नौकरशाही का मोदी मॉडल दिल्ली में नाकाम?

नरेंद्र मोदी
    • Author, राजीव शर्मा
    • पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक
  • प्रकाशित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार नौकरशाहों से स्पष्ट तौर पर कह रखा है कि उन्हें किसी से भी डरने की ज़रूरत नहीं है और अगर उनके वरिष्ठ अधिकारी या संबंधित मंत्री उनकी राह में रोड़ा अटका रहे हों तो वो सीधे उनसे मिल सकते हैं.

ये नीति ख़तरनाक है. प्रोटोकॉल का मुद्दा तो है ही, इससे नौकरशाहों में एक तरह के अंसतोष और भ्रम की स्थिति बन गई है.

मोदी की नौकरशाहों के लिए इस ‘हेल्पलाइन’ ने ख़ास कुछ नहीं बदला है न ही प्रधानमंत्री की ‘हेल्पलाइन’ या ‘हॉटलाइन’ का फ़ायदा उठाने वाले नौकरशाहों की संख्या बहुत अधिक है.

निजी वफ़ादारी

मोदी कैबिनेट

दरअसल, मोदी इन नौकरशाहों से निजी वफ़ादारी चाहते हैं. उनकी ये नीति शायद गुजरात जैसे राज्यों में सफल भी रही है, लेकिन भारत जैसे विशाल देश में ये कामयाब नहीं हो सकती.

यहाँ नौकरशाही का काम करने का अपना अलग अंदाज़ है और वो अपनी रफ़्तार से काम करती है. प्रधानमंत्री मोदी उनसे कुछ ज़्यादा ही उम्मीद कर रहे हैं. ऐसे संकेत हैं कि नौकरशाही इससे चिंतित है और राजनीतिक दांवपेच में नहीं फंसना चाहती.

यानी मोदी का नौकरशाहों के ज़रिए कामकाज में तेज़ी लाने का दांव असर नहीं ला रहा है. नौकरशाह सतर्क हैं और संकेत हैं कि कार्यों की गति धीमी पड़ रही है.

नेताओं पर भारी नौकरशाह?

थिंकस्टॉक इमेज

हालाँकि मोदी ने नौकरशाही को ज़्यादा ताक़तवर बनाने की बात कही है. लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त पर कुछ अधिक नहीं दिखता कि नौकरशाहों ने मोदी की थ्योरी को अपना लिया है.

प्रधानमंत्री कार्यालय के मामले में भी यही स्थिति है.

केंद्रीय सचिवालय ने हाल ही में सुझाव दिया है कि काम न करने वाले नौकरशाहों की सेवा समाप्त कर दी जानी चाहिए.

हालाँकि ये निर्णय लेना प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है, लेकिन ये ज़रूरी नहीं कि पूरी नौकरशाही उनके कहे पर चलने लगे और उनके कहे मुताबिक़ निर्णय ले.

सही मायनों में भारत का नौकरशाह वर्ग आज कुछ डरा हुआ सा है और ये बताता है कि क्यों भारत की ग्रोथ स्टोरी के लिखने के लिए ख़ास कुछ नहीं है.

नौकरशाही पर असर

फ़ाइल फोटो

सवाल ये है कि अगर इन सुझावों को मान लिया जाए तो क्या इनका नौकरशाही पर सकारात्मक असर पड़ेगा?

नौकरशाही को विश्वास में लिए बिना सरकार की नीतियों और योजनाओं को परवान चढ़ाना लगभग नामुमकिन है.

व्यावहारिकता ये है कि नौकरशाह ख़ुद राष्ट्रीय हित के एजेंडे को लें और सरकार की योजनाओं को बिना किसी डर और पक्षपात के लागू करें. लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है.

अलग विचारों की कितनी गुंजाइश

एस जयशंकर
इमेज कैप्शन, जयशंकर को सुजाता सिंह की जगह विदेश सचिव नियुक्त किया गया था

अभी मोदी सरकार नौकरशाहों को प्रोत्साहित करने में इस क़दर व्यस्त है कि कभी-कभी तो वो मंत्रियों की भी परवाह नहीं कर रही है.

प्रधानमंत्री मोदी ने केंद्र में भी गुजरात मॉडल को ही लागू किया है, जहाँ उन्होंने अपने 13 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में अपने मंत्रियों के मुक़ाबले नौकरशाहों पर ज़्यादा यक़ीन किया.

यहाँ उन्होंने नौकरशाहों के प्रति सख़्त रुख़ दिखाया है. इसके दो उदाहरण हैं. सुजाता सिंह को विदेश सचिव पद से चुपचाप हटा दिया गया, जबकि एस जयशंकर को उनके रिटायरमेंट से सात महीने पहले सुजाता सिंह की जगह दे दी गई.

अरविंद मायाराम
इमेज कैप्शन, अरविंद मायाराम का वित्त सचिव पद से तबादला कर दिया गया

इसी तरह अरविंद मायाराम का रातों रात वित्त सचिव पद से तबादला हो गया और कुछ ही हफ्तों के अंतराल में उनके तीन तबादले हुए.

इसमें दो राय नहीं कि मोदी सरकार में विरोधी आवाज़ों की बहुत गुंजाइश नहीं है. शायद यही वजह है कि मोदी सरकार के 15 महीने के कार्यकाल में ही गृह मंत्रालय में तीन गृह सचिव नियुक्त हो चुके हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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