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<title>BBC Hindi</title>
<link>https://nontonwae.pages.dev/blogs/hindi/sports/</link>
<description>बीबीसी हिंदी के इस ब्लॉग में आप पढ़ सकते हैं राष्ट्रमंडल खेलों पर बीबीसी हिंदी के संवाददाताओं की राय.</description>
<language>hi</language>
<copyright>Copyright 2013</copyright>
<lastBuildDate>Mon, 28 Feb 2011 02:37:01 +0530</lastBuildDate>
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<item>
	<title>इंग्लैंड की ओर झुका टाई है ये</title>
	<description>&lt;p&gt;बंगलौर में हुए मैच के बाद भारत को भी एक अंक मिल गया और ग्रुप बी की अंक तालिका में वो बेहतर रन औसत के आधार पर नंबर एक पर रहने में क़ामयाब हो गया.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;आधिकारिक रूप से भले ही मैच के नतीजे की सुई बीच में अटक गई हो मगर मेरे ख़्याल से ये बीच में रुककर भी इंग्लैंड की ओर झुकी मानी जाएगी.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;भारतीय टीम को ख़ुद को सौभाग्यशाली मानना चाहिए कि उसे एक अंक मिल गया पर उस एक अंक की भी हक़दार शायद इंग्लैंड टीम ही थी.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;भारतीय क्रिकेट प्रेमी मैच के बाद यही नहीं समझ पा रहे थे कि उन्हें एक अंक पाने की ख़ुशी मनानी चाहिए या पहले जिस मैच को वो भारत की झोली में मान रहे थे उसके टाई हो जाने का ग़म.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;मेरे ख़्याल से तो ख़ुशी मनाएँ तो ही अच्छा है क्योंकि भागते भूत की लंगोटी की तरह कम से कम एक अंक पा तो गए.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;जिस तरह अंतिम सात विकेट सिर्फ़ 33 रनों के अंतर में गिरे उसने दिखाया कि भारत की मज़बूत बल्लेबाज़ी ग़ैर-ज़िम्मेदारी से खेलना भूली नहीं है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;किस-किस को दोष देंगे आप. 'अगर' की तो लाइन लगी है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;अगर अंतिम गेंद पर एक शॉर्ट रन न हुआ होता तो स्कोर 339 होता और एक रन से भारत जीत भी सकता था. &lt;/p&gt;

&lt;p&gt;जिन सात गेंदों पर अंतिम सात विकेट गिरे उनमें से अगर कुछ बच जातीं और उन गेंदों पर रन बन जाते तो स्कोर बड़ा भी हो सकता था.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;अगर फ़ील्डिंग में थोड़ी और चुस्ती होती तो कुछ रन रुक सकते थे.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;अगर गेंदबाज़ी की क़मियाँ सुधारी जा सकतीं तो न जाने कितने रन रोके जा सकते थे. अगर, अगर, अगर....&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इंग्लैंड को देखिए. शुरू से लेकर अंत तक जीत का जज़्बा शायद ही कभी छूटा हो. पीटरसन की पारी देखिए, एंड्रयू स्ट्रॉस की या इयन बेल की.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;स्ट्रॉस और बेल जब तक क्रीज़ पर थे मैच तो भारत के हाथों से निकल ही चुका था. &lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ज़बरदस्त शुरुआत के बाद भारत को 350 तक नहीं पहुँचने देना इंग्लैंड की जीत है. &lt;/p&gt;

&lt;p&gt;स्ट्रॉस और बेल के बीच तीसरे विकेट के लिए 170 रनों की साझेदारी इंग्लैंड की जीत है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इतने बड़े स्कोर का पीछा करते हुए विश्व कप में भारत को भारत की ज़मीन पर टाई के लिए मजबूर करना दरअसल इंग्लैंड की जीत है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;स्पिन खेलने में कमज़ोर मानी जाने वाली इंग्लैंड का हरभजन और पीयूष चावला का डटकर सामना करना इंग्लैंड की जीत ही है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;सात विकेट गिरने के बावजूद अंतिम दो ओवरों में 29 रन बनाने की कोशिश में 28 रन बना ले जाना इंग्लैंड की जीत ही तो है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इसलिए ये टाई दरअसल इंग्लैंड की ओर झुका हुआ नतीजा है. &lt;/p&gt;

&lt;p&gt;भारतीय टीम को शायद समझ आ गया होगा कि वर्ल्ड कप सिर्फ़ बल्लेबाज़ों के दम पर नहीं जीता जा सकता.&lt;/p&gt;</description>
         <dc:creator>मुकेश शर्मा </dc:creator>
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	<category></category>
	<pubDate>Mon, 28 Feb 2011 02:37:01 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>टीम नंबर वन या सर्वश्रेष्ठ टीम</title>
	<description>&lt;p&gt;दक्षिण अफ़्रीका के विरुद्ध भारत को सेंचूरियन में मिली हार के कई पहलू हैं.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;पहली पारी की बल्लेबाज़ी के बाद हार तो तय हो गई थी, देखना सिर्फ़ ये बच गया था कि हार कितने दिनों में मिलती है और पारी से मिलती है या विकेटों से.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;वैसे इस हार के लिए भारत की बल्लेबाज़ी और गेंदबाज़ी दोनों बराबर के ज़िम्मेदार हैं. भारतीय टीम शायद इस समय दुनिया की सबसे अनुभवी टीम है जहाँ वीरेंदर सहवाग, राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर और वीवीएस लक्ष्मण जैसे खिलाड़ी उसका हिस्सा हैं.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इतने अनुभवी बल्लेबाज़ी क्रम का पहली पारी में लुढ़क जाना शर्मनाक था. वीरेंदर सहवाग पहली और दूसरी पारी में जिस शॉट पर आउट हुए वो ग़ैर-ज़िम्मेदाराना था.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ये ठीक है कि सहवाग का खेलने का अंदाज़ बिंदास है मगर खिलाड़ी में अनुभव के साथ ज़िम्मेदारी भी आती है और वो ज़िम्मेदारी इस अहम दौरे पर सहवाग से अपेक्षित थी.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ये बात सिर्फ़ सहवाग ही नहीं दूसरे बल्लेबाज़ों पर भी लागू होती है जो 'तू चल मैं आता हूँ' कि तर्ज पर मैदान में जा रहे थे.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;सुरेश रैना के बल्ले के रन क्यों सूख गए हैं ये समझ से बाहर हो गया है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इसी तरह भारतीय गेंदबाज़ी का पैनापन पूरी तरह ग़ायब है. दक्षिण अफ़्रीकी गेंदबाज़ों ने इस टेस्ट में 20 विकेट झटके मगर भारतीय गेंदबाज़ सिर्फ़ चार खिलाड़ियों को पैवेलियन की राह दिखा पाए.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;जहाँ टीम 20 विकेट लेना चाहती है वहाँ सिर्फ़ चार नियमित गेंदबाज़ों के साथ उतरने का क्या औचित्य है. जो काम छह विशेषज्ञ बल्लेबाज़ नहीं कर पाएँगे उसे सातवाँ बल्लेबाज़ अकेले दम पर कैसे कर दिखाएगा.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ये बात सही है कि सिर्फ़ एक हार के बाद टीम का सारा पिछला प्रदर्शन धो-पोंछकर नहीं रख सकते मगर विश्व की नंबर एक टीम से ऐसी बुरी हार की भी तो अपेक्षा नहीं की जा सकती.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के विरुद्ध जारी ऐशेज़ शृंखला के दूसरे मैच में हारने के बाद ऑस्ट्रेलिया ने ज़बरदस्त वापसी करते हुए तीसरा मैच जीता. वो जीत ऑस्ट्रेलिया का जज़्बा दिखाती है जो कभी भी हार को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखती.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;क्या भारतीय टीम नंबर एक के ताज को सिर्फ़ घरेलू शृंखलाओं के दम पर बचाना चाहती है या वास्तव में विदेशी पिच पर जीत हासिल करके श्रेष्ठ टीम होने का दावा ठोंक सकती है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;अगले दो टेस्ट में इसी का टेस्ट होगा.&lt;/p&gt;</description>
         <dc:creator>मुकेश शर्मा </dc:creator>
	<link>https://nontonwae.pages.dev/blogs/hindi/sports/2010/12/india-africa.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Tue, 21 Dec 2010 00:49:53 +0530</pubDate>
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<item>
	<title>इन खेलों का &apos;स्वर्णिम&apos; सुख</title>
	<description>&lt;p&gt;पिछले दिनों जब राष्ट्रमंडल खेल एक के बाद एक विवाद में फँसते जा रहे थे तो मेरे एक दोस्त ने बहुत ही वाजिब सवाल रखा कि क्या इन खेलों पर क़रीब दस हज़ार करोड़ रुपए ख़र्चना रुपए की बर्बादी और फ़िज़ूलख़र्ची नहीं है?&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;हो सकता है कि स्टेडियम और खेल गाँव बिल्कुल आख़िरी मौक़े पर आयोजन समिति के हवाले किए गए हों या खेलों से मात्र एक सप्ताह पहले मुख्य स्टेडियम के पास दर्शकों के चलने का फ़ुट ओवरब्रिज धराशायी हो गया हो या दिल्ली में आई बाढ़ के पानी से जूझ रहे खेल गाँव में साँप निकल आया हो लेकिन जिस तरह के खेल अब तक हुए हैं और जिस तरह का प्रदर्शन भारतीय खिलाड़ियों का रहा है, उसने इन सभी अवरोधों और खिजाने वाली चीज़ों को भुलवा दिया है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;खरबों रुपए की अर्थव्यवस्था में दस हज़ार करोड़ रुपयों की बिसात क्या है? और फिर क्या 'फ़ील गुड फ़ैक्टर' का मोल रुपयों में लगाया जा सकता है?&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;देश के एथलीटों के प्रदर्शन के बारे में अख़बारों में पढ़ने और उन्हें अपनी आँखों के सामने या टेलीविज़न पर 'लाइव परफ़ॉर्म' करते देखने में ज़मीन आसमान का फ़र्क है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;अलका तोमर द्वारा एथेंस ओलंपिक की रजत पदक विजेता तोन्या वरबीक को पटखनी देने या विजेंदर के नामीबियाई मुक्केबाज़ को मात्र 98 सैकंडों में स्टेडियम की छत दिखा देने के थ्रिल को सिर्फ़ देख कर ही महसूस किया जा सकता है. &lt;/p&gt;

&lt;p&gt;स्टेडियम में दर्शक भले ही नदारद हों( सौजन्य कलमाडी ऐंड कंपनी) लेकिन टेलीविज़न पर जितने लोग इन खेलों का आनंद ले रहे हैं, उसने क्रिकेट के एकाधिकार को ( मोहाली में रोमांचक जीत और सचिन तेंदुलकर के 49 वें शतक के बावजूद) फीका किया है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;दूसरी सबसे बड़ी बात भारतीय खिलाड़ी उन खेलों में पदक ला रहे हैं जो ग्लैमरस स्पर्धाएं नहीं कहलाती हैं.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;तीरंदाज़ी, जिमनास्टिक, और पैरा स्विमिंग में भारत को इससे पहले कभी राष्ट्रमंडल खेलों में पदक नहीं मिला. &lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इन खेलों में कई पदक विजेता बड़े शहरों से न होकर भारत के अनजान गांवों और क़स्बों से आए हैं.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;तीरंदाज़ी में सोना जीतने वाली 16 वर्षीया दीपिका कुमारी झारखंड के रतुचेती गांव की रहने वाली हैं जिनके पिता राँची में ऑटो रिक्शा चलाते हैं. लंबी कूद में रजत पदक लेने वाली प्रजुषा के पिता त्रिचूर में रसोइया थे. और इस समय बेरोज़गार हैं.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;जिमनास्टिक में रजत और काँस्य पदक जीतने वाले आशीष कुमार और हॉकी में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ गोल करने वाले दानिश मुज़्तबा इलाहाबाद के हैं और बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं. ये भी सोचने वाली बात है कि हरियाणा जिसका कि बालिका शिशु हत्या में बहुत ख़राब रिकॉर्ड है, किस तरह से बार-बार इतनी महिलाओं को विजेता पोडियम पर भेज रहा है. &lt;/p&gt;

&lt;p&gt;हरियाणा के पुरुष खिलाड़ियों का प्रदर्शन भी चाहे वो योगेश्वर दत्त हों या रविंदर सिंह या संजय कुमार, महिला खिलाड़ियों से कम नहीं रहा है. &lt;/p&gt;

&lt;p&gt;कुछ हल्कों में तो राष्ट्रमंडल खेलों को हरियाणा के खेल कहा जा रहा है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;और जिस तरह से इन खेलों ने दिल्ली का काया-पलट किया है वो भी क़ाबिले-तारीफ़ है. चौड़ी साफ़ सड़कें, ख़ूबसूरत फ़्लाई ओवर, दूरदराज़ के इलाक़ों तक मैट्रो ट्रेन ने दिल्ली की छवि को भारतवासियों के साथ विदेशियों की निगाह में भी उठा दिया है. &lt;/p&gt;

&lt;p&gt;साइक्लिंग स्पर्धा के दौरान जब हेलीकॉप्टरों पर रखे कैमरे ऊपर से दिल्ली के दृश्य दिखा रहे थे तो लग ही नहीं रहा था कि ये वही गंदी अनियोजित दिल्ली है. अपने पूरे वैभव में दिल्ली दुनिया के किसी भी सुंदर नगर से टक्कर ले रही थी. &lt;/p&gt;</description>
         <dc:creator>रेहान फ़ज़ल </dc:creator>
	<link>https://nontonwae.pages.dev/blogs/hindi/sports/2010/10/cwg-golds.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Mon, 11 Oct 2010 22:14:40 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>जश्न के आगे की चुनौती</title>
	<description>&lt;p&gt;राष्ट्रमंडल खेलों की रंगारंग शुरुआत हो गई और दुनिया भर में उस पर अधिकतर अच्छी प्रतिक्रिया भी आई.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;मगर अगले ही दिन से सामने आ गई नई चुनौती और वो थी खेलों से दर्शकों का नदारद होना.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;टिकट मिलने में लोगों को कितनी जद्दोजहद करनी पड़ रही है ये बात भी अलग-अलग माध्यमों से सामने आ रही है और नतीजा ये कि आयोजकों को अब तुरंत क़दम उठाने के बारे में सोचना पड़ रहा है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;खिलाड़ी का मनोबल तभी बढ़ेगा जब उसका प्रदर्शन देखने और उसका उत्साह बढ़ाने के लिए लोग मौजूद हों. &lt;/p&gt;

&lt;p&gt;भारत पाकिस्तान हॉकी मैच छोड़कर अभी तक कहीं से भी ये ख़बर नहीं मिल रही है कि सभी टिकट बिक चुके हैं.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ज़रा सोचिए कि किसी संगीतकार या गायक को अगर आठ दस लोगों के सामने अपने हुनर का प्रदर्शन करना पड़े तो कैसी स्थिति बनेगी. ठीक उसी तरह की परेशानी खिलाड़ियों को उठानी पड़ रही है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;एक तरफ़ तो देश में खेलों की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए खेलों के आयोजन की दुहाई दी जा रही थी और दूसरी तरफ़ खाली स्टेडियम उन दावों को मुँह चिढ़ाते दिख रहे हैं.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;मुक्केबाज़ी, कुश्ती और एथलेटिक्स जैसी लोकप्रिय स्पर्द्धाएँ इस बात का टेस्ट होंगी कि वाक़ई लोग स्टेडियम तक पहुँचेंगे या नहीं.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;आयोजकों ने अब कहा है कि वे सुविधाओं से वंचित रहे बच्चों और स्कूली बच्चों को बुलाकर स्टेडियम में बैठाएँगे.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ये फ़ैसला तो अच्छा है मगर टिकट बिक्री की स्थिति देखते हुए पहले ही ये फ़ैसला कर लेते तो शुरू में ही बात नहीं उठती. &lt;/p&gt;

&lt;p&gt;पर शुरू में करते कैसे तब तो पैसे पाने पर ध्यान था. &lt;/p&gt;

&lt;p&gt;तो अब निष्कर्ष यही लगता है कि देश में खेलों की संस्कृति का विकास और इस आयोजन का ख़र्च निकालना, ये दोनों लक्ष्य हाथ में हाथ डालकर नहीं चल पा रहे.&lt;/p&gt;</description>
         <dc:creator>मुकेश शर्मा </dc:creator>
	<link>https://nontonwae.pages.dev/blogs/hindi/sports/2010/10/cwg-ticket.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Wed, 06 Oct 2010 12:16:13 +0530</pubDate>
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<item>
	<title>कौन देगा इन सवालों के जवाब</title>
	<description>&lt;p&gt;राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी इस उठापटक में आम भारतीय ख़ुद को शर्मिंदा महसूस कर रहा है और खेलों की आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाड़ी से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और खेल मंत्री एमएस गिल तक सब आलोचनाओं के निशाने पर हैं.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;मगर क्या ग़लती सिर्फ़ इन्हीं की है. आज सवालों का अंबार लगा है और जवाब देने के लिए सामने आने को कोई तैयार नहीं है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने 15 अगस्त को लाल किले से कहा कि इन खेलों का सफल आयोजन दिखाएगा कि भारत कितने विश्वास से दुनिया में आगे बढ़ रहा है. उस दावे का अब क्या हुआ.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;प्रधानमंत्री ने अब मंत्रियों को बुलाकर एक अहम बैठक की और काम में तेज़ी लाने को कहा.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इतने दिनों तक वह कहाँ थे. जिन खेलों को भारत की प्रतिष्ठा से जोड़ा गया उसकी तैयारी सही चल रही है या नहीं ये समय रहते देखना क्या प्रधानमंत्री का काम नहीं था.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;खेल गाँव को 16 सितंबर को जनता के सामने रखने की कोशिश हुई और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल के लोग अपने रहने की जगह देखने पहुँचे. इसके बाद खेल महासंघ के अध्यक्ष माइकल फ़ेनेल को चिट्ठी लिखकर बताना पड़ा कि खेल गाँव में परेशानियाँ हैं.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;आयोजन समिति के अधिकारी, खेल गाँव के ज़िम्मेदार अधिकारी तब तक आँखें मूँदे क्यों बैठे थे.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;भारत ने जब 1982 में एशियाई खेल आयोजित किए थे तो इससे कहीं कम संसाधनों में उन खेलों का आयोजन हुआ था. इतने संसाधन झोंकने के बावजूद हासिल क्या हुआ- इतनी बदनामी और जग हँसाई.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;क्या भारतीय अधिकारी अभी तक यही नहीं मान रहे थे कि अगर कुछ कमियाँ भी रह गईं तो होगा क्या. दुनिया में भारत के बढ़ते प्रभाव के बीच किस देश की इतनी हिम्मत होगी कि वो खेलों में हिस्सा लेने से मना कर दे.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;ललित भनोट ने क्या सोचकर ये बयान दिया कि भारतीय और पश्चिमी देशों के साफ़-सफ़ाई के स्तर में अंतर है.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;इतने आरोप लगने से पहले तक इन्हीं अधिकारियों का बर्ताव क्या किसी तानाशाह से कम हुआ करता था. जब जिससे चाहा बात किया जब जिसको चाहा सार्वजनिक रूप से डाँट-डपटकर अपना रुतबा दिखाया.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;कलमाड़ी ने इस साल की शुरुआत में बीबीसी से बातचीत में कहा था कि हर चीज़ की आख़िरी ज़िम्मेदारी मेरी है क्योंकि मैं आयोजन समिति का प्रमुख हूँ. अब हुई इतनी शर्मिंदगी की ज़िम्मेदारी लेने के लिए क्या वो तैयार हैं.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;मणिशंकर अय्यर आज ये कहकर सबका दुलारा बनने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या ज़रूरत ही थी ये खेल आयोजित करने की. खेलों का आयोजन उनके सत्ता में आने तक भारत को मिल चुका था.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;उन्होंने देश के सामने शपथ ली थी कि वह अपने मंत्री पद के दायित्वों का शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करेंगे मगर क्या उन्होंने खेल मंत्री पद की ज़िम्मेदारी पूरी तरह निभाई.&lt;/p&gt;

&lt;p&gt;सवालों की ये सूची बढ़ती चली जाएगी मगर देश के ज़िम्मेदार मंत्रियों और अधिकारियों की शराफ़त का आलम देखिए कि अब तक किसी एक ने भी बढ़कर ये नहीं कहा कि- हाँ, हमसे ग़लती हुई है... सबकी उंगलियाँ अब तक दूसरे की ही ओर उठी दिख रही हैं.&lt;/p&gt;</description>
         <dc:creator>मुकेश शर्मा </dc:creator>
	<link>https://nontonwae.pages.dev/blogs/hindi/sports/2010/09/cwg-answers.html</link>
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	<pubDate>Fri, 24 Sep 2010 13:02:46 +0530</pubDate>
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