तस्वीरों में: मैसूर दशहरे के लिए आने लगे हाथी

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरू से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

मैसूर का दशहरा सिर्फ़ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर हैं. मैसूर में 600 सालों से ज़्यादा पुरानी परंपरा वाला यह पर्व ऐतिहासिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही यह कला, संस्कृति और आनंद का भी अनोखा सामंजस्य है.

दशहरे पर यहां बड़ा आयोजन होता है और मैसूर के पूर्व राजाओं के महल में होने वाले इस आयोजन में हाथियों का ख़ास महत्व है.

बड़ी संख्या में हाथी मैसूर पहुंच चुके हैं. हालांकि इस बार सरकार ने इस आयोजन को बहुत भव्य नहीं करने का फ़ैसला किया है क्योंकि राज्य के कई इलाकों में सूखा पड़ा है.

मैसूर के दशहरे का इतिहास मैसूर नगर के इतिहास से जुड़ा है, जो मध्य काल के दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य के समय से शुरू होता है. चौदहवीं शताब्दी में स्थापित इस साम्राज्य में नवरात्रि उत्सव मनाया जाता था.

लगभग छह शताब्दी पुराने इस पर्व को वाडियार राजवंश के शासक कृष्णराज वाडियार ने दशहरे का नाम दिया. समय के साथ इस उत्सव की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि साल 2008 में कर्नाटक राज्य की सरकार ने इसे 'राज्योत्सव' (नाद हब्बा) का स्तर दे दिया.

विजयादशमी के पर्व पर मैसूर का राज दरबार आम लोगों के लिए खोल दिया जाता है. भव्य जुलूस निकाला जाता है. यह दिन मैसूरवासियों के लिए बेहद ख़ास होता है. इस अवसर पर यहाँ दस दिनों तक बेहद धूमधाम से उत्सव मनाए जाते हैं.

दसवें और आखिरी दिन मनाए जाने वाले उत्सव को जम्बू सवारी के नाम से जाना जाता है. इस दिन सारी निगाहें 'बलराम' नामक हाथी के सुनहरे हौदे पर टिकी होती हैं. इस हाथी के साथ ग्यारह अन्य गजराज भी रहते हैं, जिनकी विशेष साज-सज्जा की जाती है.

इस मौके पर भव्य जुलूस निकाला जाता है, जिसमें बलराम के सुनहरी हौदे पर सवार हो चामुंडेश्वरी देवी मैसूर नगर भ्रमण के लिए निकलती हैं. वर्ष भर में यह एक ही मौका होता है, जब देवी की प्रतिमा यूँ नगर भ्रमण के लिए निकलती है.

वाडियार राजाओं के पारंपरिक दशहरा उत्सवों से आज के उत्सवों का चेहरा काफ़ी बदल चुका है. यह अब एक अंतर्राष्ट्रीय उत्सव बन गया है. इस उत्सव में शामिल होने के लिए देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों से मैसूर पहुँचने वाले पर्यटक दशहरा की विविधताओं को देखकर हैरान रह जाते हैं.

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