मोदी को नवाज़ के फ़ोन पर ख़फ़ा पाक मीडिया

    • Author, अशोक कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित

पठानकोट हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच विदेश सचिव स्तरीय बातचीत पर मंडरा रहे ख़तरे के बादल पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों में चर्चा का विषय हैं.

‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि भारत ने विदेश सचिव वार्ता के साथ पठानकोट हमले में शामिल लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की शर्त जोड़ते हुए कहा है कि 'गेंद अब पाकिस्तान के पाले में है.'

अख़बार को हैरत है कि जब भी भारत में कोई हमला होता है तो उसका इल्जाम पाकिस्तान पर मढ़ दिया जाता है.

अख़बार की टिप्पणी है कि पठानकोट हमले को लेकर जो भी जानकारी भारत ने पाकिस्तान को दी है वो सिर्फ आरोपों पर आधारित है और आरोपों के आधार पर कार्रवाई मुमकिन नहीं.

अखबार की नज़र में, पठानकोट हमले के ठोस सबूत जमा करने में तो वक्त लगेगा, इसलिए भारत किसी भी मामले की आड़ लेकर बातचीत स्थगित न करे.

‘नवा-ए-वक़्त’ लिखता है कि भारत ने आख़िरकार पठाकनोट हमले का मलबा पाकिस्तान पर गिरा दिया.

अख़बार कहता है कि हमले के दौरान ही भारतीय मीडिया और अधिकारी कहने लगे थे कि हमलावर पाकिस्तान से आए थे, लेकिन भारत ने इस बार किसी ख़ास रणनीति के तहत संयम दिखाया और हमले के लिए तुरंत पाकिस्तान को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया.

अख़बार के मुताबिक ऐसे में भारत से हर क़ीमत पर दोस्ती चाहने वाले लोग मोदी सरकार की तारीफ़ के पुल बांधने लगे.

अख़बार के मुताबिक, यही नहीं प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ तो इतने आशावादी निकले कि उन्होंने अपने श्रीलंका दौरे में कोलंबो से मोदी को फ़ोन कर विश्वास दिलाया कि भारत जो भी जानकारी देगा, पाकिस्तान उसके आधार पर ठोस जांच करेगा और मुल्ज़िमों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई होगी.

नवाज़ शरीफ़ ने हाल में लाहौर में भारतीय पीएम मोदी का ज़ोरदार स्वागत किया था
इमेज कैप्शन, नवाज़ शरीफ़ ने हाल में लाहौर में भारतीय पीएम मोदी का ज़ोरदार स्वागत किया था

वार्ता के लिए पठानकोट हमले के मुल्ज़िमों पर कार्रवाई की शर्त पर अख़बार कहता है कि भारत बातचीत को कामयाब बनाने के लिए संजीदा ही नहीं है.

रोज़नामा ‘पाकिस्तान’ लिखता है कि अगर दोनों देशों के विदेश सचिवों की बातचीत टली तो इसका मतलब यही लगाया जाएगा कि जिन दशहतगर्दों ने पठानकोट एयरबेस पर हमला किया, उनके मक़सद पूरे हो गए और वो ताकतें हार गईं जो दक्षिण एशिया में अमन के लिए बातचीत के रास्ते पर ज़ोर देती रही हैं.

ऐसी ही राय जताते हुए ‘जंग’ कहता है कि शर्तें लगा कर बातचीत स्थगित करना किसी भी देश के हिते में नहीं है और ये सिलसिला अब बंद होना चाहिए, वरना वो ताक़तें जो दोनों देशों में युद्ध जैसे हालात चाहती हैं, वो बातचीत में रोड़े अकटकाने के लिए ऐसी हमले करवाती रहेंगी.

उधर, ‘जसारत’ ने उत्तर कोरिया में हाइड्रोजन बम के परीक्षण पर लिखा कि दुनिया में खलबली मच गई और अमरीका ने कार्रवाई की धमकी दी है.

अख़बार कहता है कि बेशक हाइड्रोजन बम एक ख़तरनाक हथियार है, लेकिन सवाल ये है कि कोई देश इसकी ज़रूरत क्यों महसूस करता है.

अखबार की राय है कि उत्तर कोरिया की एटमी तैयारियों का कारण अमरीका की आक्रामता ही है.

वहीं, ‘दुनिया’ ने सऊदी विदेश मंत्री अदेल अल जुबैर के पाकिस्तान दौरे पर संपादकीय लिखा है.

अख़बार के मुताबिक़ पाकिस्तान ने विश्वास दिलाया है कि अगर सऊदी अरब की संप्रभुता पर कोई खतरा आया तो पाकिस्तान उसके साथ खड़ा होगा.

ईरान और सऊदी अरब के बीच पैदा ताज़ा संकट पर अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान के हालात उसे सऊदी अरब और ईरान में से किसी एक का पक्ष लेने की इजाज़त नहीं देते हैं, क्योंकि इससे पाकिस्तान को घरेलू स्तर पर गंभीर हालात का सामना करना पड़ सकता है.

रूख़ भारत का करें तो ईरान और सऊदी अरब के तनाव पर ‘जदीद ख़बर’ लिखता है कि इस्लामी दुनिया में समस्याएं क्या कम थीं कि अब सऊदी अरब और ईरान के बीच नया तनाव शुरू हो गया.

अख़बार लिखता है कि ताज़ा तनाव ऐसे समय में सामने आया है जब इराक़ और सीरिया के बड़े हिस्से पर इस्लामिक स्टेट का क़ब्ज़ा है, लीबिया और यमन में समानांतर सरकारें चल रही हैं और लेबनान में इस कदर सांप्रदायिक तनाव है कि मामूली चिंगारी भी बड़ी आग में तब्लीद हो जाए.

सऊदी अरब में एक शिया नेता को मौत की सज़ा देने से शुरू हुए विवाद पर अख़बार लिखता है कि ईरान को ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए, अगर ईरान में कोई देश और सरकार के ख़िलाफ़ गतिविधियों में शामिल हो तो उसके साथ क्या सलूक किया जाएगा.

उधर डीडीसीए मामले की जांच के लिए गठित दिल्ली सरकार के आयोग को ग़ैर-क़ानूनी क़रार दिए जाने पर ‘रोज़नामा खबरें’ का संपादकीय है- फिर टकराव.

अख़बार कहता है कि केजरीवाल और उनकी टीम इस मुद्दे को ऐसे ही नहीं छोड़ेंगे, इसलिए केंद्र सरकार से उनका टकराव तय है.

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