अमेरिकी हमले में तीन भारतीयों के मारे जाने के असर पर विदेशी मीडिया में छिड़ी ऐसी बहस

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अमेरिकी हमले में मारे गए तीन भारतीय नाविकों को लेकर भारत में तीखी बहस हो रही है और लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या यही अमेरिका भारत का रणनीतिक साझेदार है?
मोदी सरकार के लिए इस मामले में विपक्ष और आलोचकों को संतुष्ट करना आसान नहीं है. दूसरी तरफ़ अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी अमेरिका से भारत के रिश्तों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं.
अमेरिकी प्रसारक सीएनएन ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''एक कारोबारी तेल टैंकर पर अमेरिकी हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत ने भारत में व्यापक जनाक्रोश पैदा कर दिया है."
रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका और भारत के बीच पहले से मौजूद तनावपूर्ण संबंधों में इससे एक नया विवाद जुड़ गया है.
सीएनएन- रणनीतिक साझेदारी पर असर पड़ सकता है

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सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, "बुधवार तड़के एमटी सेटेबेलो ओमान सागर से गुज़र रहा था. यह जहाज़ ईरानी तेल लेकर जा रहा था, तभी एक अमेरिकी विमान ने इसके इंजन पर हमला किया. इससे जहाज़ में आग लग गई, आसमान में धुएं का बड़ा गुबार उठने लगा और एक बड़े बचाव अभियान की शुरुआत करनी पड़ी."
"पलाऊ के झंडे वाले इस जहाज़ पर हुए हमले के बाद मृत पाए गए तीन लोग ऐसे पहले नाविक हैं, जिनकी मौत की पुष्टि अमेरिका की ओर से ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी लागू करने के अभियान के दौरान किए गए किसी हमले में हुई है.''
सीएनएन ने लिखा है, ''यह भारत की जंग नहीं है लेकिन भारतीय मारे गए. अमेरिकी सेना का कहना है कि यह हमला इसलिए किया गया क्योंकि चालक दल ने नाकेबंदी लागू कर रहे अमेरिकी बलों के निर्देशों का पालन नहीं किया."
"प्रधानमंत्री मोदी ने अब तक इन मौतों पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन कुछ श्रमिक संगठनों की ओर से उन पर हमले की स्पष्ट निंदा करने का दबाव बढ़ रहा है."
"सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (सीटू) ने शुक्रवार को जारी एक बयान में कहा- जब कोई विदेशी सेना अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में भारतीय कामगारों को मार देती है, तो भारत सरकार को ज़ोरदार और स्पष्ट आवाज़ में बोलना चाहिए."

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सीएनएन से अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर कांति वाजपेयी ने कहा कि यह मुद्दा "अमेरिका के साथ पहले से डगमगाते संबंधों में एक नई परेशानी का कारण बन चुका है. वॉशिंगटन और इस्लामाबाद के बीच तेज़ी से बढ़ते संबंध भी इस तनाव का एक कारण हैं."
"पाकिस्तान भारत का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी माना जाता है. ट्रंप कई बार पाकिस्तान के सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा कर चुके हैं. मुनीर हाल के महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में उभरे हैं."
भारत के सेंटर फ़ॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस में विजिटिंग सीनियर फ़ेलो वाजपेयी ने कहा कि अगर भारतीय नागरिकों के हताहत होने की और घटनाएं होती हैं और देश के भीतर नाराज़गी बढ़ती है, तो मोदी सरकार के लिए इस मुद्दे को नियंत्रित करना और कठिन हो सकता है.
सीएनएन ने लिखा है, ''पिछले एक साल में भारत और अमेरिका के बीच कभी बेहद मज़बूत माने जाने वाले संबंधों में गिरावट आई है. क्वाड के सदस्य होने के बावजूद, राजनीतिक और आर्थिक तनावों ने दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी पर असर डालना शुरू कर दिया है."
"तनाव तब और बढ़ गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले मई में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संक्षिप्त लेकिन घातक संघर्ष के दौरान मध्यस्थता करने का सार्वजनिक दावा किया. नई दिल्ली ने इस दावे को ख़ारिज कर दिया. इससे कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के विवाद में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका के प्रति भारत की संवेदनशीलता फिर से उभरकर सामने आई.
न्यूयॉर्क टाइम्स- भारत अमेरिका को नाराज़ करने से बच रहा है

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अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक मर्चेंट शिपिंग उद्योग के वर्क फ़ोर्स का 12 प्रतिशत यानी लगभग तीन लाख लोग भारत से हैं. इसका मतलब है कि अनेक कारोबारी जहाज़ों के चालक दल में भारतीयों का शामिल होना स्वाभाविक है."
"फ़ॉरवर्ड सीमेंस यूनियन ऑफ़ इंडिया के महासचिव मनोज यादव, जो बचाए गए कुछ चालक दल के सदस्यों के नियमित संपर्क में रहे हैं, ने कहा- वे साधारण लोग हैं, युद्ध के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं. उन्होंने कहा कि यह दुखद है कि वे ऐसी स्थिति में फँस गए हैं, जिसे उन्होंने ख़ुद पैदा नहीं किया. उन्होंने कहा- भारत को अब कड़े सवाल पूछने चाहिए."
न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है, ''भारत के लिए दांव केवल कूटनीतिक विवाद तक सीमित नहीं हो सकते. इससे दोनों देशों के संबंध और अधिक ख़राब होने का ख़तरा है, जबकि हाल के समय में उन्हें सुधारने की कोशिशें की गई थीं."
"भारत, राष्ट्रपति ट्रंप को नाराज़ करने से बचने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि वह एक अंतिम व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहा है और अपनी विशाल घरेलू ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की जल्दबाज़ी में है. अब वह ईरानी तेल के आयात और होर्मुज़ के ज़रिए होने वाली आपूर्ति पर पहले की तरह निर्भर नहीं रह सकता.''
न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है, ''भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि ईरान युद्ध भारत के लिए गंभीर जोख़िम पैदा करता है और उन्होंने भारतीयों से ईंधन की खपत कम करने की अपील की है. भारत ने यूएई, सऊदी अरब और अमेरिका जैसे देशों से तेल खरीद बढ़ा दी है. वेनेज़ुएला भी अब एक उभरता हुआ आपूर्तिकर्ता बनकर सामने आ रहा है.''
क्या यह हमला अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन है?

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क़तर के न्यूज़ ब्रॉडकास्टर अल-जज़ीरा ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''होर्मुज़ स्ट्रेट ओमान और ईरान के जलक्षेत्र से होकर गुजरता है, जबकि इसके बाहरी हिस्से यूएई के जलक्षेत्र तक फैले हुए हैं. इसलिए यह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में नहीं आता. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुद्री क़ानून किसी भी ऐसे प्राकृतिक स्ट्रेट पर लागू होता है, जिसका उपयोग अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए किया जाता है.
संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून कन्वेंशन के अनुच्छेद 38 के अनुसार, सभी जहाज़ों और विमानों को ट्रांजिट पैसेज का अधिकार हासिल है, जिसे कोई भी देश निलंबित नहीं कर सकता.
कन्वेंशन के अनुच्छेद 17 के अनुसार, सभी विदेशी जहाज़ों को किसी भी देश के जलक्षेत्र में आवाजाही का अधिकार प्राप्त है. अनुच्छेद 19 के अनुसार, किसी जहाज़ का मार्ग तब तक स्वतंत्र माना जाएगा जब तक वह तटीय देश की शांति, व्यवस्था या सुरक्षा के लिए ख़तरा न हो.
इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के तहत जानबूझकर ग़ैर-युद्धरत जहाज़ों को निशाना बनाना अवैध है.
मर्चेंट नेवी में दशकों तक सेवा दे चुके एक भारतीय कप्तान, जिन्होंने अब भी सेवा में होने और मीडिया से बात करने की अनुमति न होने के कारण अपनी पहचान गुप्त रखने का अनुरोध किया, उन्होंने अल जज़ीरा से कहा, "ऐसे ग़ैर-युद्धरत जहाज़ों पर बमबारी करना सही नहीं है, जिनके चालक दल के सदस्य न तो हथियारबंद हैं और न ही तटीय देश की सुरक्षा के लिए कोई ख़तरा पैदा करते हैं."
उन्होंने कहा, "अमेरिकी नाकेबंदी ख़ुद युद्धकालीन क़ानूनों के तहत वैध हो सकती है, लेकिन यह निश्चित रूप से तर्क दिया जा सकता है कि किसी टैंकर पर गोलीबारी करना और चालक दल के लोगों को मार देना, उस सीमा से कहीं आगे है, जिसे ज़रूरत से अधिक बल प्रयोग माना जा सकता है."
अमेरिका-भारत संबंधों का सबसे कठिन दौर

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हॉन्ग कॉन्ग की न्यूज़ वेबसाइट साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''रिपब्लिकन सांसद रॉब विटमैन ने गुरुवार को इन मौतों को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना बताया और कहा कि अमेरिकी सेना यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि वास्तव में क्या हुआ था. विटमैन ने एससीएमपी से कहा, "हमारी संवेदनाएं और प्रार्थनाएं उन भारतीय परिवारों के साथ हैं, जिन्होंने इस घटना में अपने प्रियजनों को खोया है."
उन्होंने कहा, "मुझे पता है कि हमारी अमेरिकी सेना इस मामले की जांच कर रही है ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि वास्तव में वहाँ क्या हुआ था. लेकिन यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है और ऐसी घटनाओं से हम हर हाल में बचना चाहते हैं."
अमेरिकी विदेश विभाग के एक प्रवक्ता ने गुरुवार को एससीएमपी को दिए जवाब में कहा कि वॉशिंगटन इस मुद्दे पर भारत सरकार के साथ सीधे संपर्क में है.
राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में दक्षिण और मध्य एशिया मामलों की पूर्व वरिष्ठ निदेशक लिसा कर्टिस ने कहा कि यह घटना दोनों देशों के संबंधों में एक कठिन दौर का संकेत है और ट्रंप प्रशासन को इससे बेहद सावधानी से निपटना चाहिए.
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि अमेरिका को इस तरह प्रतिक्रिया देनी होगी, जिससे यह स्पष्ट हो कि उसे इस ग़लती पर वास्तव में खेद है."
एससीएमपी ने लिखा है, ''यह तनाव ऐसे समय बढ़ा है, जब कुछ ही दिन पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत दौरे पर आए थे. उनका मक़सद पिछले एक वर्ष में अमेरिकी टैरिफ, वीज़ा प्रतिबंधों और ट्रंप के मागा समर्थक आधार से आने वाली भारत-विरोधी टिप्पणियों के साथ नस्लवादी बयानबाज़ी के कारण पैदा हुए तनाव को कम करना था.''
वर्जीनिया से रिपब्लिकन सांसद विटमैन ने कहा कि भारत के साथ जारी तनाव का अमेरिकी इंडो-पैसिफ़िक रणनीति पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ता है.
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि "अमेरिका और भारत के साझा हित बहुत ज़्यादा हैं और ये चीन के साथ भारत के साझा हितों से कहीं अधिक हैं."
उन्होंने कहा, "मेरा मानना है और कई अन्य लोग भी ऐसा मानते हैं कि हमें इस संबंध को लगातार और मज़बूत बनाना चाहिए."
हालांकि, सेंटर फ़ॉर अ न्यू अमेरिकन सिक्यॉरिटी में इंडो-पैसिफ़िक सुरक्षा कार्यक्रम की निदेशक भी रहीं लिसा कर्टिस ने इसे 'पिछले 25 वर्षों में अमेरिका-भारत संबंधों के सबसे कठिन वर्षों में से एक' बताया.
उन्होंने कहा, "इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले एक वर्ष के तनावों का असर अमेरिकी इंडो-पैसिफ़िक रणनीति में भारत की भूमिका पर पड़ रहा है. दोनों देशों के बीच विश्वास में व्यापक कमी आई है, और जब इस तरह विश्वास टूटता है तो उसका असर सुरक्षा और रक्षा साझेदारी की पूरी संरचना पर पड़ता है."
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