछले 18 महीने से दुनिया के छह शक्तिशाली देशों के साथ वार्ता के लिए मजबूर हुई.

प्रारंभिक समझौता

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जिसके फलस्वरूप दो अप्रैल को अमरीका, रूस, ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन और जर्मनी ने ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने का प्रारंभिक फैसला किया.

शर्त ये है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की कड़ी निगरानी में ही करे और यूरेनियम संवर्धन मात्र 3.67 प्रतिशत तक ही सीमित रखे जो कि परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाने के लिए पर्याप्त है.

विरोध भी

यह प्रारंभिक समझौता जिसका मसौदा 30 जून 2015 तक तैयार किया जाना है निश्चित तौर पर ईरान को राहत देगा, लेकिन नरम रुख वाली समकालीन ईरानी सरकार को देश में मौजूद कट्टरपंथियों के विरोध का सामना भी करना पड़ेगा.

ईरानी समाचार पत्र केहान के मुख्य संपादक हुसैन शरीअत-मदारी ने इस समझौते का विरोध करते हुए बयान दिया है कि इस समझौते के तहत ईरान ने एक सजी घोड़ा-बग्गी को पश्चिमी देशों को दे दिया, जिसके एवज़ में उन्होंने खच्चर की टूटी जीन हमें दी.

रूस के विदेश मंत्री

यह तो साफ़ है कि दुनिया के छह बड़े शक्तिशाली देशों के साथ जितनी मुश्किलें ईरानी वार्ताकारों को हुई होंगी, उससे भी बड़ी लड़ाई अब ईरानी सरकार को मुल्क के भीतर के विरोधी स्वरों के साथ निपटने में होगी.

ईरानी चिंतक डाक्टर अली शरीअती ने शायद ठीक ही कहा है कि बाहर का दुश्मन अगर समुद्र भी हो तो उसे पिया जा सकता है, लेकिन आतंरिक विरोध की बूँद दिल पर गिरती तेज़ाब की तेज़ी लिए होती हैं जिसका सामना करने के लिए अपनों का साथ संगदिल होना पड़ता है.

आम लोगों ने किया स्वागत

ईरान में जश्न

इसके ठीक विपरीत आम ईरानी शहरी ने जिस तरह से समझौते का स्वागत किया है शायद वह इस सरकार की ढाल में तब्दील हो.

लोगों का कहना है कि एक तरफ अकेला ईरान था और दूसरी ओर दुनिया की छह महाशक्तियां. और, हमारे वार्ताकारों का ने फिर भी ईरान के माथे को ऊंचा किया.

ईरान में जश्न

ईरान के प्रसिद्ध सूफी कवि हाफ़िज़ ने तैमूर लंग से एक मुलाक़ात के दौरान कहा था - नरम हृदय का होना इंसानियत है, लेकिन दंभ सच्चे मनुष्य में नहीं पाया जाता.

हाफ़िज़ अब दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनका रूहानी कलाम अब भी हर ईरानी को कंठस्थ है.

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