पटरी पर लौटती बिहार के स्कूलों में ज़िंदगी

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, चिरौरा गाँव (बिहार) से
बिहार की राजधानी पटना से ज़्यादा दूर नहीं है चिरौरा गाँव.
हाइवे से नीचे उतरते ही संकरी सी एक सड़क पर करीब दो किलोमीटर भीतर जाने पर पहली इमारत प्राथमिक स्कूल की ही आती है.
दोपहर लगभग साढ़े ग्यारह का समय है और स्कूल में ज़बरदस्त हलचल है.
चार से लेकर नौ तक की उम्र के लगभग 70 बच्चे तीन कक्षाओं में अपने पाठ पढ़ रहे हैं.
चबूतरे के बाहर मिट्टी से पुते चूल्हों पर चंद महिलाएं ताज़े लेप लगा रहीं हैं.
इसके बाद लकड़ी से आग दी जाएगी और चूल्हों को फूँक कर अरहर दाल की खिचड़ी और चोखा बनेगा.
एक ही हफ़्ता बीता है छपरा के गंडामन गांव की उस घटना को, जिसमें स्कूल में परोसे गए 'विषाक्त' भोजन खाने से 23 बच्चों की मौतहो गई और कई बच्चों का इलाज जारी है.
सवाल उठे हैं स्कूलों में मिड-डे मील योजना के तहत मुफ़्त प्रदान कराए जाने वाले भोजन पर. इस भोजन की स्वच्छता पर, इसमें बरती गई लापरवाही पर और किसी की जवाबदेही नहीं होने पर.
बदनामी

चिरौरा के इस प्राथमिक स्कूल की प्रधान शिक्षिका शीला कुमारी इस बात से आहत हैं कि छपरा की घटना के बाद से सभी को एक तराजू में तौला जा रहा है.
शीला कुमारी ने कहा, "अगर एक घटना हो गई तो इसका ये मतलब नहीं कि हम सभी अपने काम में लापरवाह हैं. हम इस बात का ध्यान रखते हैं कि स्कूल के बच्चों को साफ़-सफ़ाई से भोजन कराया जाए, उन्हें ऐसा वातावरण दिया जाए जिसमे उनका मानसिक और शारीरिक विकास भी हो".
हालांकि इस स्कूल में ज़िंदगी वैसे ही चल रही है जैसे छपरा में हुई घटना के पहले रही होगी.
रोज़ स्कूल बंद होने के बाद यहाँ मवेशी मंडराने लगते हैं और मिट्टी के चूल्हों को रौंद देते हैं.
शिक्षिका रूबी कुमारी ने बताया, "हमारी भी मजबूरी है कि रोज़ इन चूल्हों की मरम्मत करानी पड़ती है. बच्चों का खाना बनाने वाली महिलाओं को भी संभालना पड़ता है. राशन तो हमारे पास सरकारी दफ्तरों से ही आता है. लेकिन छपरा की घटना के बाद मानसिक दबाव भी है."
सबक कितने?

मैंने लगभग चार घंटे इस स्कूल में बिताए. ज़माने बाद गर्म गीली खिचड़ी और चोखे को भी चखा. लेकिन बड़ी हिम्मत के बाद.
क्योंकि अभी भी यहाँ बर्तन मिटटी से ही धुलते हैं और खुले पकाए जाने वाले भोजन में लकड़ी के बुरादे भी यदा-कदा मिल ही जाते हैं.
एक बच्चे से पूछा भोजन कैसा लगता है तो जवाब मिला, "घरे से अच्छा".
लगा जैसे सभी जवाब मिल गए . भारत के गांवों में गरीबी ढूंढने की आज भी ज़रुरत नहीं. खुद ही दिख जाती है.
किसानों और कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए उनके बच्चों को सरकार की तरफ़ से मुफ्त मिलने वाला भोजन भी इस स्कीम की कामयाबी का बड़ा हिस्सा रही है.
लेकिन ज़रुरत इस बात की है कि अब सरकार ये समझे की छपरा जैसी घटनाओं में जवाबदेही किसकी रहेगी.
कुछ ऐसा ही संदेश हर उस व्यक्ति के पास भी पहुंचना आवश्यक है जिसका नाता इस स्कीम से किसी भी तरह जुड़ा हुआ है.
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