नीतीश कुमार का राज्यसभा जाने का फ़ैसला क्या जनता दल यूनाइटेड के लिए झटका है?

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
बिहार लोक भवन में सम्राट चौधरी का शपथ ग्रहण चल रहा था.
नीचे दर्शकों की पहली कतार में सफ़ेद कुर्ता पायजामा में पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे. बेहद शांत और मुस्कुराते हुए शपथ ग्रहण समारोह देख रहे थे.
नवंबर 2005 के बाद राज्य में ये दूसरा मौका है जब नीतीश कुमार के अलावा मुख्यमंत्री पद की कोई दूसरा व्यक्ति शपथ ले रहा हो. इससे पहले 20 मई 2014 को जीतन राम मांझी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी.
दो दशक से बिहार की सत्ता की धुरी रहे नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर राज्यसभा के सदस्य बन गए हैं. उनके इस 'राजनीतिक पलायन' ने सबसे बड़ा सवाल जेडीयू पार्टी के भविष्य पर खड़ा कर दिया है.
ये सवाल और भी गहरा गया है क्योंकि नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने फ़िलहाल डिप्टी सीएम बनने से इनकार कर दिया.
जेडीयू में उनको लेकर बनी टीम निशांत के एक सदस्य ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहा, " निशांत जी अभी और घूमना चाहते हैं. वो कार्यकर्ताओं से मिलेंगें, उसके बाद ही किसी तरह का फ़ैसला लेंगें."
बीजेपी में जश्न और जनता दल यूनाइटेड में सन्नाटा

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लोक भवन में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होकर निकली पूर्व खेल मंत्री श्रेयसी सिंह ने एक सवाल के जवाब में मुझे टोका और कहा, " ये एनडीए की सरकार है, सिर्फ़ बीजेपी की सरकार नहीं है."
सांसद संजय जायसवाल ने भी बीबीसी न्यूज़ हिंदी से 14 अप्रैल को कहा था, " पहले भी एनडीए की सरकार थी, अभी भी एनडीए की सरकार है."
लेकिन इस नई सरकार बनने की खुशी और गम किसे है, ये पटना के वीरचंद पटेल पथ पर आकर साफ़ हो जाता है.
इनकम टैक्स गोलंबर से सटी इस सड़क पर बीजेपी, जेडीयू और राजद का दफ़्तर है.

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सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बीजेपी दफ़्तर में जश्न, उत्साह और समर्थकों के साथ साथ मीडिया वालों की भीड़ रूकने का नाम नहीं ले रही है.
इस रास्ते से गुजरने वालों को जगह-जगह बैरिकैडिंग से गुजरना पड़ रहा है. बीजेपी दफ़्तर में थोड़ी-थोड़ी देर पर गार्ड्स और लोगों की नोकझोंक हो जाती है.
बीजेपी दफ्तर से कुछ दूरी पर ही जेडीयू दफ़्तर है जहां सन्नाटा पसरा है.
वहां कुछ लोग मौजूद हैं जिनके चेहरे भावशून्य हैं. दफ़्तर के बाहर नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को सीएम बनाने की मांग को लेकर लगे पोस्टर भी अब बासी लगने लगे हैं.
जेडीयू समर्थक दुर्गेश कुमार बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, '' ये कार्यकर्ताओं को अधर में लटका देना जैसा है, कार्यकर्ता पार्टी में अपना भविष्य देखते हैं और एक दिन आप ये घोषणा कर दीजिएगा कि आप सब कुछ छोड़ रहे हैं. क्या नीतीश जी सिर्फ़ अपने लिए राजनीति कर रहे थे या उनका समर्पण और कमिटमेंट एक विचारधारा के प्रति था? "
वहीं जेडीयू कार्यकर्ता अफ़जल अंसारी कहते हैं, '' निशांत उम्मीद लगते थे लेकिन वो भी सरकार में कोई ज़िम्मेदारी नहीं लिए.''
नीतीश और नेतृत्व का संकट

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दरअसल जेडीयू में निराशा सिर्फ़ नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने को लेकर ही नहीं है. बल्कि संकट पार्टी में नेतृत्व का भी है.
साल 2003 में अस्तित्व में आई जेडीयू ने नीतीश कुमार के नेतृत्व में झारखंड, अरुणाचल और मणिपुर में विस्तार किया.
समाजवाद को मूलमंत्र मानने वाली पार्टी में नीतीश कुमार ही केंद्रीय किरदार रहे.
हालांकि समय समय पर आरसीपी सिंह, प्रशांत किशोर, ललन सिंह, उपेन्द्र कुशवाहा, मनीष वर्मा को जेडीयू का नेतृत्व करने वाले के तौर पर देखा गया. लेकिन इनमें से कोई भी नेता सफल नहीं हुआ.
1994 में हुई कुर्मी चेतना रैली बिहार के राजनीतिक इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी. इस रैली ने नीतीश कुमार को बिहार की राजनीति में स्थापित किया.
इस रैली में कुर्मी चेतना रथ भी निकला था. राजीव पटेल इस रथ के नेता के तौर पर पूरे बिहार में घूमे थे. वो वैचारिक तौर पर समाजवादी और नीतीश कुमार के प्रशंसक हैं.
इस सवाल पर वो कहते हैं, " नेता का उभार दो तरीके से होता है. अपनी काबिलियत से जैसे नीतीश जी का हुआ या फ़िर कोई नेता को लॉन्च कर दे जैसा तेजस्वी जी को किया गया. नीतीश जी समाजवाद के पक्के सिपाही हैं, उन्होनें किसी को लॉन्च नहीं किया.''
वो कहते हैं, ''जेडीयू में ये संकट है बल्कि समाजवादी की राजनीति में ही देखें तो इससे जुड़ी पार्टियां समाजवाद की विचारधारा पर होते हुए भी व्यक्ति विशेष की पार्टी हो जाती है. जेडीयू पार्टी का भी ग्राफ़ गिरेगा. लेकिन ये अचानक से नहीं होगा बल्कि धीरे-धीरे होगा. आख़िर साल 2000 में लालू जी के समय राजद जिस बुलंदी पर थी, वैसी आज नहीं है. ऐसा ही जेडीयू के साथ होगा."
'नीतीश हैं तो क्या गम है?'

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हालांकि पार्टी प्रवक्ता, जेडीयू के भविष्य को लेकर लग रही अटकलों को नकारते हैं.
पार्टी प्रवक्ता अंजुम आरा कहती हैं, "जिस पार्टी में सांगठनिक स्तर पर नीतीश जी का नेतृत्व हो, वहां क्या गम होगा? राज्य में सरकार भी नीतीश जी के बनाए कार्यक्रमों पर ही चलेगी. ये ठीक है कि पॉवर ट्रांसफ़र हुआ है, लेकिन इसका लाभ पार्टी संगठन को मिलेगा. निशांत जी भी बिहार की यात्रा करके संगठन को मजबूत करेंगें."
अंजुम जो बात कह रही हैं, उसको अगर अतीत के आईने में देखें तो ये बात फिट नहीं बैठती.
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू की करारी हार की जिम्मेदारी लेते हुए नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था.
नियमानुसार मुख्यमंत्री ने 1, अणे मार्ग (मुख्यमंत्री आवास) छोड़ा था और 7, सर्कुलर रोड को अपना नया ठिकाना बनाया था.
उस वक़्त नीतीश की अहमियत घटने लगी थी, जिससे परेशान होकर नीतीश ने नौ माह के भीतर ही फिर से मुख्यमंत्री बनने का फ़ैसला लिया था. इस बार भी सत्ता में 'नंबर टू' होने के बाद जेडीयू में भगदड़ की आशंका है.
जेडीयू के एक नेता नाम ना छापने की शर्त पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, "कुछ दिनों या महीनों बाद भगदड़ मचेगी. इस भगदड़ में जो कॉन्ट्रैक्टर है जिनको जेडीयू में बने रहने से सरकारी फ़ायदा मिल रहा था वो बीजेपी की तरफ़ शिफ़्ट होंगें, लेकिन जो विशुद्ध और सेक्यूलर पॉलिटिकल वर्कर हैं, उनके लिए जेडीयू के सिवा और कौन सी पार्टी है?"
'न लालू के साथ जातिवादी हुए और न बीजेपी के साथ सांप्रदायिक'

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बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी कहते थे कि बिहार में तीन पार्टियां हैं-राजद, बीजेपी और जेडीयू. इसमें से दो पार्टियां मिल जाए तो सरकार बन जाती है.
ये बात नीतीश राज के 21 साल में बखूबी झलकती है. नीतीश पाला बदलते रहे और राजद – बीजेपी दोनों के साथ सरकार बनाई.
राजीव पटेल कहते हैं, " नीतीश की ये खूबी रही कि वो लालू जी के साथ गए तो कास्टिस्ट नहीं हुए और बीजेपी के साथ गए तो सांप्रदायिक नहीं हुए."

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वरिष्ठ पत्रकार अरुण अशेष जेडीयू को मध्यमार्गी पार्टी कहते हैं.
वो कहते हैं, " लेफ्ट, राइट और सोशलिस्ट हैं पॉलिटिक्स में. इन सोशलिस्ट को मध्यमार्गी भी कह सकते हैं और ये अपनी सुविधा और राजनीति के मुताबिक लेफ्ट-राइट की तरफ़ जाते हैं. जहां तक जेडीयू के भविष्य की बात है तो एक शून्य पैदा हुआ है, लेकिन वो शून्य पार्टी के विलीन होने का संकेत नहीं कहा जा सकता.''
वो कहते हैं, ''बिहार में कई ऐसी पार्टियां हैं जैसे लोजपा(आर), रालोमो, हम, कांग्रेस उनके फोर्सेज़ शिफ़्ट होंगें या जेडीयू की मदद करेंगें ताकि ये पार्टी बनी रहे. ये दीगर बात है कि क्षेत्रीय दलों में जब दूसरी पीढ़ी आती है तो उस क्षेत्रीय दल की ताकत में भी कमी आती है. शिबू सोरेन, लालू प्रसाद ये उसके उदाहरण हैं."
समाजविज्ञानी पुष्पेन्द्र कहते हैं, " जेडीयू 85 विधायकों वाली पार्टी है. बीजेपी अभी भी अपने बूते सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है. समाजवाद जिसकी वैचारिक जमीन पर जेडीयू खड़ी है, उसका अभी कोई नेता बिहार में नहीं दिखता. लेकिन आने वाले दिनों में कोई न कोई नाम उभरेगा."
क्या निशांत कुछ करिश्मा कर पाएंगे?

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8 मार्च को नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने जेडीयू जॉइन किया था. उसके बाद से ही 'इंट्रोवर्ट' निशांत सार्वजनिक जगहों पर दिखने लगे थे.
वो मीडिया में पार्टी और एनडीए सरकार के कामकाज को लेकर टिप्पणी करते दिखते थे.
लेकिन 15 अप्रैल को लोक भवन में हुए शपथ ग्रहण समारोह में निशांत नहीं आए.
नई सरकार में उनकी कोई भूमिका नहीं होने से समर्थक निराश है. टीम निशांत के लोग बीबीसी को बताते हैं कि अभी निशांत घूमेंगें और समय आने पर सरकार में आने का फ़ैसला लेंगें.
लेकिन क्या निशांत कुमार जेडीयू को संभाल पाएंगे?
वरिष्ठ पत्रकार प्रियरंजन भारती इस सवाल पर कहते हैं, " निशांत अभी बहुत उम्मीद पैदा नहीं करते. जेडीयू गृह मंत्री अमित शाह के टारगेट पर है. नीतीश को दिल्ली शिफ़्ट करके पार्टी में उनकी पकड़ कमजोर होगी और सम्राट अगर अमित शाह का प्लान ठीक ढंग से लागू कर पाए तो जेडीयू समाप्त होगी या पिछलग्गू बनकर रहेगी."
लेकिन अरुण अशेष इससे इतर राय रखते हैं.
वो कहते हैं, " निशांत को देखना अभी बाकी है. ये सही है कि वो राजनीति से दूर रहे, लेकिन अब जब वो घूम रहे हैं तो उन्हें थोड़ा समय देना चाहिए. अच्छी बात यहीं है कि उन्होनें पावर टू पॉलिटिक्स का रास्ता नहीं चुना है बल्कि वो पीपुल-पॉलिटिक्स से पावर के पास जाना चाहते हैं."
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद बीते 21 सालों से बिहार की राजनीति, समाज और अफसरशाही के केन्द्र में रही जेडीयू के भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे है.
ये उठते सवाल, बार–बार राजनीति का यही पाठ दोहराते हैं कि पार्टी बनी रहे इसके लिए संगठन और 'सेकंड लाइन लीडरशिप' जरूरी है.
बदकिस्मती से जेडीयू के पास सेकंड लाइन लीडरशिप आज की तारीख में नहीं है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित



































