भारतीय गांव जहां से कई पहुंचे पाकिस्तानी जेल

गुजरात का मछुआरा
    • Author, अंकुर जैन
    • पदनाम, दीव से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

भारत और पाकिस्तान का रिश्ता दो प्रतिद्वंद्वी भाइयों की तरह है और इनकी लड़ाई में पिसते हैं गुजरात के मछुआरे. ये घर से तो निकलते हैं समंदर में मछली पकड़ने, लेकिन कई बार पाकिस्तान कोस्ट गार्ड्स की स्पीड बोट्स उन्हें पकड़ लेती हैं.

पिछले महीने नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए नवाज़ शरीफ के भारत दौरे से पहले सद्भावना स्वरूप पाकिस्तान ने 150 भारतीय मछुआरों को जेलों से रिहा किया.

ये मछुआरे पिछले महीने 30 मई को अमृतसर-वेरावल ट्रेन से गुजरात पहुंचे. सभी मछुआरे भारत पाकिस्तान की समुद्री लड़ाई में सबसे विवादित क्षेत्र सर क्रीक से पकड़े जाते हैं.

अब अपनी ज़िंदगी फिर से ढूंढ रहे ये मछुआरे अपनी आपबीती सुनाते वक़्त रोते-रोते चुप हो जाते हैं. कुछ समुद्र में दोबारा न जाने की कसम खा रहे हैं और कुछ जेल में बीते दिन भूलकर फिर किस्मत आज़माने की तैयारी कर रहे हैं.

'लौटे हैं ज़िंदा लाश बनकर'

मछुआरों में से अधिकतर गुजरात में वेरावल और पोरबंदर के आसपास के गांवों से और केंद्रशासित प्रदेश दीव के निवासी हैं. इन गांवों में कई ऐसी बस्तियां हैं, जहां रहने वाला हर मछुआरा एक बार पाकिस्तान जेल रहकर आ चुका है. कई ऐसे घर हैं जहां पिता उनके बेटे और जमाई सभी जेल में साथ रह चुके हैं.

पाकिस्तान की गिरफ़्त में आने वाली सभी भारतीय नावें गुजरात के पोरबंदर और ओखाबंदर से आई होती हैं. दीव के छगन राजा कहते हैं कि उन्हें भी ओखा पोर्ट से निकले तीन दिन हुए थे, जब रात को उन्हें पाकिस्तान के कोस्ट गार्ड्स ने पकड़ा. पाकिस्तान जेल में 18 महीने काटने बाद घर पहुंचे छगन अब भी डरे हुए हैं.

<link type="page"><caption> मछुआरों की रिहाई के साथ बेहतर रिश्तों के संकेत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/05/140525_pakistan_sri_lanka_nawaz_sharif_sp.shtml" platform="highweb"/></link>

मछुआरा छगन और उसका परिवार

उनकी पत्नी ललित कहती हैं, "ट्रेन में जब मैंने इन्हें देखा, तो यह बेहोशी की हालत में थे और उन्हें देखकर मैं बेहोश हो गई. इनसे कुछ पूछो, तो रोने लगते हैं. ये अब एक ज़िंदा लाश जैसे हैं. डॉक्टर कहते हैं इनकी यह हालत जेल में रहकर हुई है और थोड़े दिन में ठीक हो जाएंगे."

छगन को जेल में बीते दिनों की बात पूछो, तो वह रोते-रोते कहते हैं, "हमसे रोज़ चार घंटे खेती कराई जाती थी और खाने में एक कटोरी दाल और दो रोटी मिलती थीं रोज़ सुबह-शाम. कितनी बार तो वह भी नहीं देते थे."

छगन कहते हैं कि उनके कप्तान ने नाव पर सवार सभी मछुआरों के साथ धोखा किया और मछली पकड़ने समंदर में बहुत अंदर ले गया. छगन को पाकिस्तान में हैदराबाद स्थित नारा जेल में 18 मछुआरों के साथ रखा गया था. 40 साल से मछली पकड़ने का काम कर रहे छगन पहली बार पकड़े गए, लेकिन कई ऐसे हैं जो दो, तीन या चार बार भी पकड़े जा चुके हैं.

'डर लगता है'

छगन ख़ुशनसीब हैं, जो ज़िंदा भारत लौट आए हैं. पाकिस्तान की गिरफ़्त में आए सभी भारतीयों की किस्मत उतनी अच्छी नहीं थी. पिछले एक साल में भारतीय मछुआरे किशोरी भगवन और भीखा शियल की जेल में ही मौत हो गई थी.

गुजरात का मछुआरा वसंत धानजी

शियल के जीजाजी भीखाभाई बमनिया भी उस वक़्त उनके साथ जेल में थे. भीखा भाई पिछले दो साल में दो बार पाकिस्तान कोस्ट गार्ड द्वारा पकड़े जा चुके हैं. वेरावल के पास डंडी गांव के निवासी भीखाभाई के साथ उनके भाई भी जेल में क़ैद थे.

उन्होंने कहा, "लोग अक्सर हमसे पूछते हैं- समंदर में ख़तरा होता है या नहीं. मैं कहता हूं कि समुद्र में जाने से मुझे कोई डर नहीं लगता, पर पाकिस्तानी जेल से लगता है. जेल में मैंने मेरे घर वालों को मरते देखा है. वहां मौत रोज़ तुमसे मिलती है और इंसान बिलख-बिलखकर मरता है."

<link type="page"><caption> अब समुद्र से मछली पकड़ने की हिम्मत नहीं..</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2012/01/120107_fishermanpak_sa.shtml" platform="highweb"/></link>

पर भीखा भाई कहते हैं कि उनके पास इस काम के आलावा कुछ और करने को नहीं है. वह वापस समंदर में जाएंगे.

भीखा कहते हैं, "मैं पिछले दो साल में दो बार पकड़ा जा चुका हूं और जेल में नौ महीने बिताकर निकला हूं. सरकार हमारे पकड़े जाने पर 4,500 रुपए का मुआवज़ा परिवार को देती है, लेकिन घर चलाने के लिए फिर भी उधार लेना पड़ता है. बाहर निकलकर उधार चुकाने के लिए मुझे मछली पकड़ने फिर समंदर में अंदर तक जाना होगा."

'झूठी बातें लिख हम खुश करते थे'

शैलेश और हंसाबेन

दीव के 24 साल के वसंत दामजी अब तक तीन बार पाकिस्तान कोस्ट गॉर्ड्स द्वारा पकड़े जा चुके हैं. 2002 में जब वह सबसे पहले पकड़े गए, तो उनकी उम्र सिर्फ़ 12 साल थी, उसके बाद वह 2005 और 2013 में पकड़े गए.

वसंत धानजी कहते हैं, "जेल में हर क़ैदी से कुछ न कुछ काम कराया जाता था, जिसके बदले उन्हें रोज़ाना कुछ रुपए मिलते थे. सभी लोग उन रुपयों से बीड़ी या सिगरेट लेते, लेकिन मैं उन्हें पत्र भेजने पर खर्च करता था. पत्र में झूठ ही लिखता कि जेल में सब बढ़िया है और मुझे कोई तकलीफ़ नहीं.''

वह कहते हैं, ''इसके जवाब में परिवार वाले भी लिखते कि सब ठीक है और उन्हें कोई परेशानी नहीं है. पत्र और उसके जवाब दोनों झूठे थे, ये सब जानते थे, लेकिन एक दूसरे की चिंता ज़्यादा न बढ़े इसलिए हम अपनी परेशानियां छिपा लेते थे, नहीं तो परिवार का इकलौता कमाने वाला जेल में हो, तो घर वाले कैसे खुश रह सकते हैं."

अब वसंत मछली पकड़ने का काम छोड़ खेती-बाड़ी करना चाहते हैं.

वह कहते हैं, "अब मैं समुद्र में वापस नहीं जाऊंगा. खेती करूंगा या कुछ और पर सागर की ओर नहीं देखूंगा.

क़ैद में मछुआरे

नेशनल फिश फ़ोरम के सदस्य वेरावल के शैलेश सुयानी के मुताबिक़, गुजरात के दरिया कांठे पर बढ़ते प्रदूषण के कारण मछलियां कम हो गई हैं. गुजरात में पिछले दो दशकों में कई फ़ैक्ट्री और थर्मल पॉवर प्लांट दरिया के पास लगे हैं.

बंदरगाह पर मौजूद नाव

शैलेश के मुताबिक़, गुजरात के 150 से अधिक मछुआरे और क़रीब 500 नाव अभी भी पाकिस्तान के पास हैं. शैलेश कहते हैं कि गुजरात में मत्स्य उद्योग में लोगों की बढ़ती संख्या भी चिंता का विषय है.

वह कहते हैं, "ज़मीन बेचकर अब लोग मत्स्य उद्योग में आ रहे हैं. वेरावल बंदरगाह पर नावों की तादाद में 10 साल में 300 प्रतिशत का उछाल आया है. बंदरगाह पर 2000 से 3000 नाव की जगह है, पर अभी 7000 के क़रीब छोटी-बड़ी नावें हैं. यही हाल गुजरात के दूसरे बंदरगाहों का है. अब मछलियां घट रही हैं, तो आने वाले दिनों में स्थिति और ख़राब हो सकती है."

वहीं बंदरगाह पर बार चलाने वाले दीव फ़िशरमैन एसोसिएशन के सेक्रेटरी जीवन बाबरिया कहते हैं, "दीव से हर साल क़रीब 150 मछुआरे पाकिस्तान में पकड़े जाते हैं. ये लोग अक्सर लालच में आकर सर क्रीक क्षेत्र की ओर चले जाते हैं, क्योंकि वहां मछलियां ज़्यादा हैं. पर मछुआरों का पकड़ा जाना देश के लिए बड़ा ख़तरा है क्योंकि उनके साथ पाकिस्तान उनकी नावें भी क़ब्ज़े में ले लेता है. जैसे मुंबई हमले के वक़्त दहशतगर्द पोरबंदर की एक नाव में सवार होकर आए, वैसे ही वे इन नावों में वापस आ सकते हैं."

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