क्या अमरीकी ज़िद के आगे टूट जाएगा ईरान?

ईरान के महत्वपूर्ण तेल निर्यात पर अमरीकी प्रतिबंध अगले रविवार से लागू हो रहा है.

अमरीका इस साल की शुरुआत में ईरान समेत छह देशों के बीच हुई परमाणु संधि से बाहर निकल आया था.

उसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक संबोधन में कहा था कि दुनिया के सभी देश ईरान से संबंध तोड़ दें.

अब अमरीका ने सभी देशों पर ईरान से संबंध तोड़ने के लिए दबाव तेज कर दिया है.

अमरीका को लगता है कि इस दबाव के कारण ईरान परमाणु संधि पर दोबारा बातचीत के लिए तैयार हो जाएगा.

राष्ट्रपति ट्रंप की यही मांग है क्योंकि 2015 में बराक ओबामा के कार्यकाल में हुए परमाणु संधि समझौते से वो ख़ुश नहीं थे.

भारत और ईरान के संबंध ऐतिहासिक हैं. भारत ईरानी तेल का चीन के बाद सबसे बड़ा ख़रीदार है.

ईरानी तेल भारत की आर्थिक प्रगति के लिए बहुत ज़रूरी है. भारत ने अब तक ऐसे संकेत दिए हैं कि ईरान के साथ इसके रिश्ते बने रहेंगे.

समझौते से क्यों बाहर हुआ अमरीका

भारत ने अमरीका द्वारा ईरान पर लगाई गई पिछली पाबंदियों के बावजूद ईरान से आर्थिक और सियासी रिश्ते नहीं तोड़े थे.

अब देखना ये है कि भारत राष्ट्रपति ट्रंप को कब तक नाराज़ रख सकेगा.

लेकिन यहाँ ये सवाल ज़रूरी है कि राष्ट्रपति ओबामा के दौर में किए गए समझौते से राष्ट्रपति ट्रम्प एकतरफ़ा तौर पर बाहर क्यों हो गए, जबकि ईरान इस समझौते की तमाम शर्तों पर अमल कर रहा था?

इस सवाल का जवाब पिछली शताब्दी में ईरान में हुई दो बड़ी घटनाओं में तलाश किया जा सकता है.

साल 1953 में ईरान के प्रधानमंत्री मुहम्मद मुसद्दीक़ का तख्ता पलटने में मदद के बाद अमरीका ने मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी को सत्ता पर बहाल कर दिया.

बग़ावत में अपनी भूमिका को अमरीका ने 2013 में जाकर स्वीकार किया. ईरान के पहलवी शाही परिवार के दौर में अमरीका के साथ घनिष्ठ संबंध थे.

ईरान में तख़्तापलट में अमरीकी हाथ

उस समय ईरानी तेल का व्यापार अमरीकी और ब्रितानी कंपनियों के हाथ में था जिसे प्रधानमंत्री मुसद्दीक़ ने चुनौती दी थी. शाही परिवार अमरीका के साथ था. इसलिए अमरीका और शाह दोनों आम लोगों में काफ़ी अलोकप्रिय थे.

दूसरी बड़ी घटना थी ईरान में 1979 की इस्लामिक क्रांति.

ये क्रांति जितनी मुहम्मद रज़ा पहलवी के ख़िलाफ़ बग़ावत थी उतनी ही अमरीका के ख़िलाफ़ क्रोध का इज़हार.

इस क्रांति के दौरान ईरानी छात्रों ने 444 दिनों तक 52 अमरीकी राजनयिकों और नागरिकों को तेहरान के अमरीकी दूतावास में बंधक बनाकर रखा था.

अमरीका ने जवाब में ईरान की 12 अरब डॉलर की संपत्ति को ज़ब्त कर लिया था. इस घटना के बाद से ईरान और अमरीका के बीच रिश्ते कभी सामान्य नहीं हो सके हैं.

इस्लामी क्रांति ऐसे समय में हुई जब अमरीका/पश्चिमी देशों और सोवियत यूनियन के बीच दशकों से चले आ रहे शीत युद्ध का अंत क़रीब था.

दुनिया में शांति स्थापित किए जाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी.

जब शुरू हुई ईरानी क्रांति

लेकिन पश्चिमी देशों में खलबली उस समय मची जब इस्लामी क्रांति ने न केवल ईरान में मज़बूती पकड़ी बल्कि क्रांति के रूहानी लीडर अयातुल्ला ख़ुमैनी ने इस क्रांति को दुनिया के दूसरे देशों में निर्यात करने का भी ऐलान किया.

इस्लामी हुक़ूमत के संविधान के आर्टिकल 10 के अनुसार, "दुनिया के सभी मुस्लिम एक राष्ट्र हैं." एक "उम्मा" की धारणा को पुनर्जीवित करने की कोशिश ने मुस्लिम समाज में काफ़ी जोश पैदा किया. देखते ही देखते ईरान की इस्लामी क्रांति का असर 49 मुस्लिम देशों में महसूस किया जाने लगा. सुन्नी देश सऊदी अरब इस शिया इस्लाम से परेशान होकर अमरीका की गोद में जा गिरा.

दस साल बाद इस्लामी क्रांति का असर दुनिया भर में उस समय महसूस किया गया जब इमाम ख़ुमैनी ने "सैटेनिक वर्सेज" नामी उपन्यास के लेखक सलमान रुश्दी पर जान से मारने का फ़तवा जारी किया.

भारत समेत कई देशों ने पुस्तक पर पाबंदी लगा दी. मुस्लिम दुनिया में रुश्दी एक विलेन बन गए.

पश्चिमी देशों के अव्वल नंबर के प्रतिद्वंदी के तौर अब इस्लामी क्रांति ने सोवियत यूनियन की जगह ले ली.

ईरान की इस्लामी सरकार ने इसराइल की मान्यता को ख़ारिज कर दिया और इसे नष्ट करने का इरादा किया. अमरीका इससे काफ़ी असहज हुआ.

अमरीका और पश्चिमी देशों ने 10 साल तक चलने वाले ईरान-इराक युद्ध में खुलकर सद्दाम हुसैन का साथ दिया, हथियार दिए लेकिन ईरान की शिकस्त नहीं हुई.

अमरीका ने इसके बाद ईरान के ख़िलाफ़ हर तरह की पाबंदियां लगाईं.

लेकिन नहीं टूटा ईरान

राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने ईरान को एक 'शैतान' देश कहा. और इसके ख़िलाफ़ हिज़्बुल्लाह, इस्लामिक जिहाद और हमास को फंड करने का आरोप लगाया.

ईरान ने जब परमाणु हथियार बनाने की तैयारी करनी शुरू की पश्चिमी देशों की तरफ़ से ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंध और भी कड़े कर दिए गए.

वर्षों की पाबंदियों ने ईरान को कमज़ोर कर दिया. उसे बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ और अंतर्राष्ट्रीय तौर पर ईरान को अलग-थलग कर दिया गया.

लेकिन ईरान टूटा नहीं. धीरे-धीरे इसकी स्थिति बेहतर हुई. भारत, चीन और रूस ने ईरान की अलहदगी को ख़त्म करने में उसकी मदद की.

राष्ट्रपति बराक ओबामा के दौर में ईरान के परमाणु हथियारों के निर्माण की कोशिश को रोकने के बदले उस पर लगी पाबंदी हटाने का समझौता हुआ.

क्या यमन बन जाएगा ईरान?

लेकिन डोनल्ड ट्रंप जब 2016 चुनकर सत्ता में आए तो उन्होंने कहा कि ये समझौता ग़लत है और वो एक नया समझौता करना चाहते हैं लेकिन ईरान इसके लिए तैयार नहीं है.

अमरीका ने समझौता रद्द करते हुए ईरान पर एक बार फिर प्रतिबंध लगा दिया है.

यूरोपीय संघ, चीन और रूस ने समझौते को रद्द करने से अब तक इनकार किया है लेकिन ईरान में काम करने वाली कई यूरोपीय कंपनियां अपने प्रोजेक्ट्स पूरे किए बिना ही ईरान छोड़कर चली गई हैं. भारत की रिलायंस कंपनी ने भी ईरान से तेल ख़रीदना फिलहाल बंद कर दिया है.

ईरान की कठिनाइयां बढ़ी हैं. आम जनता में बेचैनी है. बेरोज़गारी बढ़ी है. इस्लामी शासन के ख़िलाफ़ माहौल भी बना है. लेकिन इसके कोई संकेत नहीं मिले हैं कि ईरान टूट जाएगा.

ईरान पर गहरी नज़र रखने वाले विशेषज्ञ कहते हैं कि ईरान में इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, यमन, सीरिया और लीबिया जैसे हालात नहीं होंगे.

उनके मुताबिक़ ईरान इस बार भी पाबंदियों से जूझने की शक्ति रखता है.

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